बिहार चुनाव: तेजस्वी यादव ने यह दावा भी संदेहास्पद बताया कि महज चार महीनों में 26.01 लाख मतदाता स्थायी रूप से स्थानांतरित हो गए। उन्होंने कहा कि बिना किसी जमीनी स्तर की भौतिक जांच के यह आंकड़ा बेहद अविश्वसनीय और असंभव प्रतीत होता है।

पटना: बिहार की राजनीति में एक बार फिर भूकंप आ गया है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने आगामी बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिसने राजनीतिक गलियारों में सनसनी फैला दी है। तेजस्वी यादव ने इशारा किया है कि अगर चुनाव आयोग और प्रशासन का रवैया ‘एकतरफा’ रहा तो वे महागठबंधन के साथ मिलकर चुनाव बहिष्कार करने पर विचार कर सकते हैं।
क्या कहा तेजस्वी यादव ने?
तेजस्वी यादव ने सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा:
“अगर प्रशासन और चुनाव आयोग बीजेपी की गोद में बैठकर लोकतंत्र की हत्या करता रहा, तो हम भी कोई छोटा फैसला नहीं लेंगे। चुनाव बहिष्कार भी विकल्प हो सकता है। लेकिन अंतिम निर्णय महागठबंधन के सहयोगियों से विचार-विमर्श के बाद लिया जाएगा।”
उनका यह बयान लोकसभा चुनाव 2024 के बाद बिहार में विपक्ष की भूमिका और सत्ताधारी गठबंधन की कार्यशैली को लेकर गंभीर सवाल उठाता है।
लोकसभा चुनाव 2024 का नतीजा बना गुस्से की जड़
लोकसभा चुनाव 2024 में राजद को करारी हार मिली थी। तेजस्वी यादव खुद चुनाव नहीं लड़े, लेकिन पार्टी की हालत इतनी खराब रही कि विपक्ष को कुल मिलाकर 4-5 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। अब तेजस्वी यादव का आरोप है कि चुनाव आयोग और प्रशासन ने सत्ताधारी दल, यानी बीजेपी और जेडीयू के लिए “खुला मैदान” बना दिया था।
उन्होंने चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा:
“EVM से लेकर मतगणना केंद्रों तक हर स्तर पर गड़बड़ियां हुईं। हमारी शिकायतों को नजरअंदाज किया गया। आखिर लोकतंत्र में ये कैसी निष्पक्षता है?”
क्या वाकई बहिष्कार की ओर बढ़ रहा है विपक्ष?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान महज चुनावी रणनीति हो सकता है, लेकिन इससे जनता और मीडिया का ध्यान जरूर खिंचा है। तेजस्वी यादव जानते हैं कि मौजूदा हालात में विपक्ष की एकता में कई दरारें हैं। कांग्रेस, वामपंथी दल और क्षेत्रीय छोटे दलों के साथ सीट शेयरिंग को लेकर अभी भी सहमति नहीं बन पाई है।
एक वरिष्ठ नेता के अनुसार:
“तेजस्वी यादव इस बयान के ज़रिए दो निशाने साध रहे हैं— एक तो चुनाव आयोग और सरकार पर दबाव बनाना, दूसरा विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने के लिए माहौल बनाना।”
NDA का पलटवार: ‘पराजय की हताशा है तेजस्वी की धमकी’
तेजस्वी यादव के बयान पर जेडीयू और बीजेपी ने तीखा हमला बोला है। जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा:
“जो खुद को जनता से कट चुका मान चुका है, वो अब बहिष्कार की नौटंकी कर रहा है। लोकतंत्र में भागीदारी छोड़कर भाग जाना असली कायरता है।”
बीजेपी ने तो एक कदम आगे बढ़कर कहा कि तेजस्वी यादव को पहले अपने परिवार की ‘भ्रष्टाचार की विरासत’ से बहिष्कार करना चाहिए।
चुनाव आयोग पर सवाल: निष्पक्षता पर बहस तेज
तेजस्वी यादव का निशाना सीधा चुनाव आयोग पर है। उन्होंने कहा कि:
“अगर चुनाव आयोग निष्पक्ष होता, तो कम से कम हमारी शिकायतों पर संज्ञान लेता। लेकिन यहां तो शिकायत दर्ज करना भी मुश्किल हो गया है।”
यह आरोप ऐसे समय में आया है जब देशभर में EVM, चुनावी खर्च और निष्पक्षता को लेकर बहस पहले से ही गर्म है। बिहार में हाल ही में कुछ बूथों पर पुनर्मतदान को लेकर विवाद भी सामने आया था।
महागठबंधन में हलचल: कांग्रेस, वामदल क्या सोच रहे हैं?
तेजस्वी यादव ने भले ही साफ किया हो कि अंतिम निर्णय महागठबंधन की राय के बाद होगा, लेकिन सूत्रों की मानें तो कांग्रेस और वामदल इस तरह के बहिष्कार के पक्ष में नहीं हैं। वे मानते हैं कि लड़ाई मैदान में लड़नी चाहिए, न कि मैदान छोड़कर।
CPI(M) के एक वरिष्ठ नेता ने कहा:
“हम लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। अगर हम चुनाव ही नहीं लड़ेंगे तो जनता के बीच हमारा एजेंडा कैसे पहुंचेगा?”
राजनीतिक विश्लेषण: क्या है असली मकसद?
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि तेजस्वी यादव का यह कदम कहीं न कहीं एक सामरिक चाल है। वे नीतीश कुमार और बीजेपी पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना चाहते हैं। साथ ही यह बयान उनके समर्थकों के बीच यह संदेश देने के लिए भी है कि वे हार के बाद चुप नहीं बैठे हैं।
वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता ने अपने एक विश्लेषण में कहा:
“तेजस्वी की राजनीति अब नकारात्मकता से जुझारूपन की ओर मुड़ रही है। यह बयान उन्हें दोबारा फ्रंटफुट पर लाने की कोशिश है।”
जनता की राय: समर्थन भी, सवाल भी
सोशल मीडिया पर तेजस्वी यादव का यह बयान ट्रेंड कर रहा है। कुछ लोग इसे साहसी फैसला बता रहे हैं, वहीं कुछ इसे ‘राजनीतिक पलायनवाद’ करार दे रहे हैं।
@YouthBihar नाम के एक ट्विटर यूज़र ने लिखा:
“तेजस्वी यादव सही कह रहे हैं। जब खेल का मैदान ही झुका हुआ हो तो जीत कैसे होगी?”
वहीं @CommonBihari ने सवाल उठाया:
“जनता ने आपको विपक्ष में बैठाया है, आप चुनाव ही नहीं लड़ेंगे तो कैसे बदलाव लाएंगे?”
निष्कर्ष: बहिष्कार या बड़ी रणनीति?
बिहार की राजनीति में यह बयान एक नए मोड़ का संकेत है। तेजस्वी यादव एक ओर चुनाव प्रणाली की पारदर्शिता पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विपक्षी एकता को मजबूती देने की कोशिश कर रहे हैं।
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले हफ्तों में क्या महागठबंधन इस ‘बहिष्कार’ के विकल्प पर एकमत हो पाएगा या नहीं। क्या यह बयान मास्टरस्ट्रोक साबित होगा या खुद विपक्ष के लिए उल्टा पड़ जाएगा— इसका जवाब समय ही देगा।
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