मशहूर फिल्म समीक्षक जय प्रकाश चौकसे का आज निधन हो गया है. जानकारी के मुताबिक, आज शाम 5 बजे इंदौर के मुक्तिधाम में उनका अंतिम संस्कार होगा.

मशहूर फिल्म समीक्षक जय प्रकाश चौकसे का आज निधन हो गया. वो काफी समय से बीमार चल रहे थे. 83 साल की उम्र में आ अपने कॉलम ‘परदे के पीछे’ से उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई थी. जय प्रकाश चौकसे के आखिरी लेख का शीर्षक था, ‘प्रिय पाठको… यह विदा है, अलविदा नहीं, कभी विचार की बिजली कौंधी तो फिर रूबरू हो सकता हूं, लेकिन संभावनाएं शून्य हैं’. जानकारी के मुताबिक, आज शाम 5 बजे इंदौर के मुक्तिधाम में उनका अंतिम संस्कार होगा. चौकसे का परिवार उनके छोटे बेटे आदित्य के इंतजार में है जो मुंबई में रहते हैं. बताया जाता है कि कपूर खानदान और सलीम खान के परिवार के साथ जय प्रकाश चौकसे के बहुत करीबी संबंध रहे हैं.
वरिष्ठ पत्रकार और फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे काफी समय से कैंसर की बीमारी से जूझ रहे थे. फिल्म जगह के एनसाइक्लोपीडिया के नाम से मशहूर चौकसे ने कई उपन्यास भी लिखे, जिसमें ‘ताज बेकरारी का बयान’, ‘महात्मा गांधी, सिनेमा’ और ‘दराबा’ शामिल है. इसके अलावा उन्होंने कई कहानियां भी लिखीं. उनकी कहानियों में ‘मनुष्य का मस्तिष्क और उसकी अनुकृति कैमरा’, ‘उमाशंकर की कहानी’, ‘कुरुक्षेत्र की कराह’ शामिल हैं.
उनका पार्थिव शरीर एचआईजी कॉलोनी स्थित उनके आवास पर रखा गया है. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी उनके निधन पर दुख व्यक्त किया है. इस बीच, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चौकसे के देहांत पर शोक जताते हुए ट्वीट किया, ‘‘अद्भुत लेखन प्रतिभा के धनी, हिन्दी फिल्म जगत पर लगभग तीन दशक तक लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार जयप्रकाश चौकसे जी के निधन की खबर दुखद है.’’
चौकसे के बेटे राजू चौकसे ने बताया, ‘घर में आराम कर रहे मेरे पिता को अचानक दिल का दौरा पड़ा. उनके बेसुध होने पर मेरी डॉक्टर पत्नी ने जांच की, तो पता चला कि उनकी मौत हो चुकी है.’ उनके पिता पिछले सात साल से फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित थे और विगत तीन महीने से उनकी तबीयत ज्यादा खराब चल रही थी.
जयप्रकाश चौकसे ने ‘‘शायद’’ (1979), ‘‘कत्ल’’ (1986) और ‘‘बॉडीगार्ड’’ (2011) सरीखी हिन्दी फिल्मों की पटकथा तथा संवाद लिखे थे. उन्होंने महाभारत पर आधारित एक टीवी धारावाहिक के लेखन विभाग के प्रमुख का जिम्मा भी संभाला था. खराब सेहत से जूझ रहे फिल्म समीक्षक ने अपनी मृत्यु से पांच दिन पहले ही इस स्तंभ की आखिरी किश्त लिखकर इसे विराम दिया था.