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भारत-अमेरिका रिश्तों में तूफान: बाइडेन सरकार ने लगाया 50% टैरिफ, 27 अगस्त से लागू

अमेरिकी दंडात्मक टैरिफ लागू होने से दो दिन पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार (26 अगस्त) को कहा कि भारत आर्थिक दबाव झेलेगा और साथ ही अपनी मजबूती लगातार बढ़ाता रहेगा।

नई दिल्ली/वॉशिंगटन। भारत और अमेरिका के रिश्तों में एक बार फिर व्यापारिक तनाव की आंधी उठ गई है। अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 50% तक का भारी टैरिफ लगाने का मसौदा नोटिस जारी कर दिया है, जो 27 अगस्त से लागू होगा। यह कदम न सिर्फ भारत-अमेरिका व्यापारिक रिश्तों को गहरा झटका देगा, बल्कि दुनियाभर के बाजारों में भी हलचल मचने लगी है।

अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह फैसला “घरेलू उद्योगों की रक्षा” के लिए लिया गया है। लेकिन भारत इसे सीधा-सीधा आर्थिक आक्रमण मान रहा है।


कौन-कौन से प्रोडक्ट्स होंगे प्रभावित?

अमेरिका ने साफ किया है कि यह टैरिफ भारतीय उत्पादों की एक लंबी लिस्ट पर लागू होगा। इसमें शामिल हैं:

  • स्टील और एल्यूमिनियम उत्पाद
  • टेक्सटाइल्स और रेडीमेड गारमेंट्स
  • फार्मास्युटिकल्स की कुछ कैटेगरी
  • इंजीनियरिंग गुड्स
  • फर्नीचर और लेदर आइटम
  • जेम्स एंड ज्वैलरी सेक्टर

भारत के लिए खासकर टेक्सटाइल, ज्वैलरी और इंजीनियरिंग सेक्टर सबसे बड़े झटके की आशंका झेल रहे हैं, क्योंकि इनका अमेरिकी बाजार में बड़ा हिस्सा है।


भारत को होगा कितना नुकसान?

वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारियों का मानना है कि इस फैसले से भारत को सालाना लगभग 20 से 25 अरब डॉलर का नुकसान हो सकता है। अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यात का मूल्य 80 अरब डॉलर के आसपास है, और अगर आधे उत्पादों पर 50% टैरिफ लग गया तो उनकी प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाएगी।

ट्रेड एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इस टैरिफ का सीधा असर छोटे निर्यातकों और मध्यम उद्योगों पर पड़ेगा, जो अमेरिकी डिमांड पर निर्भर हैं।


भारत सरकार की प्रतिक्रिया

भारत सरकार ने अमेरिकी फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। वाणिज्य मंत्री ने कहा:

“अमेरिका का यह कदम अनुचित है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों की भावना के खिलाफ है। भारत अपने हितों की रक्षा के लिए हर संभव कूटनीतिक और कानूनी रास्ता अपनाएगा।”

सूत्रों के अनुसार, भारत इस मुद्दे को वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) में उठाने की तैयारी कर रहा है। साथ ही, भारत भी अमेरिकी उत्पादों पर रिटेलिएटरी टैरिफ लगाने पर विचार कर रहा है।


राजनीतिक तूफान भी तेज

इस फैसले ने भारत की घरेलू राजनीति को भी गर्मा दिया है। विपक्ष ने सरकार पर हमला करते हुए कहा कि विदेश नीति और कूटनीतिक रणनीति में असफलता के कारण भारत आज आर्थिक रूप से कमजोर स्थिति में आ गया है।

कांग्रेस नेता ने तंज कसते हुए कहा, “मोदी सरकार ने विदेशों में शो तो खूब किए, लेकिन नतीजा यह है कि अमेरिका जैसे दोस्त भी अब भारत के खिलाफ खड़े हो रहे हैं।”

वहीं, भाजपा प्रवक्ताओं का कहना है कि यह केवल एक “अस्थायी दबाव” है और सरकार भारत के हितों की रक्षा के लिए मजबूती से अमेरिका के सामने खड़ी है।


एक्सपर्ट्स की राय

ट्रेड और इकोनॉमी के विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का यह कदम चीन के खिलाफ उसके आर्थिक युद्ध की तर्ज पर ही भारत के खिलाफ उठाया गया है। अमेरिका चाहता है कि भारत अपनी घरेलू नीतियों और सब्सिडी स्ट्रक्चर में बदलाव करे।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो. अरविंद मिश्रा कहते हैं:

“यह केवल व्यापार का मामला नहीं है, बल्कि अमेरिका भारत पर दबाव बना रहा है कि वह वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी भूमिका अमेरिका के हितों के अनुसार ढाले।”


ग्लोबल मार्केट पर असर

भारत-अमेरिका ट्रेड वॉर की आहट से एशियाई और यूरोपीय बाजारों में भी हलचल मच गई है।

  • सोना और ज्वैलरी सेक्टर के शेयर गिरे।
  • टेक्सटाइल और इंजीनियरिंग कंपनियों के स्टॉक्स में भारी गिरावट देखी गई।
  • अमेरिकी कंपनियां भी चिंतित हैं, क्योंकि भारत उनके लिए बड़ा पार्टनर है।

ग्लोबल मार्केट एनालिस्ट्स का कहना है कि अगर भारत और अमेरिका के बीच यह तनाव बढ़ा तो इसका असर पूरी दुनिया की सप्लाई चेन पर पड़ेगा।


क्या फिर से लौट आया ट्रेड वॉर का दौर?

ट्रेड वॉर शब्द सबसे पहले अमेरिका-चीन विवाद के दौरान चर्चित हुआ था, जब दोनों देशों ने एक-दूसरे के उत्पादों पर भारी-भरकम टैरिफ लगाए थे। अब भारत के साथ यह स्थिति बनना चिंता का विषय है।

यदि भारत भी जवाबी टैरिफ लगाता है तो निश्चित ही दोनों देशों के बीच आर्थिक खाई और चौड़ी हो जाएगी।


छोटे उद्योग और किसानों पर खतरा

भारतीय निर्यात का बड़ा हिस्सा छोटे और मझोले उद्योगों (MSME) तथा किसानों से जुड़ा है। अमेरिका में भारतीय मसाले, बासमती चावल और दवाइयां बड़े पैमाने पर जाती हैं। टैरिफ बढ़ने के बाद यह सब अमेरिकी बाजार में महंगा हो जाएगा और डिमांड गिरने का खतरा है।

राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में टेक्सटाइल और ज्वैलरी उद्योग के लाखों लोग रोजगार खो सकते हैं।


अमेरिका का तर्क

अमेरिका का कहना है कि भारतीय सरकार अपने उद्योगों को सब्सिडी देकर अमेरिकी बाजार में “अनुचित बढ़त” दिलाती है। यही कारण है कि अमेरिकी घरेलू उद्योग प्रभावित हो रहे हैं।

अमेरिकी वाणिज्य विभाग का बयान:

“भारत से आने वाले उत्पाद अमेरिकी बाजार को असंतुलित कर रहे हैं। यह कदम हमारे घरेलू श्रमिकों और उद्योगों की रक्षा के लिए जरूरी है।”


भारत की अगली चाल

भारत सरकार फिलहाल कूटनीतिक बातचीत पर जोर दे रही है। हालांकि, सूत्र बताते हैं कि अगर अमेरिका अपने फैसले पर अड़ा रहा तो भारत अमेरिकी वाइन, बादाम, एप्पल और हाई-टेक उत्पादों पर भारी टैरिफ लगा सकता है।

इसके अलावा, भारत यूरोपीय संघ और एशियाई देशों के साथ नए ट्रेड एग्रीमेंट्स पर तेजी से काम करने की योजना बना रहा है ताकि अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम की जा सके।


निष्कर्ष

अमेरिका का यह कदम सिर्फ एक व्यापारिक निर्णय नहीं, बल्कि एक बड़ा भू-राजनीतिक संदेश भी है। भारत के सामने अब दो रास्ते हैं—या तो वह झुके और अमेरिकी शर्तें माने, या फिर एक ट्रेड वॉर के लिए तैयार रहे।

जो भी हो, इतना तय है कि आने वाले समय में भारतीय अर्थव्यवस्था और आम लोगों पर इस फैसले का असर जरूर दिखाई देगा।

27 अगस्त का दिन भारत-अमेरिका रिश्तों में नया मोड़ साबित हो सकता है।

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Harshita Ahuja

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