कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने संसद में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर होने वाली बहस से पहले इस मुद्दे पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। उन्होंने इसका कारण बताते हुए कहा कि वह “मौन व्रत” में हैं।

ऑपरेशन सिंदूर को लेकर देश की राजनीति में घमासान मचा हुआ है। एक ओर जहां सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी इसे भारत की खुफिया एजेंसियों की बड़ी कूटनीतिक सफलता बता रही है, वहीं विपक्षी पार्टियाँ, खासकर कांग्रेस, इस ऑपरेशन को लेकर सवाल उठा रही हैं। मगर इसी बीच एक चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है—कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद डॉ. शशि थरूर ने पार्टी के आग्रह के बावजूद इस मुद्दे पर बहस में शामिल होने से इनकार कर दिया है।
यह इनकार महज एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे कांग्रेस पार्टी के भीतर विचारधारात्मक मतभेद और रणनीतिक असमंजस का प्रतीक भी माना जा रहा है।
क्या है ऑपरेशन सिंदूर?
ऑपरेशन सिंदूर, हाल ही में भारत की खुफिया एजेंसियों द्वारा अंजाम दिया गया एक गुप्त मिशन है, जिसमें पाकिस्तानी सरज़मीं पर आतंकी संगठनों के कई ठिकानों को निशाना बनाया गया। केंद्र सरकार ने इसे ‘भारत की आक्रामक लेकिन सटीक कूटनीति’ करार दिया है और इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर आतंक के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का हिस्सा बताया है।
बीजेपी इसे राष्ट्रीय सुरक्षा की दिशा में ऐतिहासिक कदम मान रही है, वहीं कांग्रेस समेत विपक्षी दल इसके तथ्यों, कानूनी आधार और पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
कांग्रेस का रुख और थरूर की दूरी
सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस पार्टी ने अपने अनुभवी और वैश्विक मुद्दों पर मुखर नेता शशि थरूर से अनुरोध किया था कि वे संसद या मीडिया डिबेट्स में पार्टी का पक्ष रखते हुए ऑपरेशन सिंदूर की आलोचना करें। लेकिन थरूर ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि यह “राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला है और इसे राजनीतिक चश्मे से देखना खतरनाक हो सकता है।”
शशि थरूर का मानना है कि ऐसी कार्रवाइयाँ देश की प्रतिष्ठा और रणनीतिक स्थिरता से जुड़ी होती हैं और इन पर सार्वजनिक मंचों पर राजनीति करने से भारत की विदेश नीति को नुकसान हो सकता है।
थरूर के इनकार के पीछे की वजहें
- राष्ट्रीय छवि की चिंता:
थरूर लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। वह संयुक्त राष्ट्र में अपनी सेवा और वैश्विक मुद्दों पर लेखन के कारण जाने जाते हैं। ऐसे में वह मानते हैं कि ऑपरेशन सिंदूर जैसे मिशनों पर विपक्ष की ओर से तीव्र आलोचना करना भारत की छवि को कमजोर कर सकता है। - विदेश नीति पर अलग दृष्टिकोण:
थरूर कांग्रेस पार्टी के पारंपरिक विदेश नीति दृष्टिकोण से थोड़ा भिन्न नजरिया रखते हैं। वह ‘बड़े भारत’ की अवधारणा को मानते हैं और चीन, पाकिस्तान जैसे देशों से जुड़े मामलों में संयमित और कूटनीतिक रुख के पक्षधर हैं। - पार्टी में ‘हार्डलाइन’ सोच से असहमति:
हाल के दिनों में कांग्रेस ने प्रधानमंत्री मोदी सरकार की हर रणनीति का तीखा विरोध करना शुरू किया है—चाहे वह विदेश नीति हो या सुरक्षा। थरूर इस ‘हाइपर-क्रिटिकल’ रुख से सहमत नहीं दिखते। उन्होंने पहले भी कई बार पार्टी के रुख से भिन्न मत रखे हैं, जैसे कि सर्जिकल स्ट्राइक, UNGA में भारत की भूमिका, या कोविड-19 टीका कूटनीति।
कांग्रेस में मचा है खलबली?
शशि थरूर के इस निर्णय से कांग्रेस के भीतर असहजता देखी जा रही है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “थरूर जैसे नेता का बहस से पीछे हटना यह दिखाता है कि पार्टी के पास अब राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर कोई एकजुट सोच नहीं बची है। इससे पार्टी की विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है।”
दूसरी ओर, कुछ नेताओं का कहना है कि थरूर की असहमति स्वस्थ लोकतंत्र का प्रतीक है और पार्टी में विभिन्न मतों के लिए स्थान है।
बीजेपी का पलटवार
बीजेपी ने इस घटनाक्रम पर कांग्रेस को आड़े हाथों लिया है। बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा, “शशि थरूर का इनकार इस बात का सबूत है कि कांग्रेस के अंदर भी अब भारत की राष्ट्रवादी नीतियों के खिलाफ बोलने में झिझक है। ऑपरेशन सिंदूर को झूठा या राजनीति से प्रेरित कहने वाले नेताओं को पहले देशहित पर सोचना चाहिए।”
भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने भी एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “थरूर ने विपक्ष की लाइन लेने से इनकार किया क्योंकि वह जानते हैं कि भारत की सुरक्षा पर राजनीति आत्मघाती हो सकती है।”
मीडिया और सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर खासा बवाल मचा हुआ है। एक ओर थरूर के फैसले को ‘राजनीतिक परिपक्वता’ बताया जा रहा है, तो दूसरी ओर कुछ लोग उन्हें ‘कायर’ कहकर ट्रोल कर रहे हैं। कांग्रेस समर्थक कई पत्रकारों और सोशल मीडिया यूज़र्स ने थरूर पर आरोप लगाया कि वे बीजेपी के दबाव में काम कर रहे हैं।
वहीं थरूर समर्थकों ने कहा कि यह एक ऐसा साहसिक कदम है, जिसे कोई भी नेता नहीं उठा सकता। देशहित को पार्टी लाइन से ऊपर रखने की मिसाल बताया जा रहा है।
क्या थरूर अलग राह पर चलने की तैयारी में हैं?
इस फैसले के बाद एक सवाल यह भी उठने लगा है—क्या शशि थरूर पार्टी में हाशिये पर हैं? या वे किसी नई राजनीतिक दिशा की ओर इशारा कर रहे हैं?
हालांकि, थरूर ने इन अटकलों को खारिज करते हुए कहा, “मैं कांग्रेस पार्टी का हिस्सा हूँ और रहूँगा। मगर इसका मतलब यह नहीं कि मैं हर विषय पर पार्टी लाइन से सहमत रहूँ। राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में जिम्मेदारी सबसे अहम है।”
निष्कर्ष: क्या कांग्रेस को पुनर्विचार की ज़रूरत?
शशि थरूर का यह इनकार कांग्रेस पार्टी के लिए एक चेतावनी की तरह है। यह केवल एक नेता की असहमति नहीं, बल्कि पार्टी के नीति निर्धारण की दिशा और रणनीति पर सवाल भी है। अगर कांग्रेस हर मुद्दे पर विरोध की नीति अपनाएगी, तो न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अहम विषयों पर उसकी विश्वसनीयता कमजोर होगी, बल्कि उसे अपने ही अनुभवी नेताओं का समर्थन भी नहीं मिलेगा।
