इस विस्फोट पर थाई सरकार ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। कार्यवाहक प्रधानमंत्री फुमथाम वेचयाचाई ने कहा कि विदेश मंत्रालय कंबोडिया के खिलाफ आधिकारिक विरोध दर्ज कराएगा और आगे की कार्रवाई पर भी विचार किया जाएगा।

भूमिका: बारूद की गंध के साथ लौटे एशियाई सीमा विवाद
एशिया की दक्षिण-पूर्वी सीमा एक बार फिर बारूद की गंध से भर चुकी है। थाईलैंड और कंबोडिया के बीच चल रहा वर्षों पुराना सीमा विवाद अब धीरे-धीरे खतरनाक मोड़ लेता जा रहा है। इस बार मामला सिर्फ राजनयिक स्तर पर नहीं, बल्कि F-16 जेट विमानों से किए गए सीधे हमलों तक पहुंच गया है। थाई वायुसेना द्वारा कंबोडियाई सैन्य ठिकानों पर हमला किए जाने के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव चरम पर पहुंच गया है।
विवाद की जड़ें: इतिहास का ज़हरीला वारिस
थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमा विवाद नया नहीं है। दोनों देशों के बीच 800 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा है, जिसमें कई स्थान ऐसे हैं जिनपर दोनों पक्ष दावा करते रहे हैं। विशेषकर प्रेह विहेयर मंदिर परिसर और इसके आसपास का क्षेत्र हमेशा से विवाद का मुख्य केंद्र रहा है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) द्वारा मंदिर परिसर को कंबोडिया का हिस्सा घोषित करने के बावजूद, आसपास की जमीन को लेकर तनाव बना रहा।
फरवरी 2025 से शुरू हुआ तनाव
फरवरी 2025 में एक सीमा चौकी के पास हुए छोटे हथियारों से संघर्ष ने इस बार की श्रृंखला को जन्म दिया। थाई सेना ने आरोप लगाया कि कंबोडियाई सैनिकों ने नई बारूदी सुरंगें बिछा दी हैं, जिससे थाई नागरिकों और सैनिकों की जान खतरे में है। वहीं कंबोडिया सरकार ने इन आरोपों को “राजनीतिक बहाना” बताते हुए खारिज कर दिया और थाई सेना पर सीमा उल्लंघन का आरोप लगाया।
F-16 हमला: एशियाई आसमान में आग
23 जुलाई 2025 को थाई वायुसेना ने एक बड़ा कदम उठाया। जानकारी के अनुसार, कम से कम तीन F-16 फाइटर जेट्स ने सीमा के पास कंबोडियाई सैन्य ठिकानों और संदिग्ध बारूदी सुरंगों के डिपो को निशाना बनाया। इन हमलों में कई इन्फ्रास्ट्रक्चर को नुकसान, सैन्य वाहनों की तबाही और तीन सैनिकों की मौत की खबर सामने आई है।
थाई सेना का बयान:
“हमने केवल आत्मरक्षा में कार्रवाई की है। कंबोडिया द्वारा हमारी सीमा के भीतर बारूदी सुरंगें बिछाना युद्ध की सीधी चुनौती है।”
कंबोडिया का जवाब:
“यह हमला हमारी संप्रभुता पर खुला हमला है। थाईलैंड ने एकतरफा युद्ध का रास्ता चुना है, जिसका हम कड़ा जवाब देंगे।”
राजनीतिक प्रतिक्रिया: ASEAN भी बेचैन
ASEAN (Association of Southeast Asian Nations) के लिए यह स्थिति गंभीर सिरदर्द बन चुकी है। सिंगापुर, वियतनाम और मलेशिया जैसे देशों ने शांति बनाए रखने की अपील की है। लेकिन थाईलैंड और कंबोडिया, दोनों ही अपने-अपने पक्ष में अडिग हैं।
भारत और चीन की चुप्पी:
भारत ने अभी तक इस मुद्दे पर कोई औपचारिक बयान नहीं दिया है, जबकि चीन – जो दोनों देशों में बड़े निवेशक है – “स्थिति पर नज़र रखने” की बात कहकर तटस्थ रुख बनाए हुए है।
आम नागरिकों की त्रासदी: पलायन और डर
इस संघर्ष का सबसे अधिक प्रभाव सीमा के पास बसे गांवों पर पड़ा है। अब तक 10,000 से अधिक लोग दोनों देशों की सीमाओं से अन्य सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर चुके हैं। कई स्कूल, अस्पताल और बाज़ार बंद हो चुके हैं। लोगों के बीच भय और असुरक्षा का माहौल गहराता जा रहा है।
सीमा निवासी लियांग फोंग ने बताया:
“हमने अपने बच्चों के साथ खेत छोड़ दिए हैं। रात भर धमाकों की आवाज़ें आती हैं, हमें नहीं पता कल क्या होगा।”
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया: संयुक्त राष्ट्र की चिंता
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) ने दोनों देशों से संयम बरतने और बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने की अपील की है। लेकिन अभी तक कोई ठोस पहल नहीं हुई है। अमेरिका ने थाईलैंड को अपना “रणनीतिक भागीदार” बताते हुए “स्थिति को नियंत्रण में रखने” की सलाह दी है।
UN प्रवक्ता का बयान:
“एशिया में दो देशों के बीच युद्ध की स्थिति क्षेत्रीय स्थिरता के लिए घातक होगी।”
राजनीति के पीछे की रणनीति?
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह संघर्ष केवल सीमा विवाद नहीं, बल्कि आंतरिक राजनीति को मजबूत करने का जरिया भी बन चुका है। थाई प्रधानमंत्री जनरल प्रचायोथ चान-ओचा के खिलाफ देश में भ्रष्टाचार और लोकतंत्र हनन के आरोप लग रहे थे। ऐसे में यह सैन्य आक्रामकता राष्ट्रीयता की लहर बनाकर उनकी छवि मजबूत कर सकती है।
उधर, कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुन मानेट भी अपने पिता की सत्ता विरासत को मज़बूत करने के लिए “देशभक्ति” के नैरेटिव को भुनाना चाहते हैं।
भविष्य की तस्वीर: युद्ध या वार्ता?
हालात जिस तरह से तेजी से बिगड़ रहे हैं, वह संकेत दे रहे हैं कि दोनों देश अब युद्ध की कगार पर खड़े हैं। हालांकि ASEAN और UN जैसे मंचों के ज़रिए बातचीत की कोशिशें जारी हैं, लेकिन ज़मीन पर गोली और बम का जवाब बम से दिया जा रहा है।
सैन्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर यही रुख जारी रहा, तो यह छोटा-सा सीमा विवाद एक पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है, जिसमें अन्य देश भी घसीटे जा सकते हैं।
निष्कर्ष: कूटनीति की जरूरत सबसे अधिक
थाईलैंड और कंबोडिया के बीच छिड़ा यह संघर्ष सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं है, यह एशिया की शांति, स्थिरता और भविष्य की दिशा तय कर सकता है। अब वक्त आ गया है जब सिर्फ सैन्य ताकत नहीं, बल्कि राजनयिक सूझबूझ से इस जटिल संकट को सुलझाया जाए। वरना यह सीमाओं पर शुरू हुआ टकराव जल्द ही पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया को जला सकता है।
