उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापित होकर 1960 के दशक से पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बिजनौर और रामपुर जैसे जिलों में बसे परिवारों को कानूनी रूप से ज़मीन का मालिकाना हक़ प्रदान करें।

भूमिका: 1947 का जख्म, 2025 में मरहम
आज़ादी के बाद देश ने कई जख्म देखे, लेकिन शायद सबसे अनकहे पीड़ा से भरे थे वो लोग, जो पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से जान बचाकर भारत आए। उन्होंने भारत को ही अपना देश माना, लेकिन सात दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद उन्हें न तो कानूनी पहचान मिली, न ही स्थायी ज़मीन का मालिकाना हक़। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अब इन 10,000 शरणार्थी परिवारों के लिए एक ऐसा फैसला लिया है, जो न सिर्फ ऐतिहासिक है, बल्कि एक संवेदनशील और साहसी कदम भी है।
योगी आदित्यनाथ का आदेश: समयबद्ध तरीके से दी जाएगी ज़मीन का मालिकाना हक
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं कि इन पूर्वी पाकिस्तान से आए शरणार्थी परिवारों को समयबद्ध तरीके से ज़मीन का अधिकारपत्र (पट्टा) दिया जाए। इन परिवारों ने दशकों से जिन ज़मीनों पर आशियाना बनाया है, उन्हें अब कानूनी रूप से उसी ज़मीन का मालिक माना जाएगा।
उन्होंने कहा, “ये लोग भारत के नागरिक हैं। इनकी पीढ़ियाँ उत्तर प्रदेश की मिट्टी में पली-बढ़ी हैं। इन्हें सम्मान, अधिकार और स्वाभिमान के साथ जीने का हक है।”
किन जिलों में हैं ये शरणार्थी?
इन 10,000 परिवारों में से अधिकतर शरणार्थी कानपुर देहात, गोरखपुर, लखनऊ, बहराइच, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, पीलीभीत और बरेली जिलों में बसे हुए हैं। ये लोग 1947 और 1971 के बीच, पूर्वी पाकिस्तान में हुए धार्मिक उत्पीड़न, दंगों और सामाजिक भेदभाव के चलते भारत आए थे।
वर्तमान स्थिति: बिना दस्तावेज़, बिना अधिकार
आज भी इन परिवारों की ज़मीनें सिर्फ कागज़ों में “लंबित” हैं। उनके पास न तो रजिस्ट्री है, न ही भूमि अधिकार का कोई वैध प्रमाण। नतीजतन, उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता, न ही किसी बैंक से कृषि लोन।
70 वर्षों से वे ‘अस्थायी निवासी’ की स्थिति में जी रहे हैं, जबकि उनके बच्चे इसी मिट्टी में जन्मे, पढ़े और अब रोजगार की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं।
कैसे होगा ये कार्यान्वयन?
CM योगी के आदेशानुसार, जिलाधिकारियों को 3 चरणों में कार्रवाई करनी है:
- पहचान और सत्यापन: जिन परिवारों ने 30 साल या उससे अधिक समय से ज़मीन पर कब्जा किया है, उनका नाम, दस्तावेज़, फोटो और परिवार विवरण लिया जाएगा।
2. स्थलीय निरीक्षण: राजस्व विभाग की टीम जाकर ज़मीन की स्थिति, सीमा और विवाद की स्थिति का निरीक्षण करेगी।
3. अधिकार पत्र जारी करना: जांच पूरी होने के बाद सरकार पट्टे जारी करेगी और परिवारों को ज़मीन पर स्थायी मालिकाना हक मिलेगा।
राजनीतिक संदेश: शरणार्थियों को ‘वोटर’ नहीं, ‘सम्मानित नागरिक’ समझो
योगी सरकार के इस फैसले को सिर्फ सामाजिक न्याय नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश में लगभग 50,000 से अधिक लोग किसी न किसी रूप में ऐसे शरणार्थी परिवारों से संबंध रखते हैं।
यह फैसला मोदी सरकार की ‘वंचितों को मुख्यधारा से जोड़ने’ की नीति का हिस्सा माना जा रहा है। बता दें कि केंद्र सरकार पहले ही CITIZENSHIP AMENDMENT ACT (CAA) के तहत ऐसे लोगों को नागरिकता देने की प्रक्रिया में जुटी है।
शरणार्थी समुदाय में खुशी की लहर
यह खबर सुनकर शरणार्थी बस्तियों में जश्न जैसा माहौल है। गोरखपुर के हसनपुर शरणार्थी कैम्प में रहने वाले 67 वर्षीय रवींद्र लाल ने कहा:
“हमने पाकिस्तान छोड़ दिया, सोचा था भारत मां हमें गले लगाएगी। लेकिन 70 साल इंतज़ार करना पड़ा। योगी जी ने जो किया है, उसके लिए शब्द नहीं हैं।”
बलरामपुर के एक और शरणार्थी कैलाश मंडल ने कहा, “अब हमारे बच्चों को पहचान मिलेगी, स्कूल में दाखिला और सरकारी योजनाओं में लाभ मिलेगा।”
विपक्ष का रुख: “चुनावी स्टंट” या “ऐतिहासिक फैसला”?
जहां शरणार्थी समुदाय और सत्तारूढ़ बीजेपी इस फैसले की प्रशंसा कर रही है, वहीं विपक्ष ने इसे “चुनावी स्टंट” करार दिया है। समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा:
“अगर योगी सरकार को शरणार्थियों की इतनी ही चिंता थी तो पिछले सात साल में क्यों नहीं किया? अब जब चुनाव नज़दीक हैं, तब जागे हैं।”
हालांकि, बीजेपी नेताओं का कहना है कि “यह फैसला किसी चुनाव के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए है जिनकी तकलीफें अब तक अनदेखी की जाती रही थीं।”
मानवाधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया
सामाजिक कार्यकर्ता सीमा त्रिपाठी कहती हैं, “ये सिर्फ ज़मीन नहीं, बल्कि पहचान, स्वाभिमान और इंसाफ़ की बात है। इतने सालों से जो नागरिक दोयम दर्जे की ज़िंदगी जी रहे थे, अब उन्हें समान अधिकार मिलेंगे।”
मानवाधिकार आयोग ने भी इस फैसले को “सकारात्मक और संवेदनशील” कदम बताया है।
CAA से जुड़ा है ये फैसला?
यह फैसला अप्रत्यक्ष रूप से CAA (नागरिकता संशोधन कानून) से जुड़ा माना जा रहा है। CAA के तहत बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, ईसाई, जैन और पारसी शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता दी जा रही है। अब जिन शरणार्थियों को CAA के तहत नागरिकता मिली या मिलने वाली है, उन्हें भूमि पर कानूनी अधिकार देने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है।
क्या यह फैसला अन्य राज्यों पर भी असर डालेगा?
उत्तर प्रदेश का यह कदम अब पश्चिम बंगाल, असम और दिल्ली जैसे राज्यों पर भी नैतिक दबाव डालेगा, जहाँ पूर्वी पाकिस्तान के शरणार्थी बड़ी संख्या में बसे हैं। अगर अन्य राज्य भी इसी तरह की नीति अपनाते हैं, तो लाखों लोगों को सम्मानजनक जीवन का अवसर मिलेगा।
निष्कर्ष: 70 साल का इंतज़ार खत्म – अब सम्मान से जीएंगे पूर्वी पाकिस्तान के शरणार्थी
योगी सरकार का यह कदम न केवल कानूनी तौर पर साहसिक है, बल्कि यह देश की उस आत्मा को भी आवाज़ देता है, जो कहती है – “भारत सभी का है, और जो इसकी मिट्टी से प्रेम करता है, उसे सम्मान मिलेगा।”
एक राष्ट्र के तौर पर यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उन लोगों को सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि जीने का अधिकार दें जिन्होंने भारत को अपना आखिरी ठिकाना माना।