मणिपुर संकट: निर्दलीय विधायक सपम निशिकांत सिंह ने कहा कि राज्य के अधिकांश लोग एक जनप्रिय सरकार चाहते हैं और यही कारण है कि वे राज्यपाल से मिलने आए हैं।

इंफाल, 28 मई 2025 — मणिपुर की सियासत एक बार फिर उबाल पर है। सोमवार शाम बीजेपी के आठ और दो अन्य दलों के विधायकों ने मिलकर राज्यपाल अनुसुइया उइके भल्ला से मुलाकात की और नए राजनीतिक समीकरण के तहत सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया। इस मुलाकात ने राज्य की राजनीति में एक बार फिर हलचल मचा दी है। सत्ता संतुलन के इस नए खेल ने जहां एक ओर मौजूदा मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह की चिंता बढ़ा दी है, वहीं दूसरी ओर भाजपा आलाकमान के लिए भी एक नई रणनीति तय करने का संकेत दे दिया है।
🔥 अचानक से बदले सियासी समीकरण
बीजेपी के कुल 8 विधायकों ने दो निर्दलीय और एक क्षेत्रीय दल के समर्थन के साथ राज्यपाल से मिलकर दावा पेश किया कि उनके पास सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत है। सूत्रों के अनुसार इन विधायकों ने एक साझा ज्ञापन राज्यपाल को सौंपा, जिसमें लिखा था कि वर्तमान सरकार जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर रही है और अब एक नया जनादेश गठबंधन के रूप में सामने आ रहा है।
राज्यपाल के आवास पर हुई इस अहम मुलाकात में विधायकों ने जोर देकर कहा कि “प्रदेश में राजनीतिक स्थिरता के लिए नई सरकार बनाना जरूरी है।” हालांकि बीजेपी की ओर से आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन पार्टी के अंदरखाने में हलचल तेज हो चुकी है।
🧩 कौन हैं ये विधायक?
इस राजनीतिक चाल का नेतृत्व बीजेपी के वरिष्ठ विधायक थोंगजाम मेई ने किया, जो पिछले कुछ महीनों से पार्टी नेतृत्व से नाराज़ बताए जा रहे थे। उनके साथ जिन विधायकों ने समर्थन जताया है, उनमें कुछ पूर्व मंत्री भी शामिल हैं, जिन्होंने बीरेन सिंह की कार्यशैली को लेकर खुली नाराजगी जताई थी।
बाकी दो विधायक एक क्षेत्रीय पार्टी (NPP) और एक निर्दलीय बताए जा रहे हैं, जिन्होंने कहा कि वे “स्थिर और पारदर्शी सरकार” के पक्ष में हैं।
🎯 क्या गिर सकती है बीरेन सरकार?
मणिपुर विधानसभा में कुल 60 सीटें हैं। वर्तमान में बीजेपी के पास 32 विधायक हैं, लेकिन अगर इनमें से 8 अलग हो जाते हैं, तो संख्या घटकर 24 रह जाती है। वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के पास मिलाकर 24 विधायक हैं। ऐसे में जो नया समूह सामने आया है, अगर उसे कुछ और निर्दलीय या छोटे दलों का समर्थन मिल जाता है, तो सत्ता पलट असंभव नहीं।
राजनीतिक विश्लेषक इसे “मणिपुर में बीजेपी के अंदरूनी संघर्ष का परिणाम” मान रहे हैं। पिछले कुछ समय से राज्य में कानून व्यवस्था, उग्रवाद और जातीय संघर्षों को लेकर बीजेपी सरकार सवालों के घेरे में रही है।
🗣️ विपक्ष की प्रतिक्रिया
कांग्रेस ने इसे “बीजेपी के अंतर्विरोधों का विस्फोट” करार दिया है। पार्टी प्रवक्ता ने कहा, “जब आप जनता की आवाज़ सुनने के बजाय सत्ता में बने रहने की जिद में रहते हैं, तो पार्टी अंदर से टूटने लगती है।”
मणिपुर कांग्रेस के अध्यक्ष के माफा मेइतेई ने कहा, “बीजेपी की नीति रही है कि वे सत्ता में रहने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, लेकिन अब उनकी ही पार्टी के विधायक उनके खिलाफ खड़े हो गए हैं। यह लोकतंत्र की जीत है।”
🤐 भाजपा की प्रतिक्रिया: चुप्पी या रणनीति?
बीजेपी की ओर से अब तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री बीरेन सिंह ने दिल्ली से निर्देश मांगे हैं और केंद्रीय नेतृत्व से मुलाकात के लिए समय भी मांगा है।
एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया, “यह सब पहले से पक रहा था। कुछ विधायक मुख्यमंत्री से नाराज़ थे, लेकिन उन्होंने पार्टी मंच पर बात रखने की बजाय सरकार को अस्थिर करने का रास्ता चुना।”
हालांकि, पार्टी नेतृत्व इन असंतुष्ट विधायकों को मनाने की कोशिश कर रहा है। दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इस मामले पर चर्चा शुरू कर दी है।
🛑 क्या राष्ट्रपति शासन की आहट?
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि यदि बहुमत का स्पष्ट निर्धारण नहीं हो पाता, तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है। सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार इस पर भी नजर रख रही है कि राज्य में किसी प्रकार की अशांति या हिंसा की स्थिति पैदा न हो।
📜 संवैधानिक प्रक्रिया क्या कहती है?
संविधान के अनुसार, यदि कोई दल या गठबंधन सरकार बनाने का दावा करता है, तो राज्यपाल को विधायकों की संख्या और समर्थन पत्रों के आधार पर सत्यापन करना होता है। इसके बाद राज्यपाल बहुमत साबित करने के लिए विधानसभा में विश्वास मत का निर्देश दे सकते हैं।
राज्यपाल अनुसुइया उइके भल्ला ने मीडिया से बात नहीं की, लेकिन राजभवन सूत्रों का कहना है कि उन्होंने इस घटनाक्रम पर गंभीरता से विचार करना शुरू कर दिया है।
📉 जनता क्या कह रही है?
मणिपुर की आम जनता इस पूरे राजनीतिक नाटक को हैरानी और असमंजस की नजर से देख रही है। एक स्थानीय दुकानदार ने कहा, “हमें फर्क नहीं पड़ता कौन सरकार में है, हमें शांति और विकास चाहिए। लेकिन लगता है नेताओं को सिर्फ कुर्सी से मतलब है।”
एक छात्रा ने कहा, “राज्य में पहले ही तनावपूर्ण माहौल है, अब ये सत्ता का खेल हमारे भविष्य से खेल रहा है।”
🔮 आगे क्या हो सकता है?
इस घटनाक्रम के तीन संभावित परिणाम हो सकते हैं:
बीजेपी असंतुष्ट विधायकों को मनाकर सत्ता में बनी रहे।
नया गठबंधन बहुमत साबित कर सरकार बनाए।
राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो जाए।
फिलहाल सभी की निगाहें दिल्ली और राजभवन की ओर हैं। बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व जिस तरह की रणनीति अपनाता है, वह मणिपुर की राजनीति का भविष्य तय करेगा।
निष्कर्ष:
मणिपुर की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर पहुंच गई है, जहां हर दिन एक नई साजिश, एक नया समीकरण और एक नया दावा सामने आ रहा है। बीजेपी के 8 विधायकों का बगावत करना यह दर्शाता है कि पार्टी के अंदर गहरा असंतोष पल रहा था, जो अब फूट पड़ा है। क्या यह असंतोष सत्ता परिवर्तन में बदल जाएगा या बीजेपी फिर से अपना प्रभुत्व कायम रखेगी — यह आने वाले कुछ दिन तय करेंगे।
अगर राज्यपाल ने इस दावे को स्वीकार कर लिया, तो मणिपुर को एक नई सरकार मिल सकती है — और यदि नहीं, तो संघर्ष और गहराएगा।
