धर्म

बरसात के मौसम में पानी में डूब जाता है ये मंदिर, पानी से जलती है ज्योत

आज हम आपको मंदिरों के अनसुलझे रहस्यों के बारे में बताने जा रहे हैं। इस बार हम बताते हैं आपको ऐसे मंदिर के बारे में जहां पर तेल या घी से नहीं पानी से जलाते हैं दीया। माताजी का यह मंदिर बहुत ही चमत्कारिक है। आओ जानते हैं इस मंदिर के चमत्कार के बारे में।

यह मंदिर मध्यप्रदेश के शाजापुर जिले में नलखेड़ा गांव से करीब 15 किलोमीटर दूर गाड़िया गांव के पास कालीसिंध नदी के तट पर स्थित है। गड़ियाघाट वाली माताजी के नाम से मशहूर यह मंदिर बारिश के मौसम में आधा पानी में डूब जाता है। दरअसल, वर्षाकाल में कालीसिंध नदी का जल स्तर बढ़ने से यह मंदिर पानी में डूब जाता है। जिससे यहां पूजा करना संभव नहीं होता। इसके बाद शारदीय नवरात्रि पुन: मंदिर का कामकाजा प्रारंभ हो जाता है।

गड़ियाघाट वाली माताजी के नाम से मशहूर इस मंदिर का चमत्कार यह है कि यहां पर जब माता की ज्यो‍त जलाई जाती है तो वह तेल, घी या मोम से नहीं बिल्क पानी से जलाई जाती है। यह क्रम पिछले कई सालों से जारी है। हालांकि देश में ऐसे अनेक मंदिर हैं, जहां इससे भी लंबे समय से दीये जलते आ रहे हैं लेकिन यहां पर महाजोत जलाई जाती है जो सबसे भिन्न है।

यहां के पुजारी का दावा है कि पहले यहां हमेशा तेल का दीपक जला करता था, लेकिन कुछ साल पहले उन्हें माता ने सपने में दर्शन देकर पानी से दीपक जलाने के लिए कहा। मां के आदेश के अनुसार पुजारी ने वैसा ही किया।

प्रात:काल उठकर जब पुजारीजी ने मंदिर के पास में बह रही कालीसिंध नदी से पानी भरा और उसे दीये में डाला और दीये में रखी रुई के पास जैसे ही जलती हुई माचिस ले जाई गई, वैसे ही ज्योत जलने लगी। यह देखकर पुजारीजी खुद भी आश्चर्य करने लगे थे, परंतु उन्होंने 2 माह तक लोगों से यह बात छुपा कर रखी।

पुजारीजी ने बाद में कुछ ग्रामीणों को इस बारे में बताया तो पहले तो किसी को विश्‍वास नहीं हुआ लेकिन ग्रामीणों के समक्ष दीए में पानी डालकर ज्योत जलाई तो ज्योति सामान्य रूप से जल उठी। उसके बाद से इस चमत्कार के बारे में जानने के लिए लोग यहां काफी संख्या में आते हैं।

कहते हैं कि इस मंदिर में रखे दीपक में जब नदी का पानी डाला जाता है, तो वह चिपचिपे तरल पदार्थ में बदल जाता है और दीपक जल उठता है। पानी से जलने वाला ये दीया बरसात के मौसम में नहीं जलता है। इसके बाद शारदीय नवरात्रि के प्रथम दिन यानी पड़वा से दोबारा ज्योत जला दी जाती है, जो अगले वर्षाकाल तक लगातार जलती रहती है।

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Jyoti Kumari

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