बीजेपी के साथ सियासी घमासान तब शुरू हुआ जब राहुल गांधी ने देश के छात्रों और जनरेशन ज़ी (Gen Z) से लोकतंत्र की रक्षा करने की अपील की। उन्होंने यह भी वादा किया कि कथित ‘वोट चोरी’ के खिलाफ उनकी लड़ाई में वे हमेशा उनके साथ खड़े रहेंगे।

भारत की सियासत में चुनावी जंग सिर्फ वोटों की गिनती तक सीमित नहीं होती, बल्कि नैरेटिव की लड़ाई भी उतनी ही अहम होती है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस बार सीधे Gen Z यानी नई पीढ़ी को अपना हथियार बनाया है। उन्होंने युवाओं से अपील की है कि वे लोकतंत्र की रक्षा करें और “वोट चोरी” न होने दें। वहीं बीजेपी ने पलटवार करते हुए कहा है कि भारत का युवा अब “वंशवादी राजनीति” के खिलाफ खड़ा हो चुका है।
राहुल गांधी और बीजेपी की इस बयानबाज़ी ने चुनावी माहौल को और गर्मा दिया है। सवाल उठ रहा है—क्या नई पीढ़ी सचमुच राहुल गांधी के साथ खड़ी होगी या फिर बीजेपी के नैरेटिव को ही स्वीकार करेगी?
राहुल गांधी का संदेश: “Gen Z लोकतंत्र का प्रहरी”
राहुल गांधी ने हाल ही में एक कार्यक्रम में युवाओं को संबोधित करते हुए कहा—
“आज वोट चोरी हमारे लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ा खतरा है। मैं भारत के हर युवा, खासकर Gen Z से अपील करता हूँ कि वे अपनी भूमिका निभाएं और लोकतंत्र की रक्षा करें।”
राहुल के इस बयान को कांग्रेस की नई रणनीति माना जा रहा है। पार्टी को लगता है कि पारंपरिक मतदाताओं की तुलना में युवा मतदाता बदलाव के वाहक हो सकते हैं। सोशल मीडिया पर सक्रिय यह पीढ़ी न सिर्फ चुनावी चर्चाओं में शामिल है बल्कि ट्रेंड सेट करने की क्षमता भी रखती है।
Gen Z कौन और क्यों अहम?
Gen Z यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी। 2024 और 2029 के चुनावों में यही वर्ग पहली बार बड़े पैमाने पर वोटिंग करेगा। अनुमान है कि भारत में इस समय करीब 20 करोड़ से अधिक युवा मतदाता ऐसे हैं जो Gen Z कैटेगरी में आते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पीढ़ी परंपरागत जाति-धर्म की राजनीति से ज्यादा रोजगार, शिक्षा, टेक्नोलॉजी और भविष्य की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर वोट करती है। राहुल गांधी इन्हीं संवेदनाओं को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं।
बीजेपी का पलटवार: “युवा वंशवाद से तंग”
राहुल गांधी के बयान पर बीजेपी ने तीखा पलटवार किया। पार्टी प्रवक्ताओं ने कहा—
“राहुल गांधी वोट चोरी की बात करते हैं, लेकिन असली मुद्दा यह है कि भारत का युवा अब वंशवादी राजनीति से ऊब चुका है। नई पीढ़ी योग्यता और काम को तवज्जो देती है, खानदान को नहीं।”
बीजेपी का कहना है कि राहुल गांधी बार-बार खुद को युवाओं का नेता बताने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनकी राजनीति अभी भी नेहरू-गांधी परिवार की छाया से बाहर नहीं आ पाई है।
सोशल मीडिया पर जंग
राहुल गांधी का “Gen Z से वोट चोरी रोकने का आह्वान” सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुआ। ट्विटर (अब X), इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर इस पर बहस छिड़ गई।
- कांग्रेस समर्थक इसे युवाओं को सशक्त बनाने की पहल बता रहे हैं।
- जबकि बीजेपी समर्थक कह रहे हैं कि राहुल गांधी “हार का ठीकरा पहले से ही वोट चोरी पर फोड़ना चाहते हैं।”
हैशटैग #VoteChori, #GenZWithRahul और #NoToDynasty लगातार ट्रेंड करते रहे।
युवा क्या सोचते हैं?
दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र राहुल मिश्रा का कहना है—
“राहुल गांधी की बात में दम है। अगर चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होगी तो लोकतंत्र कमजोर होगा।”
वहीं पुणे के इंजीनियरिंग छात्रा श्रुति जोशी का कहना है—
“हमें राहुल गांधी या बीजेपी में से किसी की भी परवाह नहीं, हमें चाहिए नौकरी और सुरक्षित भविष्य। जो पार्टी यह देगी, हम उसी के साथ जाएंगे।”
स्पष्ट है कि युवा वर्ग भावनाओं से कम और मुद्दों से ज्यादा जुड़ा हुआ है।
चुनावी समीकरणों पर असर
कांग्रेस की रणनीति साफ है—वह युवाओं को अपनी ओर खींचकर बीजेपी के वोट बैंक को चुनौती देना चाहती है। राहुल गांधी खुद को “युवाओं की आवाज़” बताने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन बीजेपी भी पीछे नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करिश्मा अब भी युवाओं में लोकप्रिय है। डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और रोजगार से जुड़े वादों के जरिए बीजेपी ने युवा वर्ग तक अपनी पहुंच बनाई है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
सिर्फ बीजेपी ही नहीं, अन्य विपक्षी दलों ने भी राहुल गांधी के बयान पर तंज कसा। आम आदमी पार्टी (AAP) के एक नेता ने कहा—
“राहुल गांधी वोट चोरी की बात कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस खुद ही कई राज्यों में हार का सामना कर चुकी है। युवाओं को सिर्फ भाषण नहीं, ठोस प्लान चाहिए।”
वहीं समाजवादी पार्टी और टीएमसी जैसे दलों ने राहुल के बयान का समर्थन किया और कहा कि “इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की पारदर्शिता” पर सवाल उठाना जरूरी है।
क्या यह ‘नैरेटिव वॉर’ है?
विश्लेषकों का कहना है कि यह असल में “नैरेटिव वॉर” है। राहुल गांधी चाहते हैं कि चुनाव से पहले ही जनता में यह संदेश जाए कि अगर कांग्रेस हारी तो कारण “वोट चोरी” होगा। वहीं बीजेपी यह नैरेटिव सेट करना चाहती है कि कांग्रेस युवाओं का विश्वास खो चुकी है और अब वंशवाद की राजनीति से बाहर निकलने को तैयार नहीं।
अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि दुनिया भर में Gen Z राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रही है। अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के कई देशों में यह पीढ़ी सोशल मीडिया के जरिए चुनावी मुद्दों को प्रभावित कर रही है। भारत में भी यही तस्वीर उभर रही है। राहुल गांधी का यह दांव उसी अंतर्राष्ट्रीय ट्रेंड को ध्यान में रखकर उठाया गया कदम माना जा रहा है।
निष्कर्ष
राहुल गांधी का Gen Z कार्ड और बीजेपी का वंशवाद वाला पलटवार—दोनों ही भारत की बदलती राजनीति की झलक हैं। एक ओर कांग्रेस लोकतंत्र की रक्षा और वोट चोरी रोकने की बात कर रही है, तो दूसरी ओर बीजेपी यह नैरेटिव गढ़ रही है कि युवा वंशवाद से परेशान हैं।
आखिरकार, सच्चाई चुनावी नतीजों में ही सामने आएगी। लेकिन इतना तय है कि आने वाले चुनाव में Gen Z निर्णायक भूमिका निभाने वाला है।
सवाल यही है—क्या यह पीढ़ी राहुल गांधी के आह्वान पर “लोकतंत्र की चौकीदार” बनेगी या बीजेपी के “वंशवाद विरोधी एजेंडा” को अपना समर्थन देगी?