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मंडी में मौत का मलबा! भीषण भूस्खलन से तीन की मौत, राहत-बचाव अभियान जारी

हिमाचल में भूस्खलन का कहर: राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) के अनुसार 20 जून से अब तक मानसूनी तबाही में 404 लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें से 229 मौतें बारिश से जुड़ी घटनाओं में और 175 मौतें सड़क हादसों में हुई हैं।

हिमाचल प्रदेश का मंडी ज़िला मंगलवार की सुबह दर्दनाक हादसे का गवाह बना। देर रात हुई भारी बारिश के बाद एक विशाल भूस्खलन ने पूरे इलाके में तबाही मचा दी। पहाड़ दरकते ही सड़कों पर मलबा फैल गया, कई घर क्षतिग्रस्त हो गए और तीन लोगों की मौत हो गई। राहत की बात यह रही कि प्रशासन ने तुरंत रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू कर दिया, जिससे और बड़ी जनहानि टल गई।

स्थानीय लोगों के मुताबिक, भूस्खलन इतना भयानक था कि पूरे पहाड़ से मानो मिट्टी और पत्थरों की बारिश होने लगी। चारों ओर धूल का गुबार और टूटते पेड़ों की आवाज़ ने माहौल को दहला दिया।


तीन लोगों की मौत, कई घायल

प्रशासन ने पुष्टि की है कि इस भूस्खलन में अब तक तीन लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं कई अन्य लोग घायल हैं, जिन्हें नज़दीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। मृतकों की पहचान अभी तक पूरी तरह नहीं हो पाई है।

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि कई लोग मलबे में दब गए थे, जिन्हें कड़ी मशक्कत के बाद निकाला गया। हादसे के बाद पूरे इलाके में मातम छा गया है और लोग सहमे हुए हैं।


सड़कें बंद, गांवों का संपर्क टूटा

भूस्खलन की वजह से मंडी ज़िले की कई प्रमुख सड़कों पर आवागमन पूरी तरह ठप हो गया है। नेशनल हाईवे 21 और कई ग्रामीण मार्गों पर भारी मलबा जमा हो गया है। इसके चलते गांवों का संपर्क कट गया है।

कई वाहन सड़क पर ही फंसे रह गए, जिन्हें बाद में पुलिस और प्रशासन की मदद से सुरक्षित निकाला गया। ट्रैफिक पुलिस ने यात्रियों से अपील की है कि वे अनावश्यक यात्रा न करें और सुरक्षित स्थानों पर ही रहें।


पुल बहा, घर-दुकानें क्षतिग्रस्त

तेज़ बारिश और भूस्खलन के चलते मंडी के पास एक छोटा पुल भी बह गया। इसके अलावा कई मकान और दुकानें क्षतिग्रस्त हो गईं। दुकानदारों का कहना है कि उनका लाखों का सामान पानी और मलबे में दबकर बर्बाद हो गया।

ग्रामीणों ने बताया कि आधी रात को जब लोग सो रहे थे, तभी पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा खिसक कर नीचे आ गिरा। अचानक घरों में मलबा घुस आया और लोग जान बचाने के लिए भाग खड़े हुए।


रेस्क्यू ऑपरेशन तेज़

जैसे ही हादसे की जानकारी मिली, प्रशासन ने तुरंत SDRF और NDRF की टीमें मौके पर भेजीं। सुबह होते ही राहत-बचाव कार्य शुरू कर दिया गया। अब तक दर्जनों लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है।

रेस्क्यू टीमों को भारी मलबा और लगातार हो रही बारिश के कारण दिक्कतें आ रही हैं। फिर भी राहत कार्य युद्धस्तर पर जारी है। हेलीकॉप्टर से भी हालात पर नज़र रखी जा रही है।


मुख्यमंत्री ने जताया शोक

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने हादसे पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने मृतकों के परिजनों के लिए मुआवज़े का ऐलान किया और अधिकारियों को निर्देश दिया कि राहत-बचाव कार्यों में किसी तरह की लापरवाही न हो।

मुख्यमंत्री ने ट्वीट कर कहा, “मंडी की घटना बेहद दुखद है। सरकार प्रभावित परिवारों के साथ खड़ी है और हर संभव मदद सुनिश्चित की जाएगी।”


मौसम विभाग की चेतावनी

भारतीय मौसम विभाग ने हिमाचल प्रदेश के कई ज़िलों में अगले 48 घंटे तक भारी बारिश की चेतावनी दी है। मंडी, कुल्लू, चंबा और शिमला में भूस्खलन और बाढ़ का ख़तरा बढ़ गया है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि मानसून के दौरान हिमालयी राज्यों में ऐसे हादसों का खतरा ज्यादा रहता है। जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित निर्माण कार्यों ने स्थिति को और भयावह बना दिया है।


पर्यटन पर असर

हिमाचल प्रदेश इस समय पर्यटन सीजन के बीच है, लेकिन लगातार हो रही बारिश और भूस्खलन ने पर्यटन कारोबार पर तगड़ा असर डाला है। मंडी और कुल्लू-मनाली की ओर जाने वाले सैलानियों को रोक दिया गया है।

होटल मालिकों और टैक्सी यूनियनों का कहना है कि इस आपदा से उन्हें भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है। पर्यटक भी डरे हुए हैं और कई लोगों ने अपनी यात्राएं रद्द कर दी हैं।


सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरें

भूस्खलन की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो रहे हैं। वीडियो में पहाड़ से गिरते पत्थरों और मलबे के बीच लोगों की चीख-पुकार सुनाई दे रही है।

ट्विटर पर #MandiLandslide और #HimachalDisaster हैशटैग ट्रेंड करने लगे। लोग सरकार से सवाल कर रहे हैं कि आखिर क्यों हर साल ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए ठोस रणनीति नहीं बनाई जाती।


क्यों बढ़ रही हैं आपदाएँ?

विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में लगातार हो रहे अतिक्रमण और अवैज्ञानिक निर्माण कार्यों ने आपदा का खतरा कई गुना बढ़ा दिया है। पहाड़ों को काटकर सड़कें और होटल बनाने से जमीन की पकड़ कमजोर हो जाती है।

इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन की वजह से अचानक बारिश की घटनाएँ बढ़ रही हैं। यही कारण है कि पिछले कुछ सालों से हिमाचल और उत्तराखंड जैसे राज्यों में भूस्खलन और बाढ़ की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं।


प्रभावित परिवारों की दास्तान

भूस्खलन में अपने प्रियजनों को खोने वाले परिवारों की आंखों में दर्द और आंसू साफ झलक रहे हैं। एक पीड़ित महिला ने बताया कि रात को उनके घर में अचानक मलबा घुस आया और उन्होंने अपने पति को मलबे में खो दिया।

एक अन्य ग्रामीण ने कहा, “हम सो रहे थे कि अचानक घर हिलने लगा। बाहर निकले तो देखा कि पूरा पहाड़ ही टूटकर आ गया है। हमने भगवान का नाम लिया और जान बचाकर भागे।”


प्रशासन की चुनौतियाँ

मंडी जैसे पहाड़ी ज़िलों में आपदा प्रबंधन आसान काम नहीं है। संकरी सड़कों और लगातार बारिश की वजह से राहत टीमों को मौके पर पहुंचने में घंटों लग जाते हैं। भारी मलबा हटाना भी एक बड़ी चुनौती है।

फिर भी प्रशासन ने साफ कहा है कि किसी भी हाल में राहत कार्य रोके नहीं जाएंगे। गांव-गांव जाकर प्रभावित परिवारों को सुरक्षित निकाला जाएगा।


भविष्य की चेतावनी

यह हादसा एक बार फिर चेतावनी देता है कि हिमालयी राज्यों को आपदा प्रबंधन पर गंभीरता से ध्यान देना होगा। केवल हादसे के बाद राहत कार्य करना काफी नहीं है।

पर्यावरणविदों का सुझाव है कि अनियंत्रित निर्माण पर रोक लगाई जाए, पहाड़ों की भूगर्भीय स्थिति का गहराई से अध्ययन किया जाए और आपातकालीन ढांचे को मजबूत किया जाए।


निष्कर्ष

हिमाचल प्रदेश के मंडी का यह भूस्खलन न सिर्फ तीन ज़िंदगियाँ निगल गया, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए एक बड़ा सबक भी छोड़ गया। सवाल यह है कि कब तक लोग हर मानसून में अपनी जान और संपत्ति इस तरह गँवाते रहेंगे?

अब वक्त आ गया है कि सरकार, वैज्ञानिक, प्रशासन और जनता मिलकर ठोस रणनीति बनाएँ, ताकि “देवभूमि” बार-बार आपदाओं की शिकार न बने।

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Harshita Ahuja

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