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ट्रंप–मोदी की दोस्ती पर जॉन बोल्टन का धमाका: ‘ये रिश्ता तो रूस–चीन तक हिला डालेगा

जॉन बोल्टन ने कहा कि भारत को लेकर ट्रंप के रवैये ने उन वर्षों की द्विदलीय अमेरिकी कोशिशों को कमजोर कर दिया है, जिनका मकसद नई दिल्ली को वॉशिंगटन के करीब लाना और उसे चीन के खिलाफ खड़ा करना था। “वह प्रगति अब उलट गई है। इसे अभी भी सुधारा जा सकता है, लेकिन फिलहाल यह एक चिंताजनक दौर है,” उन्होंने चेतावनी दी।

अमेरिका की राजनीति में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वापसी की अटकलें तेज़ हैं। इसी बीच उनके पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने एक ऐसा बयान दिया है जिसने वॉशिंगटन से लेकर नई दिल्ली और बीजिंग तक हलचल मचा दी है। बोल्टन ने दावा किया है कि ट्रंप और मोदी की दोस्ती केवल व्यक्तिगत संबंध नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाली डील है। उनका कहना है कि अगर ट्रंप फिर से सत्ता में आते हैं, तो अमेरिका-भारत संबंधों का असर रूस और चीन की रणनीतियों पर सीधा पड़ेगा।


बोल्टन का धमाकेदार बयान

जॉन बोल्टन, जो ट्रंप प्रशासन के दौरान व्हाइट हाउस की आंतरिक रणनीतियों के गवाह रहे, ने एक इंटरव्यू में कहा:
“ट्रंप और मोदी की दोस्ती केवल फोटो-ऑप नहीं है। इसमें सामरिक संदेश छिपा है, जो रूस और चीन तक गूंजेगा।”

उनका इशारा साफ था—भारत और अमेरिका के बीच बढ़ता रणनीतिक सहयोग अब केवल व्यापार और रक्षा समझौतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भूराजनीतिक समीकरण बदलने वाला गठजोड़ है।


मोदी–ट्रंप संबंध: हाउडी मोदी से लेकर नमस्ते ट्रंप तक

जब 2019 में ह्यूस्टन में ‘हाउडी मोदी’ इवेंट हुआ, तब अमेरिकी राजनीति में यह चर्चा का बड़ा विषय बना कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अमेरिका में इतना जबरदस्त स्वागत क्यों मिला। मंच पर ट्रंप और मोदी की हाथ में हाथ डालकर की गई वॉक ने यह संकेत दिया कि दोनों नेता केवल औपचारिक रिश्ते नहीं निभा रहे, बल्कि राजनीतिक रूप से एक-दूसरे को मजबूत कर रहे हैं।

2020 में अहमदाबाद में हुआ ‘नमस्ते ट्रंप’ आयोजन इस दोस्ती का अगला अध्याय था। ट्रंप ने वहां कहा था:
“भारत हमेशा हमारे दिलों में रहेगा।”
मोदी ने भी ट्रंप को ‘भारत का सच्चा दोस्त’ बताया था। बोल्टन का मानना है कि यही दोस्ती अमेरिका-भारत संबंधों का वह मोड़ थी, जिसने चीन और पाकिस्तान तक को बेचैन कर दिया।


रूस का पेंच: भारत की पुरानी दोस्ती बनाम नई रणनीति

भारत और रूस का रिश्ता दशकों पुराना है। रक्षा सौदे, परमाणु सहयोग और अंतरिक्ष परियोजनाएं इसकी गवाही देते हैं। लेकिन जब से रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ, भारत की स्थिति जटिल हो गई।

अमेरिका बार-बार चाहता है कि भारत रूस से दूरी बनाए। बोल्टन के अनुसार, अगर ट्रंप दोबारा सत्ता में आते हैं तो वह मोदी पर और ज्यादा दबाव डालेंगे कि भारत रूस के बजाय अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की ओर झुके।

बोल्टन ने यहां तक कहा:
“ट्रंप और मोदी का व्यक्तिगत रिश्ता इतना मजबूत है कि यह संभव है मोदी अमेरिका की नीतियों के साथ और खुले तौर पर खड़े हों।”

यह बयान साफ संकेत देता है कि आने वाले समय में भारत–रूस रिश्तों की परीक्षा हो सकती है।


चीन पर वार: भारत–अमेरिका गठजोड़ की असली वजह

चीन की आक्रामक नीतियां दुनिया के लिए सबसे बड़ी चिंता हैं। दक्षिण चीन सागर से लेकर लद्दाख तक, बीजिंग लगातार अपने पड़ोसियों को चुनौती देता रहा है।

बोल्टन ने कहा:
“ट्रंप- मोदी दोस्ती का सबसे बड़ा लक्ष्य चीन की बढ़ती ताकत को संतुलित करना है।”

अमेरिका जानता है कि एशिया में चीन को रोकने के लिए भारत से बड़ा साझेदार कोई नहीं। यही कारण है कि चाहे ‘क्वाड’ गठबंधन हो या इंडो-पैसिफिक रणनीति, भारत की भूमिका निर्णायक रही है।

बोल्टन ने यहां तक कहा कि अगर ट्रंप सत्ता में लौटते हैं तो वे भारत को चीन के खिलाफ सबसे बड़ा स्ट्रैटेजिक हथियार बनाएंगे।


पाकिस्तान पर साइड इफेक्ट

भारत–अमेरिका नजदीकी का सीधा असर पाकिस्तान पर भी पड़ता है। पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिका की मदद पर निर्भर रहा है, लेकिन अब वॉशिंगटन का झुकाव साफ तौर पर नई दिल्ली की ओर है।

बोल्टन के बयान ने इस बात को और पुख्ता कर दिया कि अगर ट्रंप की वापसी होती है, तो पाकिस्तान और ज्यादा हाशिए पर चला जाएगा। यह स्थिति इस्लामाबाद और बीजिंग, दोनों के लिए चिंता का विषय है।


अमेरिकी राजनीति और मोदी फैक्टर

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी चुनावी राजनीति में भी मोदी का नाम बार-बार गूंजता है। ट्रंप समर्थक अक्सर कहते हैं कि मोदी दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक हैं और उनकी छवि का फायदा ट्रंप को भी मिल सकता है।

बोल्टन का यह बयान इसी पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है। वह यह साफ करना चाहते हैं कि ट्रंप–मोदी की दोस्ती केवल मंच साझा करने भर की बात नहीं, बल्कि यह रणनीतिक कार्ड है जो अमेरिका की विदेश नीति को नई दिशा दे सकता है।


आलोचक क्या कह रहे हैं?

बोल्टन के बयान ने आलोचकों को भी सक्रिय कर दिया है। डेमोक्रेट्स का कहना है कि ट्रंप ने हमेशा व्यक्तिगत रिश्तों को राष्ट्रीय नीतियों पर प्राथमिकता दी है। उनका मानना है कि अगर भारत और अमेरिका का रिश्ता केवल मोदी–ट्रंप की दोस्ती पर टिका रहेगा तो यह लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकता।

वहीं, कुछ भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को अमेरिका के साथ सहयोग ज़रूर बढ़ाना चाहिए, लेकिन रूस से ऐतिहासिक रिश्ते तोड़ना रणनीतिक गलती होगी।


सोशल मीडिया पर हलचल

जैसे ही बोल्टन का बयान सामने आया, सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। ट्विटर (अब X) पर #TrumpModiFriendship ट्रेंड करने लगा। कुछ यूजर्स ने इसे “21वीं सदी की सबसे खतरनाक दोस्ती” कहा, तो कुछ ने इसे “चीन के लिए बुरा सपना” बताया।

भारतीय यूजर्स ने भी इस मुद्दे पर मज़ेदार मीम बनाए। एक यूजर ने लिखा:
“अगर ट्रंप और मोदी साथ आ गए तो पुतिन और शी जिनपिंग को नींद की गोलियां खानी पड़ेंगी।”


भविष्य की तस्वीर

जॉन बोल्टन के बयान ने यह तो साफ कर दिया कि ट्रंप–मोदी रिश्ता आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अहम विषय बनेगा। अगर ट्रंप 2024 के चुनाव में जीतते हैं, तो भारत-अमेरिका रिश्ते का अगला अध्याय और भी दिलचस्प हो सकता है।

लेकिन इसके साथ ही कई चुनौतियां भी सामने होंगी—

  1. क्या भारत रूस से दूरी बना पाएगा?
  2. क्या चीन के खिलाफ भारत खुलकर अमेरिका का साथ देगा?
  3. क्या पाकिस्तान पूरी तरह अलग-थलग पड़ जाएगा?

इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में सामने आएंगे।


निष्कर्ष

जॉन बोल्टन का यह बयान केवल एक टिप्पणी नहीं, बल्कि आने वाले वैश्विक समीकरणों की झलक है। ट्रंप और मोदी की दोस्ती अब केवल मंचों और आयोजनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रूस और चीन जैसे दिग्गजों के लिए भी रणनीतिक चुनौती बन चुकी है।

दुनिया की नज़र अब इस पर टिकी है कि अगर ट्रंप सत्ता में लौटे तो क्या वाकई यह दोस्ती एशिया और यूरोप की राजनीति को हिला देने वाली ताकत बन जाएगी।

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Harshita Ahuja

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