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जोधपुर में दहेज का कहर: मासूम बेटी संग जिंदा जली महिला शिक्षक, पूरे शहर में मातम

एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका ने पहले घर में पेट्रोल छिड़का, फिर खुद पर और अपनी बेटी पर भी पेट्रोल डाल लिया। पुलिस को घटनास्थल से एक पेट्रोल का डिब्बा बरामद हुआ है।

जोधपुर। राजस्थान के सांस्कृतिक और शौर्य की धरती कहे जाने वाले जोधपुर में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। यहाँ एक शिक्षिका ने अपने ही घर में मिट्टी का तेल छिड़ककर खुद को और अपनी महज तीन साल की मासूम बेटी को आग के हवाले कर दिया। दोनों की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई। यह घटना न सिर्फ पूरे शहर बल्कि पूरे प्रदेश को झकझोर गई है। आरोप है कि महिला को उसके ससुराल पक्ष की ओर से लगातार दहेज की मांग और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा था, जिससे तंग आकर उसने यह भयावह कदम उठाया।


कौन थी पीड़िता?

मृतका का नाम कविता चौधरी (32 वर्ष) बताया जा रहा है, जो पेशे से एक सरकारी विद्यालय में शिक्षिका थीं। लोग बताते हैं कि कविता पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर और अपनी बच्ची से बेहद लगाव रखने वाली महिला थीं। लेकिन शादी के बाद उनका जीवन उस दिशा में मुड़ गया, जिसकी शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। ससुराल वालों द्वारा कथित तौर पर बार-बार दहेज की मांग और मानसिक उत्पीड़न ने उनकी जिंदगी को जहरीला बना दिया।

कविता की शादी लगभग पांच साल पहले जोधपुर के ही एक कारोबारी परिवार में हुई थी। शुरू में सब कुछ सामान्य था, लेकिन धीरे-धीरे दहेज की मांगें बढ़ती गईं। परिजनों का आरोप है कि बार-बार मोटी रकम और गाड़ी जैसी वस्तुओं की मांग कविता और उसके मायके वालों पर दबाव बनाकर की जाती रही।


मासूम बेटी भी बनी शिकार

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्यों एक मां ने अपनी तीन साल की मासूम बेटी रिया को भी इस आग में झोंक दिया? पुलिस सूत्रों के मुताबिक, कविता इतनी टूट चुकी थीं कि उन्हें लगता था कि अगर वे अकेली मर गईं तो उनकी बेटी भी उसी घर में रहकर रोज-रोज दहेज और तानों की आग में झुलसती रहेगी। शायद इसी डर से उन्होंने बेटी को भी साथ में जिंदा जला डाला। यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि एक मासूम को भी इस क्रूर परंपरा का शिकार होना पड़ा।


पड़ोसियों ने देखा खौफनाक मंजर

घटना के समय मोहल्ले के लोग जब चीख-पुकार सुनकर दौड़े तो घर से धुएं के गुबार और आग की लपटें उठ रही थीं। दरवाजा तोड़कर जब लोग अंदर पहुंचे तो वहां का मंजर दिल दहला देने वाला था। मां-बेटी पूरी तरह आग में झुलस चुकी थीं। मौके पर ही दोनों की मौत हो चुकी थी। लोगों के अनुसार, घर के अंदर हर तरफ अफरा-तफरी का माहौल था।


पुलिस जांच और एफआईआर दर्ज

सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। मृतका के मायके पक्ष ने ससुराल वालों पर दहेज प्रताड़ना और हत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया है। इस आधार पर पति, ससुर और सास के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।

जोधपुर पुलिस ने बताया कि प्रारंभिक जांच में दहेज की मांग को लेकर विवाद सामने आया है। एफआईआर में साफ लिखा गया है कि पति और ससुराल वालों ने मिलकर कविता पर दबाव डाला कि वह अपने मायके से और अधिक दहेज लाए। जब उनकी मांग पूरी नहीं हुई तो लगातार मानसिक प्रताड़ना दी गई।


पोस्टमार्टम रिपोर्ट और आगे की कार्रवाई

अस्पताल से मिली पोस्टमार्टम रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ है कि दोनों की मौत जलने से हुए गंभीर घाव और धुएं के कारण दम घुटने से हुई है। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच के लिए विशेष टीम गठित की है। साथ ही, आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी की जा रही है।


राजनीति भी गरमाई

ऐसी दर्दनाक घटना पर राजनीति का गरमाना लाजमी था। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही इसे राजस्थान सरकार की कानून-व्यवस्था पर विफलता करार दिया। विपक्षी नेताओं ने कहा कि जब तक दहेज प्रथा पर सख्ती से लगाम नहीं कसी जाएगी, तब तक ऐसी घटनाएं रुकने वाली नहीं हैं।

महिला आयोग ने भी मामले को गंभीर बताते हुए स्वतः संज्ञान लिया है और पीड़िता के मायके वालों को न्याय दिलाने का आश्वासन दिया है।


समाज पर सवाल

यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक आईना है। सवाल उठता है कि 21वीं सदी में भी दहेज जैसी कुप्रथा किस तरह महिलाओं को जिंदा लील रही है। पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर महिला भी अगर इस प्रथा के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो जाए, तो यह समाज की सामूहिक विफलता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ समाज में जागरूकता फैलाने और कानून को और कड़ा करने की आवश्यकता है।


आंकड़ों से समझिए दहेज का दंश

  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, हर साल देश में करीब 7000 से ज्यादा महिलाएं दहेज के कारण मौत का शिकार होती हैं।
  • राजस्थान जैसे राज्यों में यह संख्या और भी ज्यादा है।
  • दहेज हत्या के मामलों में सजा की दर बेहद कम है, जिससे आरोपी अक्सर बच निकलते हैं।

ये आंकड़े बताते हैं कि कानून तो है, लेकिन उसका पालन और सख्त अमल आज भी दूर की कौड़ी है।


पीड़िता के मायके वालों की चीख

कविता के मायके पक्ष ने मीडिया से बात करते हुए रो-रोकर कहा कि उन्होंने बार-बार समझौता किया, लेकिन ससुराल पक्ष की मांगें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं। उन्होंने कहा कि अगर पहले ही कठोर कदम उठाया होता तो शायद आज उनकी बेटी और नातिन जिंदा होतीं।


सामाजिक संगठनों की अपील

स्थानीय सामाजिक संगठनों ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए दहेज मुक्त विवाह का संकल्प लेने की अपील की है। उनका कहना है कि जब तक समाज खुद आगे नहीं आएगा और दहेज को “सम्मान” का हिस्सा मानना बंद नहीं करेगा, तब तक कानून भी कारगर नहीं हो पाएगा।


निष्कर्ष

जोधपुर की यह घटना हमें झकझोरती है और यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर कब तक दहेज की इस आग में बेटियां और मासूम बच्चे झुलसते रहेंगे? कानून होने के बावजूद जब उसका पालन ढीला हो और समाज खुद ही इस कुप्रथा को पोषण दे, तो ऐसे हादसे बार-बार सामने आते रहेंगे।

दहेज की इस दहशत ने सिर्फ एक महिला और उसकी मासूम बेटी की जान नहीं ली, बल्कि पूरे समाज की अंतरात्मा को झकझोर दिया है। अब समय है कि इस बुराई के खिलाफ सामूहिक जंग छेड़ी जाए, वरना अगली खबर शायद किसी और मासूम की चीख लेकर सामने आएगी।

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Harshita Ahuja

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