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दिल्ली: CM रेखा गुप्ता की सुरक्षा में बड़ा बदलाव, केंद्र ने छीनी CRPF की Z-श्रेणी सुरक्षा, अब जिम्मेदारी पुलिस पर

सीआरपीएफ सुरक्षा कवच को बढ़ाने के आदेश केंद्र द्वारा औपचारिक रूप से जारी किए जाने थे, लेकिन योजना में बदलाव हुआ और अंततः सुरक्षा वापस लेने के आदेश जारी कर दिए गए।

राजधानी दिल्ली की राजनीति में सुरक्षा को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। केंद्र सरकार ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की Z-श्रेणी CRPF सुरक्षा वापस ले ली है और अब उनकी सुरक्षा का जिम्मा दिल्ली पुलिस को सौंप दिया गया है। यह फैसला अचानक आया है, जिससे सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। विपक्षी दल इसे ‘सुरक्षा में कटौती’ करार दे रहे हैं तो वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि यह निर्णय सुरक्षा एजेंसियों की सिफारिश और रिव्यू रिपोर्ट के आधार पर लिया गया है।


आठ साल बाद सुरक्षा ढांचे में बड़ा फेरबदल

काफी लंबे समय से मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की Z-श्रेणी सुरक्षा मिली हुई थी। उनके काफिले के साथ हमेशा भारी सुरक्षा का घेरा रहता था। लेकिन अब केंद्र ने यह जिम्मेदारी फिर से दिल्ली पुलिस को सौंप दी है। सूत्रों का कहना है कि सुरक्षा समीक्षा बैठक में पाया गया कि मौजूदा हालात में मुख्यमंत्री को CRPF जैसी विशेष सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है।


Z-श्रेणी सुरक्षा क्या है?

भारत में VIP सुरक्षा को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है—X, Y, Z और Z+। इनमें सबसे उच्च श्रेणी Z+ होती है।

  • Z-श्रेणी सुरक्षा में करीब 22 से 24 सुरक्षाकर्मी तैनात रहते हैं।
  • इनमें NSG या CRPF के प्रशिक्षित कमांडो भी शामिल होते हैं।
  • इस स्तर की सुरक्षा मिलने का मतलब होता है कि व्यक्ति को संभावित खतरे का उच्च स्तर का अंदेशा है।

रेखा गुप्ता को यह सुरक्षा श्रेणी उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद दी गई थी। अब इसके वापस लिए जाने से बड़ा राजनीतिक संदेश निकल रहा है।


केंद्र सरकार का पक्ष

गृह मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि सुरक्षा एजेंसियों द्वारा नियमित रूप से सभी VIP व्यक्तियों की सुरक्षा समीक्षा की जाती है। इसी प्रक्रिया में पाया गया कि रेखा गुप्ता की सुरक्षा जरूरतों को दिल्ली पुलिस पूरी तरह से संभाल सकती है।
गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया:
“यह फैसला किसी राजनीतिक दबाव या कटौती के तहत नहीं लिया गया है। सुरक्षा की समीक्षा समय-समय पर होती रहती है। मुख्यमंत्री को पर्याप्त सुरक्षा मिलेगी और इसमें कोई समझौता नहीं होगा।”


विपक्ष ने उठाए सवाल

हालांकि विपक्षी दलों ने इसे केंद्र की ‘राजनीतिक बदले की भावना’ से जोड़कर देखा है।
कांग्रेस के प्रवक्ता ने कहा:
“केंद्र सरकार बार-बार विपक्षी दलों से जुड़े मुख्यमंत्रियों या नेताओं की सुरक्षा में कटौती करती है। यह केवल दबाव बनाने का तरीका है।”
वहीं आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया कि केंद्र ने जानबूझकर रेखा गुप्ता की सुरक्षा कमजोर की है ताकि उन पर दबाव डाला जा सके।


रेखा गुप्ता की प्रतिक्रिया

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने सुरक्षा घटाए जाने पर नाराज़गी जाहिर की है। उन्होंने कहा:
“मैं जनता के लिए काम करती हूँ, मेरी सुरक्षा जनता की दुआओं से है। लेकिन अगर केंद्र सरकार सोचती है कि पुलिस मेरी सुरक्षा कर सकती है, तो यह उनकी जिम्मेदारी है।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि उन्हें अपनी सुरक्षा से ज्यादा दिल्ली की जनता की सुरक्षा की चिंता है।


क्या अब खतरा बढ़ेगा?

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली पुलिस भी एक सक्षम एजेंसी है और मुख्यमंत्री की सुरक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है। लेकिन CRPF की सुरक्षा में एक अलग तरह की रणनीतिक और प्रशिक्षित कमांडो की ताकत होती है, जो अब उनके पास नहीं रहेगी।
एक सुरक्षा विश्लेषक ने कहा:
“यह फैसला केवल तकनीकी नहीं है, इसके राजनीतिक निहितार्थ भी होंगे। राजधानी की सुरक्षा और मुख्यमंत्री की सुरक्षा हमेशा संवेदनशील मुद्दा रहती है।”


दिल्ली पुलिस के लिए बड़ी चुनौती

अब यह जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस पर आ गई है, जिसका मतलब है कि मुख्यमंत्री की सुरक्षा में राजधानी की कानून-व्यवस्था पर सीधा असर पड़ेगा। पुलिस को न केवल वीआईपी सुरक्षा बल्कि दिल्ली जैसे महानगर में आम जनता की सुरक्षा भी संभालनी होती है। ऐसे में उन्हें अतिरिक्त जिम्मेदारी के साथ काम करना होगा।


इससे पहले भी हो चुकी हैं कटौतियाँ

यह पहली बार नहीं है जब किसी मुख्यमंत्री या बड़े नेता की सुरक्षा में बदलाव हुआ हो।

  • 2020 में भी कुछ मुख्यमंत्रियों से Z-श्रेणी की सुरक्षा वापस ली गई थी।
  • कई बार नेताओं को मिली NSG सुरक्षा को भी हटाकर CRPF या राज्य पुलिस को सौंपा गया है।

इसलिए यह कदम पूरी तरह नया नहीं है, लेकिन चूंकि इसमें राजधानी दिल्ली के मुख्यमंत्री शामिल हैं, इसलिए मामला ज्यादा चर्चित हो गया है।


राजनीतिक संदेश क्या है?

विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम से राजनीतिक संदेश साफ है—केंद्र यह दिखाना चाहता है कि सुरक्षा किसी भी व्यक्ति का ‘विशेषाधिकार’ नहीं है।
वहीं विपक्षी इसे प्रतिशोध की राजनीति करार देकर जनता की सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर सकता है।


जनता की राय

दिल्ली की सड़कों पर जब इस फैसले पर लोगों से राय पूछी गई तो प्रतिक्रियाएँ बंटी हुई थीं।

  • कुछ लोगों का कहना था कि “CM को इतनी भारी सुरक्षा की क्या जरूरत? उन्हें भी आम आदमी की तरह रहना चाहिए।”
  • वहीं कुछ लोगों का कहना था कि “राजधानी के मुख्यमंत्री को अगर पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी गई, तो यह गंभीर लापरवाही है।”

सुरक्षा और राजनीति का संगम

भारत में वीआईपी सुरक्षा हमेशा राजनीति का हिस्सा रही है। नेताओं को दी जाने वाली सुरक्षा को कई बार विशेषाधिकार माना जाता है और कई बार जनता इसे ‘अनावश्यक बोझ’ मानती है। लेकिन जब किसी बड़े नेता की सुरक्षा में कटौती होती है, तो यह केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक घटना भी बन जाती है।


आगे क्या?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दिल्ली पुलिस उतनी ही सतर्कता और क्षमता से मुख्यमंत्री की सुरक्षा कर पाएगी जितनी CRPF कर रही थी। आने वाले समय में यह साफ हो जाएगा कि यह कदम केवल औपचारिक बदलाव है या इसके गहरे राजनीतिक निहितार्थ हैं।


निष्कर्ष

केंद्र सरकार के इस फैसले ने दिल्ली की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ यह तर्क दिया जा रहा है कि सुरक्षा की समीक्षा एक सामान्य प्रक्रिया है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इसे राजनीतिक हथकंडा बता रहा है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता अब पुलिस सुरक्षा में होंगी, लेकिन उनकी सुरक्षा का मुद्दा राजनीति में लंबे समय तक गूंजता रहेगा।

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Harshita Ahuja

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