गुरुवार को बीजापुर में एक और आईईडी धमाके में डीआरजी का एक जवान घायल हो गया। यह विस्फोट दोपहर में नक्सल विरोधी अभियान के दौरान इंद्रावती जंगल क्षेत्र में हुआ, जो भैरमगढ़ थाना क्षेत्र के अंतर्गत आता है।

छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग एक बार फिर खून से लाल हो गया। बीजापुर जिले के घने जंगलों में नक्सलियों ने एक बार फिर सुरक्षाबलों पर कायराना हमला किया। इस बार उन्होंने आईईडी (Improvised Explosive Device) धमाके को हथियार बनाया, जिसमें एक बहादुर जवान शहीद हो गया और तीन अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। यह घटना उस समय घटी जब सुरक्षा बल जंगल में नक्सलियों के खिलाफ चलाए जा रहे ऑपरेशन में जुटे थे।
धमाके से गूंजा जंगल
बीजापुर के गंगालूर थाना क्षेत्र के जंगलों में रविवार सुबह सुरक्षाबलों की टीम गश्त पर निकली थी। बताया जा रहा है कि टीम को खुफिया सूचना मिली थी कि इलाके में नक्सलियों की गतिविधि तेज हो रही है। इसी दौरान जंगल के बीच एक आईईडी ब्लास्ट हुआ। धमाका इतना जोरदार था कि आसपास के पेड़ों की डालियां तक टूटकर गिर गईं और कई मीटर दूर तक धुआं फैल गया।
शहादत और जख्म
धमाके की चपेट में आकर एक पुलिस जवान ने मौके पर ही शहादत दे दी। वहीं तीन अन्य जवान गंभीर रूप से घायल हो गए। घायल जवानों को तत्काल हेलीकॉप्टर की मदद से जगदलपुर के अस्पताल ले जाया गया, जहां उनका इलाज जारी है। डॉक्टरों ने बताया कि दो जवानों की हालत अब भी नाजुक बनी हुई है।
नक्सलियों की कायराना रणनीति
विशेषज्ञ बताते हैं कि नक्सली जब आमने-सामने लड़ाई में कमजोर पड़ते हैं तो वे आईईडी जैसे घातक हथियारों का इस्तेमाल करते हैं। आईईडी विस्फोट न सिर्फ सुरक्षाबलों के लिए खतरनाक है बल्कि आम ग्रामीणों की जान भी जोखिम में डाल देता है। पिछले एक दशक में नक्सली इलाकों में हुए हमलों में 60% से ज्यादा घटनाएं आईईडी ब्लास्ट से ही जुड़ी हुई हैं।
ऑपरेशन रेड और सुरक्षाबलों की चुनौती
छत्तीसगढ़ पुलिस और सीआरपीएफ इस समय नक्सलियों के खिलाफ “ऑपरेशन रेड हंट” चला रहे हैं। इस अभियान का मकसद जंगलों में नक्सलियों के ठिकानों को ध्वस्त करना और उनके हथियारों के जखीरे को जब्त करना है। बीजापुर, सुकमा और दंतेवाड़ा इस ऑपरेशन के सबसे संवेदनशील जिले हैं।
लेकिन इन अभियानों के दौरान सुरक्षाबलों को लगातार इस तरह के आईईडी जाल का सामना करना पड़ता है। नक्सली पहले से ही जंगल में बारूदी सुरंगें बिछा देते हैं, ताकि गश्ती टीम को निशाना बनाया जा सके।
पिछले हमलों की याद
यह कोई पहली घटना नहीं है। बीजापुर और सुकमा में पहले भी कई बार सुरक्षाबलों को आईईडी ब्लास्ट का शिकार होना पड़ा है।
- अप्रैल 2021 में सुकमा-बिजापुर बॉर्डर पर हुए नक्सली हमले में 22 जवान शहीद हो गए थे।
- मार्च 2024 में दंतेवाड़ा जिले में एक आईईडी धमाके में 10 जवान शहीद हो गए थे।
- इसी साल मई महीने में भी बीजापुर में नक्सलियों ने सड़क निर्माण कार्य पर तैनात सुरक्षाबलों को निशाना बनाया था।
हर बार सवाल यही उठता है कि आखिर कब तक हमारे जवान इस तरह के कायराना हमलों की भेंट चढ़ते रहेंगे?
सरकार और पुलिस का बयान
घटना के तुरंत बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने शहीद जवान को श्रद्धांजलि दी और घायलों के जल्द स्वस्थ होने की कामना की। उन्होंने कहा कि नक्सली हिंसा का मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा और इस हमले के जिम्मेदार किसी भी हालत में बख्शे नहीं जाएंगे।
छत्तीसगढ़ पुलिस के डीजीपी ने बयान जारी कर कहा कि इस ऑपरेशन में लगे जवानों का हौसला बुलंद है और किसी भी कीमत पर नक्सलियों को खत्म करने का अभियान जारी रहेगा।
शहीद का घर रोया, परिवार टूटा
शहीद हुए जवान की पहचान [जवान का नाम] के रूप में हुई है। उनका घर बीजापुर जिले के ही एक छोटे से गांव में है। घर पर मातम पसरा हुआ है। जवान की पत्नी और बूढ़े माता-पिता की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे। गांव के लोग इस शहादत पर गर्व भी कर रहे हैं और साथ ही सवाल भी उठा रहे हैं कि आखिर सरकार कब इस लाल आतंक से मुक्ति दिलाएगी।
नक्सलवाद का घटता लेकिन जारी प्रभाव
सुरक्षा विशेषज्ञ बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में नक्सलवाद की जड़ें कमजोर हुई हैं। कई बड़े नक्सली सरेंडर कर चुके हैं और संगठन की ताकत घट रही है। लेकिन जंगलों के घने इलाकों में उनकी मौजूदगी अब भी चुनौती बनी हुई है। आईईडी और एंबुश हमले नक्सलियों का मुख्य हथियार बन गए हैं, जिससे वे सुरक्षा बलों को नुकसान पहुंचाते हैं।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
इस घटना पर विपक्ष ने भी सरकार को घेरा है। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार सिर्फ बड़े-बड़े दावे करती है लेकिन जमीन पर हालात जस के तस हैं। वहीं भाजपा नेताओं का कहना है कि यह समय राजनीति करने का नहीं, बल्कि नक्सलवाद के खिलाफ मिलकर रणनीति बनाने का है।
आम जनता में डर और गुस्सा
बीजापुर और आसपास के गांवों में इस घटना के बाद भय का माहौल है। लोग कहते हैं कि वे हर रोज डर के साए में जीते हैं। कभी नक्सली धमकी देते हैं, तो कभी सुरक्षाबलों और नक्सलियों की मुठभेड़ में फंसने का डर सताता है। गांव वालों का कहना है कि उन्हें अब शांति चाहिए, खून-खराबा नहीं।
विशेषज्ञों की राय
आंतरिक सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ मानते हैं कि अब समय आ गया है जब नक्सलियों के खिलाफ तकनीक आधारित ऑपरेशन और तेज किए जाएं। ड्रोन, सैटेलाइट और आधुनिक उपकरणों से निगरानी बढ़ाने की जरूरत है। साथ ही, आईईडी डिटेक्शन तकनीक पर ज्यादा निवेश करना होगा।
निष्कर्ष
बीजापुर में हुआ यह आईईडी ब्लास्ट एक बार फिर साबित करता है कि नक्सलवाद आज भी देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। एक ओर जहां हमारे जवान अपनी जान की परवाह किए बिना जंगलों में ऑपरेशन चला रहे हैं, वहीं नक्सली कायराना वारदातों से उनकी पीठ में वार कर रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर कब तक जवानों की शहादत का यह सिलसिला जारी रहेगा?
