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दिल्ली-NCR में आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश: CJI बोले — करेंगे मामले की समीक्षा

भारत के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने दिल्ली-NCR की सड़कों से आवारा कुत्तों को हटाने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश की समीक्षा करने का आश्वासन दिया है।

राजधानी दिल्ली और उससे सटे NCR इलाकों में आवारा कुत्तों का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने बुधवार को कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेश की समीक्षा करेंगे, जिसमें दिल्ली-NCR में स्ट्रे डॉग्स के नियंत्रण और प्रबंधन से जुड़े दिशा-निर्देश जारी किए गए थे। यह बयान उस समय आया, जब इस विषय पर कई पिटीशन और शिकायतें कोर्ट में लंबित हैं।


आवारा कुत्तों का बढ़ता खतरा

दिल्ली-NCR में बीते कुछ वर्षों में आवारा कुत्तों द्वारा काटने की घटनाओं में लगातार इज़ाफा हुआ है।

  • नगर निगम के आंकड़ों के अनुसार, सिर्फ 2024 में दिल्ली में 1.5 लाख से अधिक डॉग बाइट के मामले दर्ज हुए।
  • गाजियाबाद, नोएडा और गुरुग्राम में भी हजारों लोग हर साल इस समस्या से प्रभावित होते हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि कई इलाकों में रात के समय 10-15 कुत्तों के झुंड देखने को मिलते हैं, जो राहगीरों और बच्चों के लिए खतरा बन जाते हैं।


सुप्रीम कोर्ट का पुराना आदेश

साल 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश जारी कर कहा था कि आवारा कुत्तों को मारा नहीं जा सकता, बल्कि उन्हें पकड़कर नसबंदी और टीकाकरण (ABC Programme) के जरिए नियंत्रित करना होगा।

  • आदेश में यह भी कहा गया कि कुत्तों को उनके इलाके से हटाकर कहीं और छोड़ा नहीं जा सकता।
  • स्थानीय निकायों को उनके भोजन और पानी की व्यवस्था करने के निर्देश भी दिए गए थे।

हालांकि, इसके बाद कई राज्य और नगर निकाय इस आदेश को लागू करने में असफल रहे, जिससे लोगों की नाराज़गी बढ़ती गई।


CJI का ताजा बयान — ‘देखेंगे मामला’

एक हालिया सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा,

“हम इस मामले को देखेंगे। हमें संतुलन बनाना होगा — इंसानों की सुरक्षा भी और पशु अधिकार भी।”

CJI के इस बयान के बाद माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट पुराने आदेश की समीक्षा कर सकता है, जिसमें दिल्ली-NCR जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में विशेष नियम बनाए जा सकते हैं।


लोगों की राय बंटी हुई

इस मुद्दे पर जनता की राय दो हिस्सों में बंट गई है।

  • एक पक्ष का कहना है कि आवारा कुत्ते इंसानों पर हमले करते हैं, बीमारियां फैलाते हैं और सड़क दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं, इसलिए इनके खिलाफ सख्त कदम जरूरी हैं।
  • दूसरा पक्ष मानता है कि कुत्ते भी जीवित प्राणी हैं और उन्हें मारना अमानवीय है; समाधान मानवीय तरीके से निकालना चाहिए।

सोशल मीडिया पर यह बहस और भी तीखी हो गई है। ट्विटर (X) पर #StrayDogs और #DogBite जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे।


डॉग लवर्स का तर्क

पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि समस्या का हल कुत्तों को मारना नहीं है, बल्कि उन्हें सही तरीके से मैनेज करना है।

  • ABC Programme को तेज़ी से लागू करना।
  • बायो-वेस्ट और गंदगी की सफाई ताकि कुत्तों को भोजन आसानी से न मिले।
  • डॉग लवर्स और रेस्क्यू ग्रुप्स के साथ मिलकर कुत्तों को शेल्टर में शिफ्ट करना।

उनका यह भी कहना है कि कई बार डॉग बाइट की घटनाएं इंसानों की तरफ से उकसावे या डराने के कारण होती हैं।


प्रभावित लोगों की शिकायतें

दूसरी ओर, डॉग अटैक से पीड़ित लोग और उनके परिजन बेहद नाराज़ हैं।

  • एक महिला ने बताया कि उनके 7 साल के बेटे को पार्क में खेलते समय 4 कुत्तों ने काट लिया।
  • गुरुग्राम के एक बुजुर्ग ने कहा कि सुबह की वॉक के दौरान 6-7 कुत्तों ने उन पर हमला कर दिया, जिससे वे गिरकर घायल हो गए।

इन मामलों में अस्पतालों में एंटी-रेबीज वैक्सीन की मांग बढ़ गई है, लेकिन कई बार वैक्सीन की कमी भी सामने आती है।


NCR में स्थिति कितनी गंभीर?

  • दिल्ली: निगम के मुताबिक लगभग 4.5 लाख आवारा कुत्ते हैं।
  • नोएडा: करीब 40,000 स्ट्रे डॉग्स, जिनमें से सिर्फ 30% की नसबंदी हुई है।
  • गुरुग्राम: नगर निगम के पास पर्याप्त डॉग कैचर टीम नहीं है।
  • गाजियाबाद: प्रतिदिन औसतन 150 डॉग बाइट केस दर्ज हो रहे हैं।

नगर निकायों की दुविधा

नगर निकायों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारण वे सीमित विकल्पों में फंसे हुए हैं।

  • नसबंदी और टीकाकरण का काम महंगा और समय लेने वाला है।
  • शेल्टर होम की कमी के कारण पकड़े गए कुत्तों को वापस उसी इलाके में छोड़ना पड़ता है।

इस वजह से समस्या कम होने के बजाय और बढ़ रही है।


क्या बदल सकता है SC का रुख?

अगर सुप्रीम कोर्ट पुराने आदेश में संशोधन करता है, तो संभव है कि —

  1. हाई-रिस्क एरिया में स्ट्रे डॉग्स को अस्थायी रूप से हटाया जा सके।
  2. बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए विशेष जोन बनाए जाएं।
  3. नसबंदी और टीकाकरण की समयसीमा तय की जाए।

कई राज्यों ने पहले ही कोर्ट से आग्रह किया है कि उन्हें अधिक अधिकार दिए जाएं, ताकि वे स्थानीय जरूरतों के हिसाब से कार्रवाई कर सकें।


विशेषज्ञों की राय

  • पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट: “रेबीज जैसी बीमारियों के खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हमें हेल्थ और एनिमल वेलफेयर के बीच बैलेंस बनाना होगा।”
  • लीगल एनालिस्ट: “SC के पास यह मौका है कि वह एक स्पष्ट और व्यावहारिक नीति बनाए, जिसमें इंसानों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए।”

निष्कर्ष — संतुलित समाधान की जरूरत

दिल्ली-NCR में आवारा कुत्तों का मुद्दा सिर्फ एक कानूनी मामला नहीं, बल्कि यह जन स्वास्थ्य, सुरक्षा और पशु अधिकारों से जुड़ा जटिल विषय है। सुप्रीम कोर्ट के आने वाले फैसले से न केवल राजधानी, बल्कि पूरे देश में स्ट्रे डॉग्स के मैनेजमेंट की दिशा तय हो सकती है।

CJI का “देखेंगे मामला” कहना इस ओर इशारा करता है कि शायद अब इस पुराने आदेश की नई समीक्षा होगी — उम्मीद यही है कि इसका हल ऐसा निकले जो न इंसानों के लिए खतरा बने और न ही बेजुबानों के लिए मौत का फरमान।

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Harshita Ahuja

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