जयशंकर का यह दौरा वैश्विक कूटनीति के लिए एक संवेदनशील समय में हो रहा है, क्योंकि यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस फैसले के तुरंत बाद आ रहा है, जिसमें उन्होंने भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की है।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर जल्द ही रूस की राजधानी मास्को का दौरा करने वाले हैं, जहां वे अपने रूसी समकक्ष सर्गेई लावरोव से द्विपक्षीय और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा करेंगे। यह दौरा ऐसे समय पर हो रहा है जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति और रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर टैरिफ को लेकर वैश्विक व्यापार जगत में हलचल मचा दी है। ट्रम्प के हालिया बयान और संभावित नीति बदलाव से भारत सहित कई देशों के आर्थिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में जयशंकर का रूस दौरा न केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूती देने के लिए अहम है, बल्कि यह भारत की बहुस्तरीय कूटनीतिक रणनीति का भी हिस्सा माना जा रहा है।
अमेरिकी टैरिफ विवाद की पृष्ठभूमि
ट्रम्प ने हाल ही में एक बयान में कहा कि अगर वे फिर से सत्ता में आते हैं, तो चीन, भारत, रूस और यूरोपीय देशों के खिलाफ कड़े टैरिफ लगाएंगे ताकि “अमेरिका फर्स्ट” नीति को पूरी तरह लागू किया जा सके। इस बयान ने वैश्विक शेयर बाजारों और विदेशी व्यापार नीतियों में चिंता बढ़ा दी है। भारत, जो अमेरिका और रूस दोनों का अहम साझेदार है, के लिए यह स्थिति संवेदनशील है। ऐसे में रूस के साथ सामरिक और आर्थिक साझेदारी को मजबूत करना भारत के लिए प्राथमिकता बन गया है।
भारत-रूस संबंध: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत और रूस के संबंध दशकों पुराने हैं। सोवियत संघ के समय से ही दोनों देशों ने रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष और विज्ञान के क्षेत्रों में गहरे सहयोग बनाए रखा है। रूस आज भी भारत का सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता है और ऊर्जा सुरक्षा के मामले में भी अहम भूमिका निभाता है। पिछले कुछ वर्षों में, अमेरिका के दबाव और पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने रूस के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को बरकरार रखा है। विशेष रूप से यूक्रेन युद्ध के बाद, भारत ने रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदकर न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी कीं बल्कि सस्ते दामों पर आयात कर अर्थव्यवस्था को भी लाभ पहुंचाया।
मास्को में संभावित एजेंडा
सूत्रों के अनुसार, जयशंकर और लावरोव की बैठक में निम्न मुद्दे प्रमुख रहेंगे—
- ऊर्जा सहयोग: भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल के आयात को और बढ़ाने पर चर्चा।
- रक्षा सहयोग: नई रक्षा डील और मौजूदा परियोजनाओं की प्रगति का आकलन।
- यूक्रेन युद्ध: शांति प्रक्रिया और वैश्विक स्थिरता पर विचार-विमर्श।
- बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग: BRICS, SCO और G20 में साझा रणनीति।
- व्यापारिक बाधाओं को दूर करना: अमेरिकी टैरिफ और पश्चिमी प्रतिबंधों के प्रभाव से निपटने के उपाय।
अमेरिका-रूस-भारत त्रिकोण
अमेरिका, रूस और भारत का कूटनीतिक समीकरण बेहद जटिल है। एक तरफ भारत अमेरिका के साथ QUAD और इंडो-पैसिफिक रणनीति में सक्रिय है, तो दूसरी तरफ रूस के साथ दशकों पुराना रक्षा और ऊर्जा सहयोग बनाए हुए है। ट्रम्प के टैरिफ बयान ने भारत को एक बार फिर संतुलन साधने की चुनौती दे दी है। अगर अमेरिका भारत के निर्यात पर भारी टैरिफ लगाता है, तो भारत को रूस और अन्य साझेदार देशों के साथ अपने व्यापारिक नेटवर्क को और मजबूत करना होगा।
ट्रम्प फैक्टर और भारत की रणनीति
ट्रम्प के पिछले कार्यकाल में भी भारत को टैरिफ और व्यापारिक मुद्दों पर कई बार मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। 2019 में अमेरिका ने भारत को ‘जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज’ (GSP) से बाहर कर दिया था, जिससे भारत के कई उत्पादों पर अमेरिकी बाजार में अधिक शुल्क लगने लगा। अगर ट्रम्प फिर से सत्ता में आते हैं और इसी तरह की नीतियां अपनाते हैं, तो भारत को अपने निर्यात और आयात चैनलों में बड़ा बदलाव करना पड़ सकता है। रूस इस बदलाव का एक अहम विकल्प हो सकता है।
रक्षा क्षेत्र में नए अवसर
भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग लंबे समय से मजबूत रहा है। S-400 एयर डिफेंस सिस्टम से लेकर सुखोई और मिग फाइटर जेट्स तक, भारत की रक्षा तैयारियों में रूस का बड़ा योगदान है। मास्को में होने वाली इस बैठक में नए रक्षा सौदों पर भी चर्चा हो सकती है। खासतौर पर नौसेना के लिए पनडुब्बी और मिसाइल तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की संभावना है।
ऊर्जा साझेदारी: भारत की प्राथमिकता
रूस दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा निर्यातकों में से एक है, और भारत तेजी से ऊर्जा उपभोग करने वाले देशों में शामिल है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर तेल और गैस के निर्यात को लेकर प्रतिबंध लगाए, लेकिन भारत ने इन प्रतिबंधों को दरकिनार करते हुए रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदा। जयशंकर का यह दौरा दोनों देशों के बीच ऊर्जा साझेदारी को और मजबूत करने का अवसर बन सकता है।
पश्चिमी दबाव और भारत का रुख
अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस के साथ भारत के ऊर्जा व्यापार को लेकर कई बार असंतोष जताया है, लेकिन भारत ने स्पष्ट किया है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों के लिए स्वतंत्र नीति अपनाएगा। जयशंकर कई बार सार्वजनिक मंचों से यह कह चुके हैं कि भारत किसी एक ब्लॉक की राजनीति में शामिल नहीं है और अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर
अगर ट्रम्प का टैरिफ प्लान लागू होता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ा उथल-पुथल हो सकता है। अमेरिका, चीन, रूस और भारत जैसे बड़े खिलाड़ी अगर आपसी व्यापार में कठोर रुख अपनाते हैं, तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और मूल्य स्थिरता पर गहरा असर पड़ेगा। भारत इस स्थिति से बचने के लिए वैकल्पिक व्यापार मार्ग और साझेदारियां खोज रहा है, और रूस इसमें एक स्वाभाविक सहयोगी है।
निष्कर्ष
जयशंकर का मास्को दौरा केवल एक नियमित कूटनीतिक यात्रा नहीं है, बल्कि यह भारत की बहु-आयामी विदेश नीति का अहम हिस्सा है। अमेरिका के साथ संभावित टकराव, रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा सहयोग, और वैश्विक शक्ति संतुलन—इन सभी मुद्दों के बीच यह दौरा भारत के लिए रणनीतिक मायने रखता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि मास्को से भारत किस तरह की ठोस उपलब्धियां लेकर लौटता है और ट्रम्प के टैरिफ संग्राम के बीच अपने कूटनीतिक पत्ते कैसे खेलता है।
