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गाज़ा में मौत का मंजर, इज़रायल पर प्रियंका गांधी का वार – केंद्र की खामोशी को बताया शर्मनाक

प्रियंका गांधी ने एक्स (X) पर एक पोस्ट में कहा, “इज़रायल सरकार नरसंहार कर रही है। उसने 60,000 से अधिक लोगों की हत्या की है, जिनमें 18,430 बच्चे शामिल हैं। उसने सैकड़ों लोगों को भुखमरी से मौत के घाट उतार दिया है।”

गाज़ा में जारी हिंसा और इज़रायल के कथित हमलों को लेकर भारत की सियासत में नया तूफ़ान आ गया है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने मंगलवार को केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि गाज़ा में हो रहे ‘नरसंहार’ पर भारत का मौन रहना शर्मनाक है। प्रियंका ने साफ कहा कि एक लोकतांत्रिक देश और मानवीय मूल्यों के पक्षधर के रूप में भारत को चुप नहीं रहना चाहिए, बल्कि इस मुद्दे पर वैश्विक स्तर पर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।


गाज़ा में क्या हो रहा है?

पिछले कई महीनों से गाज़ा में इज़रायल और हमास के बीच संघर्ष लगातार बढ़ता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, गाज़ा के कई हिस्सों में नागरिक इलाकों पर बमबारी और सैन्य अभियान से भारी तबाही हुई है। संयुक्त राष्ट्र और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इसे गंभीर मानवीय संकट मान रही हैं। हाल ही में आई रिपोर्टों में हजारों नागरिकों, जिनमें बच्चे और महिलाएं भी शामिल हैं, के मारे जाने की पुष्टि हुई है।


प्रियंका गांधी का बयान

दिल्ली में आयोजित एक प्रेस वार्ता में प्रियंका गांधी ने कहा:

“गाज़ा में निर्दोष बच्चों और महिलाओं पर हो रहे हमले किसी भी मानवीय समाज के लिए अस्वीकार्य हैं। यह सीधा-सीधा नरसंहार है। भारत जैसे लोकतांत्रिक और नैतिक रूप से जिम्मेदार देश का चुप रहना केवल निराशाजनक ही नहीं, बल्कि शर्मनाक भी है।”

उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास हमेशा पीड़ितों के साथ खड़े होने का रहा है, चाहे वह दक्षिण अफ्रीका का रंगभेद आंदोलन हो या एशिया-अफ्रीका में उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष। ऐसे में मौजूदा स्थिति में भारत को अपनी “रणनीतिक चुप्पी” तोड़नी चाहिए।


केंद्र की चुप्पी पर सवाल

प्रियंका गांधी ने केंद्र सरकार से सीधे सवाल करते हुए पूछा कि आखिर किस कारण से भारत गाज़ा मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र या किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्पष्ट बयान देने से बच रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत की विदेश नीति “राजनीतिक समीकरणों और व्यावसायिक हितों” से बंधी हुई है, जिसके चलते मानवीय मुद्दों को पीछे रखा जा रहा है।


कांग्रेस का रुख

कांग्रेस पार्टी ने इस मुद्दे पर आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा है कि पार्टी गाज़ा में हो रहे हमलों की निंदा करती है और भारत सरकार से मांग करती है कि वह इज़रायल से हिंसा रोकने और मानवीय सहायता पहुंचाने की अपील करे। पार्टी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में भी इस मुद्दे को उठाने की मांग की है।


भाजपा का पलटवार

भाजपा नेताओं ने प्रियंका गांधी के बयान को “राजनीतिक नौटंकी” बताया। भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि सरकार की विदेश नीति संतुलित और रणनीतिक है। उनका कहना था कि भारत दोनों पक्षों को हिंसा रोकने और वार्ता का रास्ता अपनाने की अपील करता रहा है। भाजपा ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वह अंतरराष्ट्रीय मामलों में बिना तथ्यों की जांच किए बयानबाज़ी कर रही है।


अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं

गाज़ा संकट पर दुनिया भर में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। अमेरिका ने इज़रायल के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन किया है, लेकिन साथ ही नागरिक हताहतों पर चिंता जताई है। यूरोपीय संघ ने तत्काल युद्धविराम की अपील की है, जबकि कई मुस्लिम देश इज़रायल के खिलाफ खुलकर बयान दे रहे हैं।

भारत ने अब तक इस मुद्दे पर केवल “शांतिपूर्ण समाधान” और “संयम बरतने” की अपील की है, लेकिन किसी पक्ष का नाम लेकर आलोचना नहीं की है। यही वह बिंदु है जिस पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल सरकार पर हमलावर हैं।


सोशल मीडिया पर हलचल

प्रियंका गांधी के बयान के बाद सोशल मीडिया पर #GazaGenocide और #IndiaMustSpeak जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। कई यूजर्स ने प्रियंका के रुख का समर्थन किया, तो कई ने इसे राजनीति से प्रेरित बताया। ट्विटर और इंस्टाग्राम पर गाज़ा की तस्वीरें और वीडियो शेयर कर लोग केंद्र की चुप्पी पर सवाल उठा रहे हैं।


मानवाधिकार संगठनों की चिंता

एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच जैसी संस्थाओं ने भी गाज़ा में जारी हिंसा को नरसंहार की श्रेणी में रखते हुए जांच की मांग की है। उनका कहना है कि नागरिक इलाकों पर हमला अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। इन संगठनों ने भारत जैसे देशों से अपील की है कि वे खुले तौर पर इस हिंसा की निंदा करें।


भारत-इज़रायल संबंधों का संदर्भ

भारत और इज़रायल के बीच पिछले एक दशक में रक्षा, कृषि, टेक्नोलॉजी और व्यापार के क्षेत्र में मजबूत रिश्ते बने हैं। 2014 के बाद इन संबंधों में और तेजी आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यही कारण है कि भारत इस मुद्दे पर खुलकर बयान देने से बच रहा है, क्योंकि इससे दोनों देशों के रणनीतिक और आर्थिक रिश्तों पर असर पड़ सकता है।


विपक्ष का दबाव

कांग्रेस के अलावा लेफ्ट पार्टियां, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने भी गाज़ा में हो रही हिंसा की निंदा करते हुए केंद्र से स्पष्ट रुख अपनाने की मांग की है। लेफ्ट पार्टियों ने संसद में भी इस मुद्दे पर चर्चा की मांग की है।


अंतरराष्ट्रीय कानून और नरसंहार की परिभाषा

संयुक्त राष्ट्र के “जेनोसाइड कन्वेंशन” के अनुसार, किसी भी जातीय, धार्मिक या राष्ट्रीय समूह का सुनियोजित विनाश नरसंहार कहलाता है। गाज़ा में हो रही घटनाओं को कई अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक इसी श्रेणी में रख रहे हैं। हालांकि, इज़रायल का कहना है कि वह केवल “आतंकवादी संगठनों” को निशाना बना रहा है।


क्या भारत बदलेगा अपना रुख?

विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि प्रियंका गांधी के बयान से घरेलू दबाव तो बढ़ेगा, लेकिन भारत का आधिकारिक रुख तुरंत बदलना मुश्किल है। भारत अपनी अंतरराष्ट्रीय रणनीति को संतुलित रखने के लिए ऐसे मुद्दों पर अक्सर तटस्थ रहता है।


निष्कर्ष

प्रियंका गांधी के बयान ने गाज़ा संकट को लेकर भारत में राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। अब यह देखना होगा कि क्या केंद्र सरकार अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपना रुख बदलती है या पहले की तरह “संतुलित नीति” अपनाए रखती है। फिलहाल, गाज़ा में हालात गंभीर हैं और दुनिया भर में मानवाधिकार संगठनों की अपीलें तेज हो रही हैं।

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Harshita Ahuja

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