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भारत के लिए यह मंजूर नहीं!” — ट्रंप सहयोगी का बड़ा आरोप: रूस की जंग को फंड कर रहा है नई दिल्ली?

ट्रंप के सहयोगी का यह बयान उस वक्त आया जब भारत ने साफ कर दिया कि वह रूस से तेल की खरीद जारी रखेगा
भारत का कहना है कि रूस से तेल खरीदने का निर्णय कई अहम बिंदुओं पर विचार करने के बाद लिया गया, जिनमें कीमत, क्रूड की गुणवत्ता, भंडार, लॉजिस्टिक्स और अन्य आर्थिक पहलू शामिल हैं।

अमेरिकी राजनीति में चुनावी गर्मी चरम पर है, और इसी बीच एक सनसनीखेज बयान ने भारत-अमेरिका संबंधों में हलचल मचा दी है। डोनाल्ड ट्रंप के करीबी और पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने भारत पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि “नई दिल्ली रूस-यूक्रेन युद्ध को अप्रत्यक्ष रूप से फंड कर रही है।”
उनका यह बयान न केवल कूटनीतिक हलकों में तूफान ले आया है, बल्कि सोशल मीडिया से लेकर भारतीय संसद तक चर्चा का विषय बन चुका है।


ट्रंप कैंप से सीधे वार

जॉन बोल्टन, जो ट्रंप प्रशासन में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे और वर्तमान में रिपब्लिकन पार्टी के विदेश नीति सलाहकार मंडल के प्रभावशाली सदस्य हैं, ने एक अमेरिकी थिंक टैंक कार्यक्रम में कहा:

भारत का रूस से कच्चा तेल खरीदना और भारी मात्रा में व्यापार करना, सीधे-सीधे युद्ध को फंड करने जैसा है। यह अमेरिका के लिए चिंता का विषय है और भारत के लिए यह स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।

इस बयान के साथ ही ट्रंप खेमे ने पहली बार खुले तौर पर भारत की यूक्रेन युद्ध में कथित भूमिका को निशाने पर लिया है।


भारत ने खरीदा रूस से कच्चा तेल — लेकिन क्यों?

2022 में जब यूक्रेन पर रूस का आक्रमण शुरू हुआ, तब पश्चिमी देशों ने रूस पर सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाए। अमेरिका और यूरोपीय यूनियन ने रूस से तेल खरीदना लगभग बंद कर दिया।
लेकिन भारत ने “नेशन फर्स्ट” नीति अपनाते हुए रूस से छूट पर कच्चा तेल खरीदना जारी रखा।
इसका कारण स्पष्ट था — भारत को अपने नागरिकों के लिए सस्ते ईंधन की आवश्यकता थी।

परंतु अब यही रणनीति अमेरिकी राजनीति में भारत के खिलाफ एक हथियार बन चुकी है।


ट्रंप की चुप्पी, सलाहकार की मुखरता

हालांकि डोनाल्ड ट्रंप ने अब तक इस विषय पर कोई सीधा बयान नहीं दिया है, लेकिन उनके करीबी सहयोगियों की ओर से दिए जा रहे संकेत स्पष्ट हैं — अगर ट्रंप सत्ता में लौटते हैं तो भारत पर कड़ा रुख अपनाया जा सकता है।
बोल्टन के बयान को ट्रंप कैंप की ओर से एक नरम धमकी के तौर पर देखा जा रहा है।


अमेरिका का दोहरा रवैया?

भारतीय विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका का यह रुख दोहरे मापदंड का प्रतीक है।
वरिष्ठ विदेश नीति विशेषज्ञ प्रो. राजीव भटनागर कहते हैं:

जब अमेरिका ने अफगानिस्तान, इराक और लीबिया में कार्रवाई की, तब क्या किसी ने उसे ‘युद्ध फंडिंग’ कहा? आज भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए एक व्यापारिक समझौता कर रहा है तो वह ‘जंग का फंडर’ कैसे हो गया?

भारत के लिए रूस न केवल रक्षा सहयोगी है, बल्कि वर्षों पुरानी रणनीतिक साझेदारी का हिस्सा भी है।


मोदी सरकार की चुप्पी — रणनीति या तनाव?

सरकार की ओर से अब तक इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि भारत शांतिपूर्ण समाधान का पक्षधर है और किसी भी युद्ध को समर्थन देने का प्रश्न ही नहीं उठता।

हालांकि, बीजेपी के कुछ सांसदों ने मीडिया में बोल्टन के बयान को “गैर-जिम्मेदाराना और दोगली कूटनीति” बताया है।


विपक्ष का हमला — “मोदी सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भारत की साख गिराई”

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेर लिया है।
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा:

मोदी सरकार की विदेश नीति का ये कैसा कमाल है कि आज भारत पर युद्ध फंडिंग के आरोप लग रहे हैं?
वहीं, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने संसद में सवाल उठाया कि क्या भारत रूस-यूक्रेन युद्ध में निष्पक्ष भूमिका निभा रहा है या नहीं?


अमेरिकी चुनाव और भारत कार्ड

यह बात भी गौर करने लायक है कि यह बयान उस समय आया है जब अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव नजदीक हैं। डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन दोनों पार्टियाँ भारत को एक रणनीतिक मोहरे की तरह देखती हैं।
रिपब्लिकन कैंप के लिए रूस को बड़ा मुद्दा बनाना और भारत को घसीटना एक चुनावी रणनीति भी हो सकती है।

राजनयिकों का मानना है कि भारत के साथ कड़ा रुख अपनाकर ट्रंप खुद को एक सख्त और स्पष्ट नेता के रूप में पेश करना चाहते हैं।


रूस की चुप्पी — भारत को मिला संकेत?

रूस ने इस विवाद पर कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन यह साफ है कि रूस भारत को सबसे भरोसेमंद खरीदार मानता है।
भारत ने न केवल तेल खरीदा, बल्कि रूसी मुद्रा (रूबल) में भुगतान व्यवस्था भी तैयार की, जिससे दोनों देशों के आर्थिक संबंध और मजबूत हुए।

यही बात अमेरिका को सबसे अधिक अखरती है — एक रणनीतिक साझेदार भारत, उसकी प्रतिबंध नीति को खुली चुनौती दे रहा है।


यूक्रेन की भी नाराज़गी?

यूक्रेन के विदेश मंत्रालय ने भी अप्रत्यक्ष रूप से भारत के व्यवहार पर चिंता जाहिर की है।
यूक्रेन के राजदूत ने पिछले साल कहा था कि “जो देश रूस से व्यापार कर रहे हैं, वे युद्ध को बढ़ा रहे हैं।
हालांकि भारत और यूक्रेन के बीच कूटनीतिक संबंध अब तक औपचारिक और संतुलित रहे हैं।


एक्सपर्ट्स की राय — भारत को कठोर जवाब देना चाहिए

विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अमेरिका के इस तरह के अप्रत्याशित बयानों पर चुप नहीं रहना चाहिए।
पूर्व विदेश सचिव शशांक का कहना है:

भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र है और उसकी ऊर्जा नीति किसी के इशारों पर नहीं चलेगी। अगर अमेरिका को समस्या है, तो वह वार्ता करे, सार्वजनिक अपमान नहीं।


निष्कर्ष: राजनीति, कूटनीति और ईंधन की लड़ाई

जॉन बोल्टन का बयान सिर्फ एक व्यक्ति की राय नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक कूटनीति का संकेत है।
भारत को अब यह तय करना होगा कि वह रूस से अपने संबंधों को कैसे संतुलित रखे, जबकि अमेरिका और पश्चिमी जगत से उसकी दोस्ती भी गहराई पर है।

मोदी सरकार के लिए यह एक कूटनीतिक परीक्षा है — क्या वह राष्ट्रीय हित और वैश्विक दबावों के बीच संतुलन बना पाएगी?


तो क्या भारत वास्तव में युद्ध को फंड कर रहा है, या यह पश्चिमी राजनीति का भारत विरोधी प्रोपेगेंडा है?
इस सवाल का जवाब आने वाले महीनों में भारत की कूटनीति तय करेगी।

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Harshita Ahuja

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