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अब भारत नहीं खरीदेगा रूस से तेल!” – ट्रंप ने बताया ‘स्मार्ट मूव’, टैरिफ जंग में अब कौन किसके साथ?

भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है, 2022 में मॉस्को पर लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद से रियायती दरों पर रूसी तेल का एक प्रमुख खरीदार रहा है।

दुनिया की सबसे बड़ी ऊर्जा साझेदारियों में से एक — भारत और रूस के बीच का तेल व्यापार — अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। सूत्रों की मानें तो भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद पर ‘अनिश्चितकालीन विराम’ लगाने का फैसला किया है। यह निर्णय ऐसे समय पर आया है जब भारत और अमेरिका के बीच टैरिफ युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के इस कदम को “स्मार्ट मूव” करार देते हुए सार्वजनिक रूप से खुले दिल से स्वागत किया है।

अब सवाल यह उठता है — क्या भारत ने रणनीतिक रूप से रूस से दूरी बनाकर अमेरिका की तरफ निर्णायक झुकाव कर लिया है? और क्या ट्रंप की यह प्रतिक्रिया अमेरिकी राजनीति का चुनावी पैंतरा है या वाकई भारत के लिए समर्थन का इशारा?


क्या है पूरा मामला? क्यों टूटा भारत-रूस तेल गठबंधन?

वर्ष 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूस से डिस्काउंटेड रेट्स पर भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदना शुरू किया था। इसने भारत को ऊर्जा संकट से उबरने और महंगाई को नियंत्रित करने में मदद की। रूस, ओपेक देशों के मुकाबले काफी कम कीमत पर तेल दे रहा था और भारत इसका सबसे बड़ा खरीदार बन गया था।

लेकिन अब, जुलाई 2025 में भारत सरकार ने अचानक रूस से नई तेल डील्स पर स्थगन की घोषणा कर दी है। वाणिज्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार,

“यह एक सामरिक निर्णय है जो भारत की ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य और आर्थिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।”


ट्रंप की प्रतिक्रिया: “भारत का कदम बिल्कुल सही दिशा में”

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति और 2024 के रिपब्लिकन पार्टी के संभावित उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने इस फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा:

“भारत का रूस से तेल खरीदना, खासकर ऐसे समय में जब पुतिन युद्ध छेड़े हुए हैं, एक गलती थी। लेकिन अब जो कदम उठाया गया है, वह समझदारी भरा और अमेरिका-भारत रिश्तों के लिहाज से सकारात्मक है।”

ट्रंप ने यह भी जोड़ा कि अगर वह फिर से सत्ता में आए, तो भारत को “एनर्जी सुपर पार्टनर” का दर्जा देंगे और अमेरिकी ऊर्जा कंपनियों को भारत में सीधे निवेश के लिए प्रेरित करेंगे।


टैरिफ विवाद की पृष्ठभूमि: भारत-अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव

भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में टैरिफ युद्ध की स्थिति बन गई है। अमेरिका ने भारतीय इस्पात, टेक्सटाइल और इलेक्ट्रॉनिक सामानों पर अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने की धमकी दी थी, जिसके जवाब में भारत ने भी पेकन नट्स और वाइन पर टैरिफ बढ़ाने की घोषणा की।

हालांकि, राष्ट्रपति जो बाइडन प्रशासन ने ट्रंप के बयान से दूरी बना ली और कहा कि “भारत एक स्वतंत्र ऊर्जा नीति रखता है, और अमेरिका उसमें हस्तक्षेप नहीं करता।”

परंतु ट्रंप की प्रतिक्रिया इस बात का संकेत दे रही है कि उनकी भारत नीति वर्तमान प्रशासन से अलग और अधिक ‘व्यक्तिगत’ हो सकती है।


भारत की ऊर्जा नीति: क्या अब अमेरिका होगा नया सप्लायर?

भारत हर साल लगभग 24 लाख बैरल प्रति दिन का तेल आयात करता है, जिसमें रूस की हिस्सेदारी 2024 में 40% तक पहुँच गई थी। अब यदि रूस से तेल खरीद बंद की जाती है, तो भारत को नया विकल्प तलाशना होगा।

अमेरिका पहले ही भारत को LNG (Liquefied Natural Gas) और शेल ऑयल की आपूर्ति कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब अमेरिकी ऊर्जा बाजार की तरफ कदम बढ़ा सकता है।

ऊर्जा विश्लेषक डॉ. अनुराग भटनागर कहते हैं:

“भारत का अमेरिका की तरफ झुकाव केवल तेल की बात नहीं है, यह एक भू-राजनीतिक संकेत है कि भारत अब चीन-रूस धुरी से दूरी बना रहा है और लोकतांत्रिक देशों के साथ खड़ा हो रहा है।”


रूस की प्रतिक्रिया: ‘भारत को हमारे भरोसे से पीछे हटना महंगा पड़ेगा’

रूस ने इस घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। क्रेमलिन प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा:

“भारत का यह फैसला केवल एक आर्थिक निर्णय नहीं बल्कि एक रणनीतिक पलायन है। रूस को यह स्वीकार नहीं होगा कि हमारे पुराने साझेदार अमेरिका के इशारे पर नीतियां बनाएं।”

रूसी मीडिया में यह भी रिपोर्ट किया गया कि भारत की इस घोषणा के बाद रूस ने अपनी गैस डील पर पुनर्विचार शुरू कर दिया है और ईरान तथा तुर्की जैसे देशों के साथ वैकल्पिक साझेदारी की योजना बना रहा है।


अमेरिका-भारत के रिश्तों में नई जान या ‘ट्रंप कार्ड’?

ट्रंप के बयान के बाद विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर वे 2024 में दोबारा राष्ट्रपति बनते हैं, तो अमेरिका-भारत संबंधों में नया मोड़ आएगा। ट्रंप पहले भी भारत के साथ रक्षा, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी को बढ़ावा देते रहे हैं।

राजनयिक विश्लेषक मीनाक्षी कौल कहती हैं:

“ट्रंप भारत को चीन के खिलाफ एक रणनीतिक सहयोगी के रूप में देखते हैं। तेल व्यापार का यह बदलाव उन्हें उस दिशा में भारत को और करीब लाने का अवसर देगा।”


विपक्षी राजनीति: भारत सरकार को घेरा

भारत में विपक्ष ने सरकार से सवाल पूछना शुरू कर दिया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा:

“जब रूस ने हमें सस्ते दाम पर तेल दिया और हमने उससे महंगाई को नियंत्रित किया, तब वही सरकार अब अमेरिका को खुश करने के लिए देश के आर्थिक हितों को दांव पर क्यों लगा रही है?”

वहीं लेफ्ट पार्टियों ने कहा कि यह फैसला “गैर-गठबंधन नीति” के खिलाफ है और भारत को किसी गुट में नहीं जाना चाहिए।


सोशल मीडिया की गूंज: #IndiaDumpsRussia ट्रेंड में

भारत के इस कदम ने ट्विटर और इंस्टाग्राम पर आग लगा दी। #IndiaDumpsRussia और #TrumpOnIndia ट्रेंड कर रहे हैं। कुछ लोगों ने सरकार की तारीफ की कि भारत अब वैश्विक पटल पर साहसिक निर्णय ले रहा है, तो कुछ ने सरकार को “अमेरिका की कठपुतली” करार दिया।

एक यूजर ने ट्वीट किया:

“रूस से तेल खरीद बंद करना अच्छा कदम है, लेकिन यह कदम स्वतंत्रता से लिया गया है या दबाव में?”


क्या भारत रूस से दोबारा जुड़ सकता है?

ऊर्जा मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि यह कदम “स्थायी” नहीं है बल्कि “फिलहाल की भू-राजनीतिक स्थितियों को देखते हुए” लिया गया है। यानी भविष्य में यदि अमेरिका से बातचीत बिगड़ती है या रूस भारत को और बेहतर प्रस्ताव देता है, तो स्थिति पलट सकती है।


निष्कर्ष: क्या भारत ने सही दांव खेला?

भारत का रूस से तेल खरीद बंद करना एक आर्थिक से अधिक राजनीतिक फैसला है। ट्रंप की सराहना बताती है कि अमेरिका के एक धड़े को यह फैसला बहुत रास आया है। पर सवाल यह भी है कि क्या भारत ने इस कदम से अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता को कमजोर किया है?

भारत के पास अब विकल्प कम हैं लेकिन दांव बड़ा है। यदि यह दांव सफल होता है, तो भारत वैश्विक शक्ति समीकरणों में एक निर्णायक भूमिका निभा सकता है। लेकिन अगर यह कदम अमेरिका को खुश करने के चक्कर में अपने पुराने मित्र रूस को नाराज़ कर देता है, तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।

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Harshita Ahuja

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