भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने बिहार में गंभीर वित्तीय अनियमितताओं की ओर इशारा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार ने 31 मार्च 2024 तक की स्थिति में ₹70,877.61 करोड़ की परियोजनाओं के लिए उपयोग प्रमाणपत्र (Utilisation Certificates – UCs) जमा नहीं किए हैं।

बिहार सरकार पर एक बार फिर वित्तीय कुप्रबंधन के गंभीर आरोप लगे हैं। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की हालिया रिपोर्ट ने राज्य सरकार की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, बिहार सरकार ने वर्ष 2002-03 से लेकर 2021-22 तक के दौरान ₹70,000 करोड़ से अधिक की विभिन्न योजनाओं के उपयोग प्रमाणपत्र (UCs) अब तक प्रस्तुत नहीं किए हैं।
यह न केवल वित्तीय अनुशासन की अनदेखी है, बल्कि यह संकेत भी देता है कि कहीं न कहीं योजनाओं में गड़बड़ी या भ्रष्टाचार छिपाया जा रहा है। इस खुलासे के बाद विपक्ष ने भी नीतीश सरकार को घेरना शुरू कर दिया है।
🔍 क्या है उपयोग प्रमाणपत्र (Utilisation Certificate)?
उपयोग प्रमाणपत्र एक ऐसा दस्तावेज होता है, जिसे किसी परियोजना पर खर्च किए गए फंड का उचित उपयोग साबित करने के लिए जमा किया जाता है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना होता है कि सरकारी फंड का दुरुपयोग न हो और राशि निर्धारित उद्देश्य के लिए ही खर्च की गई हो। UCs जमा न होने का मतलब यह है कि खर्च हुए पैसे का कोई लेखा-जोखा मौजूद नहीं है।
📊 CAG रिपोर्ट में क्या कहा गया है?
CAG की रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि लगभग ₹70,000 करोड़ की राशि जिन परियोजनाओं के लिए राज्य सरकार को आवंटित की गई थी, उनके उपयोग प्रमाणपत्र जमा नहीं किए गए हैं। रिपोर्ट में चिंता जताई गई है कि यह स्थिति वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही को गंभीर रूप से प्रभावित करती है।
रिपोर्ट के मुताबिक:
- कुल 2,06,652 UCs बकाया हैं।
- इनमें सबसे ज़्यादा प्रमाणपत्र शिक्षा विभाग, पंचायती राज और ग्रामीण विकास विभाग से संबंधित हैं।
- कई विभागों ने एक दशक से अधिक समय से प्रमाणपत्र नहीं दिए हैं।
💬 नीतीश सरकार की सफाई
राज्य सरकार की ओर से इस पर सफाई देते हुए कहा गया है कि बड़ी संख्या में योजनाएं अभी भी प्रगति पर हैं और प्रमाणपत्र केवल तभी दिए जा सकते हैं जब योजनाएं पूरी हो जाएं। इसके अलावा, अधिकारियों ने यह भी कहा कि जिला स्तर पर दस्तावेजों की प्रक्रिया में देरी के कारण भी उपयोग प्रमाणपत्र समय पर नहीं दिए जा सके।
⚠️ विपक्ष का हमला: ‘भ्रष्टाचार का खुला दस्तावेज़ है यह रिपोर्ट’
राज्य में विपक्षी दलों, खासकर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस ने इस रिपोर्ट को लेकर नीतीश कुमार सरकार पर जमकर हमला बोला है। RJD नेता तेजस्वी यादव ने कहा:
“CAG की रिपोर्ट ये साफ़ कह रही है कि सरकार भ्रष्टाचार में डूबी हुई है। 70,000 करोड़ रुपये का हिसाब नहीं देना, मतलब साफ़ है कि घोटाले की बू आ रही है।”
कांग्रेस नेता अजीत शर्मा ने भी सरकार से सीधा सवाल किया:
“जब योजनाओं के पैसे का लेखा-जोखा ही नहीं दिया गया, तो यह कैसे माना जाए कि फंड का सही उपयोग हुआ?”
🏗️ कौन-कौन सी योजनाएं शामिल हैं?
CAG रिपोर्ट में जिन योजनाओं के उपयोग प्रमाणपत्र बकाया हैं, उनमें कई प्रमुख और बड़ी योजनाएं शामिल हैं, जैसे:
- मुख्यमंत्री ग्रामीण सड़क योजना
- प्रधानमंत्री आवास योजना
- स्वच्छ भारत मिशन
- सर्व शिक्षा अभियान
- कृषि आधारित योजनाएं
- स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधित योजनाएं
इन योजनाओं में कई ऐसी भी हैं जो केंद्र और राज्य सरकार के साझा फंड से चलाई जाती हैं, जिससे यह मामला और भी संवेदनशील बन जाता है।
🧾 केंद्रीय फंडिंग पर असर
CAG रिपोर्ट की यह विसंगति न केवल राज्य सरकार की छवि को धक्का पहुंचाती है, बल्कि इससे केंद्र सरकार की ओर से मिलने वाले फंड्स पर भी असर पड़ सकता है। यदि राज्य समय पर UCs नहीं देता है, तो अगली किश्त की राशि रोकी जा सकती है।
वित्त मंत्रालय पहले भी ऐसे मामलों में चेतावनी दे चुका है कि बिना UCs के कोई भी अगला फंड रिलीज नहीं किया जाएगा।
📉 फिलहाल की स्थिति और आगे की कार्रवाई
वित्त विभाग ने दावा किया है कि अब जिलों और विभागों को निर्देश जारी किए गए हैं कि वे जल्द से जल्द लंबित UCs जमा करें। साथ ही एक विशेष मॉनिटरिंग टीम गठित की गई है, जो प्रत्येक विभाग और परियोजना की समीक्षा करेगी।
हालांकि सवाल यह उठता है कि इतने सालों तक इस लापरवाही को नजरअंदाज कैसे किया गया?
📌 विशेषज्ञों की राय: यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, एक सिस्टम फेलियर है
वित्तीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि यह कोई साधारण चूक नहीं बल्कि व्यवस्था की असफलता (Systemic Failure) का संकेत है।
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ. आलोक वर्मा ने कहा:
“यदि एक राज्य सरकार 20 सालों में 70,000 करोड़ के फंड्स का उपयोग प्रमाणपत्र नहीं दे पाती है, तो यह वित्तीय शुचिता और पारदर्शिता के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है।”
📷 जनता की प्रतिक्रिया: ‘हमारा पैसा कहाँ गया?’
बिहार की आम जनता भी इस रिपोर्ट से गुस्से में है। सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं:
“जब सरकार योजनाओं का प्रचार तो खूब करती है, तो उनके परिणामों का हिसाब क्यों नहीं देती?”
ग्रामीण क्षेत्रों में कई लोगों का कहना है कि कई योजनाओं की शुरुआत तो हुई, लेकिन उनके परिणाम ज़मीनी स्तर पर कभी दिखाई नहीं दिए।
🔚 निष्कर्ष: जवाबदेही तय होनी चाहिए, नहीं तो बढ़ेगा अविश्वास
CAG की रिपोर्ट ने बिहार की नीतीश सरकार की वित्तीय पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। 70,000 करोड़ रुपये की राशि कोई मामूली रकम नहीं है और यदि उसका सही उपयोग नहीं हुआ है, तो यह सीधे-सीधे जनता के अधिकारों और टैक्सपेयर के पैसे का अपमान है।
सरकार को जल्द से जल्द:
- सभी बकाया उपयोग प्रमाणपत्र जमा करने चाहिए।
- जिम्मेदार अधिकारियों और विभागों पर कार्रवाई करनी चाहिए।
- और जनता को यह स्पष्ट बताना चाहिए कि इन परियोजनाओं में कितना पैसा खर्च हुआ, और क्या परिणाम सामने आए।
