सोमवार को न्यायमूर्ति अनिल किलोर और श्याम चंदक की विशेष उच्च न्यायालय पीठ ने सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया। पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष मामले को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा और यह विश्वास करना कठिन है कि आरोपियों ने यह अपराध किया।

नई दिल्ली/मुंबई – साल 2006 की वह काली शाम आज भी देश की सामूहिक स्मृति में दर्ज है, जब मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार धमाकों ने पूरे राष्ट्र को झकझोर दिया था। 209 मासूम लोगों की जान चली गई और सैकड़ों घायल हो गए। अब इस भीषण आतंकी हमले से जुड़ा मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा सभी 12 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले पर स्थगन (Stay) लगाकर मामले में नया मोड़ ला दिया है।
क्या है मामला?
11 जुलाई 2006 को मुंबई की भीड़भाड़ वाली उपनगरीय लोकल ट्रेनों में 7 सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। ये धमाके पीक ऑवर्स में अलग-अलग ट्रेनों के प्रथम श्रेणी के डिब्बों में हुए थे, जिससे पूरे शहर में कोहराम मच गया था। महाराष्ट्र एटीएस ने जांच के बाद 13 आरोपियों को गिरफ्तार किया और मामले में मुकदमा दर्ज किया गया।
2015 में विशेष मकोका अदालत ने इनमें से 5 आरोपियों को फांसी और 7 को उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी। लेकिन फरवरी 2024 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए सभी 12 आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष “ठोस और विश्वसनीय सबूत” पेश करने में असफल रहा।
सुप्रीम कोर्ट का दखल: ‘ऐसे कैसे छोड़ दें 209 जानों की कीमत?’
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार और कुछ पीड़ित परिवारों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा:
“यह सिर्फ एक कानूनी मामला नहीं, न्याय का सवाल है। 209 निर्दोष लोगों की जान गई। अगर इतने बड़े अपराध में दोषी बरी हो जाएं तो समाज का भरोसा न्याय व्यवस्था से उठ जाएगा।”
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर तत्काल रोक लगाते हुए सभी आरोपियों की रिहाई को स्थगित कर दिया और मामले की पुनः जांच और सुनवाई के संकेत दिए।
सरकार का पक्ष: ‘हाईकोर्ट का फैसला झकझोर देने वाला’
महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट के निर्णय को “चौंकाने वाला और असंवेदनशील” बताया। राज्य के गृह मंत्री ने कहा कि,
“हमारे पास ठोस तकनीकी और फोरेंसिक साक्ष्य हैं, जिनकी अनदेखी करके हाईकोर्ट ने सभी को रिहा कर दिया। हम सुप्रीम कोर्ट में इंसाफ की आखिरी उम्मीद लेकर पहुंचे हैं।”
पीड़ितों के परिवारों की भावनात्मक पुकार: ‘इंसाफ अधूरा है!’
धमाकों में जान गंवाने वालों के परिजनों के लिए यह खबर कुछ राहत लेकर आई है। लगभग दो दशकों से न्याय की बाट जोह रहे इन परिवारों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है।
संध्या मेहता, जिनके पति 2006 की शाम चर्चगेट से विरार जा रही ट्रेन में मारे गए थे, ने कहा:
“हाईकोर्ट का फैसला हमारे जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फिर से हमें उम्मीद दी है कि इंसाफ मिलेगा।”
हाईकोर्ट का फैसला क्यों था विवादित?
बॉम्बे हाईकोर्ट ने सभी 12 दोषियों को साक्ष्य के अभाव में बरी किया था। कोर्ट का कहना था कि:
- विस्फोटक सामग्री, टिफिन बम व अन्य सामानों की कड़ी अभियुक्तों से जोड़ी नहीं जा सकी।
- गवाहों के बयान विरोधाभासी और पर्याप्त नहीं थे।
- सीसीटीवी फुटेज, कॉल रिकॉर्ड और फोरेंसिक रिपोर्ट में कई तकनीकी खामियाँ थीं।
- हालांकि जांच एजेंसियों ने दावा किया कि अभियुक्तों ने पाकिस्तान में ट्रेनिंग ली थी और लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठनों से संपर्क में थे।
राजनीति भी गरमाई, भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने
इस मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। भाजपा ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को “न्याय प्रणाली की विफलता” बताया और आरोप लगाया कि कुछ संगठनों और तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इन आरोपियों को बचाने की कोशिश की।
वहीं कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा:
“हमें न्यायपालिका पर भरोसा है। लेकिन जांच एजेंसियों को भी निष्पक्ष और वैज्ञानिक तरीके से सबूत प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। वरना ऐसे फैसले बार-बार होंगे।”
कानूनी विशेषज्ञों की राय: ‘एक ऐतिहासिक मोड़’
कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं और न्यायविदों ने सुप्रीम कोर्ट के इस दखल को “मील का पत्थर” करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ इंदिरा जयसिंह ने कहा:
“यह मामला हमारे आपराधिक न्याय प्रणाली की कार्यप्रणाली पर सीधा प्रश्नचिह्न है। इतने गंभीर अपराध में साक्ष्य की कमजोरी बहुत चिंता का विषय है।”
क्या अब होगा दोबारा ट्रायल?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने के बाद अब मामला फिर से खुल सकता है। कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर पूरे रिकॉर्ड की समीक्षा करने को कहा है। ऐसे में संभावना है कि मामले की दोबारा सुनवाई होगी और दोषियों के खिलाफ फिर से कार्यवाही की जा सकती है।
लोकल ट्रेन, आतंक और मुंबई की जिंदादिली
मुंबई की लोकल ट्रेनें सिर्फ परिवहन का साधन नहीं, बल्कि इस शहर की धड़कन हैं। 2006 में हुए इन धमाकों ने उस धड़कन को जख्मी कर दिया था। फिर भी मुंबई ने हार नहीं मानी। अगले ही दिन ट्रेनें चल पड़ीं, लोग ऑफिस गए, और शहर ने दुनिया को दिखाया कि “Mumbai Never Stops”।
अब 19 साल बाद, जब पीड़ित परिवारों को न्याय की उम्मीद फिर जगी है, पूरा देश एक बार फिर न्यायपालिका की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख रहा है।
निष्कर्ष: क्या 209 जानों को मिलेगा इंसाफ?
2006 के मुंबई बम धमाकों को भारत के इतिहास में सबसे सुनियोजित आतंकी हमलों में गिना जाता है। इतने वर्षों के बाद यदि आरोपी बरी हो जाते हैं, तो यह न केवल पीड़ितों का अपमान है, बल्कि देश की न्याय प्रणाली की साख पर भी सवाल खड़े करता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अब देखने वाली बात यह होगी कि जांच एजेंसियां और अभियोजन पक्ष कितनी मजबूती से अपने पक्ष को रख पाते हैं। क्या 209 मासूमों की आत्माएं अब भी न्याय के इंतज़ार में हैं, या सुप्रीम कोर्ट की यह पहल एक “नए इंसाफ” की शुरुआत बनेगी?
