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हंगामे की बारिश में डूबा मानसून सत्र: विपक्ष के हल्ले से थमी लोकसभा, दोपहर 2 बजे तक स्थगित

संसद मानसून सत्र 2025: कांग्रेस सांसद माणिकम टैगोर ने लोकसभा में नियम 56 के तहत स्थगन प्रस्ताव प्रस्तुत किया है, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग की कार्रवाई को “चौंकाने वाली और असंवैधानिक” करार देते हुए गहरी चिंता जताई है।

नई दिल्ली – संसद का मानसून सत्र, जो देश की लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली के लिए अहम माना जाता है, एक बार फिर राजनीति के तूफान में उलझ गया है। शुक्रवार को जैसे ही लोकसभा की कार्यवाही शुरू हुई, विपक्षी दलों ने सरकार को घेरने के लिए मोर्चा खोल दिया। जोरदार नारेबाज़ी, पोस्टर लहराते सांसद और सत्ता पक्ष से तीखी तकरार ने सदन का माहौल गरमा दिया। नतीजा – लोकसभा की कार्यवाही को दोपहर 2 बजे तक स्थगित कर दिया गया।

क्या था मुद्दा? विपक्ष क्यों बिफरा?
विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर कई ज्वलंत मुद्दों को लेकर हमला बोला। मणिपुर हिंसा, महंगाई, बेरोज़गारी, पेगासस जासूसी, और हाल ही में सामने आए कुछ कथित भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर विपक्ष लामबंद नजर आया।

कांग्रेस, टीएमसी, आप, डीएमके, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों के सांसदों ने जैसे ही सदन की कार्यवाही शुरू हुई, ‘प्रधानमंत्री जवाब दो’, ‘तानाशाही नहीं चलेगी’, ‘लोकतंत्र बचाओ’ जैसे नारे लगाने शुरू कर दिए। पोस्टरों और तख्तियों के साथ सदन में खड़े सांसदों ने कार्यवाही को बाधित किया, जिससे अध्यक्ष को कार्रवाई स्थगित करनी पड़ी।

संसद या संघर्ष का मंच?
मानसून सत्र के पहले दिन से ही संकेत साफ थे कि यह सत्र शांतिपूर्वक नहीं चलेगा। विपक्ष पहले से ही मणिपुर हिंसा पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान की मांग कर रहा था। शुक्रवार को विपक्षी सांसदों ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब तक पीएम सदन में आकर स्पष्टीकरण नहीं देंगे, तब तक वे कार्यवाही नहीं चलने देंगे।

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, जो हाल ही में सुप्रीम कोर्ट से राहत पाकर संसद में वापसी कर चुके हैं, ने कहा,
“संसद में सवाल पूछना हमारा संवैधानिक अधिकार है। लेकिन सरकार जवाब देने से डरती है।”

स्पीकर ओम बिड़ला असहज, कई बार समझाने की कोशिश
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने विपक्षी सांसदों से कई बार आग्रह किया कि वे अपनी सीट पर लौटें और शांति बनाए रखें। उन्होंने कहा,
“आप सभी को अपनी बात कहने का पूरा मौका मिलेगा, लेकिन कृपया सदन की गरिमा बनाए रखें।”

हालांकि, विपक्ष नहीं माना और शोर-शराबा जारी रहा। अंततः स्पीकर को 11:15 बजे के आसपास कार्यवाही को दोपहर 2 बजे तक स्थगित करने की घोषणा करनी पड़ी।

सरकार का पलटवार: ‘विपक्ष केवल हंगामे की राजनीति कर रहा है’
सरकार ने विपक्ष पर सत्र को बाधित करने और जनहित के मुद्दों से ध्यान भटकाने का आरोप लगाया। संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा,
“विपक्ष सिर्फ दिखावे की राजनीति कर रहा है। उन्हें न तो कानून की चिंता है, न ही लोगों की। अगर उन्हें चर्चा करनी है, तो हम तैयार हैं। लेकिन यह हंगामा लोकतंत्र का अपमान है।”

भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने विपक्ष के रवैये को ‘राजनीतिक नौटंकी’ करार देते हुए कहा,
“जिनके पास तथ्य नहीं होते, वो शोर मचाते हैं। आज वही हो रहा है।”

जनता के मुद्दे या राजनीति की रणनीति?
विश्लेषकों का मानना है कि संसद का मौजूदा गतिरोध सिर्फ तात्कालिक मुद्दों का नतीजा नहीं है, बल्कि यह आगामी चुनावी राजनीति की भूमिका भी तैयार कर रहा है। विपक्ष चाहता है कि सदन की कार्यवाही में ऐसे मुद्दे जोर-शोर से उठाए जाएं जो सरकार की छवि को प्रभावित कर सकें।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने कहा,
“विपक्ष के लिए यह समय रणनीति बुनने का है। अगर वे सदन में दबाव बना पाते हैं, तो यह उनकी एकजुटता का संकेत भी होगा।”

ओपोज़ीशन की एकजुटता: INDIA गठबंधन का असर?
हाल ही में विपक्षी दलों ने मिलकर ‘INDIA’ नामक गठबंधन बनाया है। इस गठबंधन की पहली अग्निपरीक्षा संसद के इस मानसून सत्र में मानी जा रही है। शुक्रवार के हंगामे ने यह संकेत जरूर दे दिया कि विपक्षी दल अब मिलकर सरकार को कठघरे में खड़ा करना चाहते हैं।

डीएमके सांसद कनिमोझी ने कहा,
“हम अब अलग-अलग नहीं, एकजुट होकर आवाज़ उठाएंगे। सरकार को जवाब देना ही होगा।”

सोशल मीडिया पर बवाल: #ParliamentStorm ट्रेंड में
संसद के इस गतिरोध की गूंज सोशल मीडिया तक भी पहुंच गई। ट्विटर पर #ParliamentStorm, #MonsoonSession, #OppositionRoar जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। आम नागरिकों की राय बंटी हुई दिखी – कुछ लोग विपक्ष के तेवर से खुश हैं, तो कुछ लोग इसे ‘काम में बाधा’ कहकर निंदा कर रहे हैं।

एक यूज़र ने लिखा:
“जनता सवाल चाहती है, जवाब नहीं मिल रहा। विपक्ष सही कर रहा है।”

वहीं एक अन्य यूज़र ने कहा:
“विपक्ष हर सत्र में हंगामा करता है, संसद काम कब करेगी?”

आगे क्या? सत्र चलेगा या फिर से ठप रहेगा?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मानसून सत्र की बाकी कार्यवाही भी इसी तरह हंगामे की भेंट चढ़ेगी? क्या सरकार और विपक्ष के बीच कोई सहमति बन पाएगी? सूत्रों के मुताबिक, सरकार बैकचैनल से विपक्षी नेताओं के संपर्क में है और सत्र को सुचारू रूप से चलाने की कोशिशें जारी हैं।

अध्यक्ष ओम बिड़ला ने भी शाम तक सर्वदलीय बैठक बुलाने के संकेत दिए हैं ताकि गतिरोध को खत्म किया जा सके।

निष्कर्ष: लोकतंत्र का इम्तिहान जारी
संसद का मानसून सत्र हमेशा से ही सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहसों और महत्वपूर्ण विधेयकों के लिए जाना जाता है। लेकिन जब बहस की जगह हंगामा ले ले, तो लोकतंत्र की आत्मा पर सवाल उठने लगते हैं।

देश की जनता संसद से उम्मीद करती है कि वहाँ उनके मुद्दों पर चर्चा हो, समाधान निकलें। लेकिन जब नारेबाज़ी, आरोप-प्रत्यारोप और कार्यवाही स्थगन बार-बार सामने आए, तो लोकतंत्र का उद्देश्य धुंधला पड़ जाता है।

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Harshita Ahuja

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