धनखड़ ने सोमवार शाम को अपने पद से इस्तीफा दे दिया, उन्होंने इसके पीछे चिकित्सकीय कारणों का हवाला दिया। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा भेजा और कहा कि वे तत्काल प्रभाव से पद छोड़ रहे हैं।

देश की राजनीति में अचानक आए इस घटनाक्रम ने सबको चौंका दिया। भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने तत्काल प्रभाव से उनके त्यागपत्र को स्वीकार भी कर लिया। यह फैसला न सिर्फ संवैधानिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है बल्कि इसके दूरगामी राजनीतिक निहितार्थ भी देखे जा रहे हैं। ऐसे समय में जब संसद का मानसून सत्र चल रहा है और कई बड़े विधेयकों पर बहस होनी है, यह घटनाक्रम मोदी सरकार और विपक्ष दोनों के लिए एक नई चुनौती बनकर उभरा है।
धनखड़ का इस्तीफा: अचानक या सोची-समझी रणनीति?
जगदीप धनखड़, जिन्होंने 11 अगस्त 2022 को भारत के 14वें उपराष्ट्रपति के रूप में शपथ ली थी, उनका कार्यकाल अभी दो साल भी पूरा नहीं हुआ था। लेकिन उनका इस्तीफा यह संकेत दे रहा है कि देश की राजनीति में कुछ बहुत बड़ा पक रहा है।
सूत्रों के अनुसार, धनखड़ लंबे समय से पार्टी नेतृत्व से नाराज़ चल रहे थे। हाल ही में उन्होंने राज्यसभा में कुछ विधेयकों को लेकर सरकार की प्रक्रियाओं पर सवाल भी उठाए थे, जो सत्ता पक्ष के लिए असहज करने वाले थे। कई विश्लेषकों का मानना है कि यह इस्तीफा एक “आंतरिक शक्ति संघर्ष” का परिणाम है।
राष्ट्रपति मुर्मू की त्वरित स्वीकृति: इशारा किस ओर?
संवैधानिक रूप से उपराष्ट्रपति का इस्तीफा राष्ट्रपति को दिया जाता है और जब तक राष्ट्रपति उसे स्वीकार नहीं करतीं, वह प्रभावी नहीं होता। लेकिन धनखड़ के त्यागपत्र पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बिना किसी देरी के मंजूरी दे दी, जिससे यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या यह इस्तीफा पहले से तय था?
इससे यह भी संकेत मिलते हैं कि केंद्र सरकार और राष्ट्रपति भवन के बीच इस मसले पर पूरी सहमति थी। क्या यह सत्ता पक्ष की एक “प्रशासकीय सर्जरी” है या फिर भविष्य में धनखड़ को किसी और बड़ी जिम्मेदारी की ओर भेजा जा रहा है?
राजनीतिक हलकों में खलबली
धनखड़ का इस्तीफा जैसे ही सामने आया, संसद भवन के गलियारों में चर्चाओं का भूचाल आ गया। विपक्षी दलों ने इसे “लोकतंत्र की अस्थिरता” और “सरकार के अंदरूनी तनाव” का संकेत बताया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने ट्वीट करते हुए कहा, “उपराष्ट्रपति जैसे गरिमामयी पद से इस्तीफा देना बताता है कि सब कुछ ठीक नहीं है।”
वहीं टीएमसी की महुआ मोइत्रा ने तीखा तंज कसते हुए लिखा, “जिन्हें कभी बोलने नहीं दिया गया, उन्होंने अब मौन अपनाने का रास्ता चुना।”
राज्यसभा पर पड़ेगा असर
उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति भी होते हैं। ऐसे में संसद का मौजूदा मानसून सत्र, जो पहले ही हंगामेदार रहा है, अब और चुनौतीपूर्ण हो गया है। सभापति की अनुपस्थिति में राज्यसभा में विधायी प्रक्रियाएं बाधित हो सकती हैं, जब तक कि कार्यकारी अध्यक्ष की व्यवस्था न की जाए।
भाजपा के लिए यह सत्र महत्वपूर्ण है, क्योंकि सरकार कुछ बड़े विधेयक जैसे कि यूनिफॉर्म सिविल कोड और नए शिक्षा नीति से जुड़े कानून को पारित कराने की कोशिश कर रही है।
क्या धनखड़ को कोई नया पद मिलने वाला है?
राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि यह इस्तीफा दरअसल एक नई पारी की शुरुआत हो सकता है। कुछ खबरें हैं कि धनखड़ को जल्द ही किसी संवैधानिक संस्था का प्रमुख बनाया जा सकता है, जैसे कि राज्यपाल या किसी आयोग के अध्यक्ष।
वहीं कुछ सूत्रों का दावा है कि 2026 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी के तहत भाजपा उन्हें आगे बढ़ा सकती है। यदि ऐसा होता है, तो यह राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद दोनों पर “पसंद के लोगों” को बैठाने की रणनीति मानी जाएगी।
धनखड़ का अब तक का सफर
राजस्थान के झुंझुनूं जिले के किसान परिवार में जन्मे धनखड़ का राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू हुआ। वकालत के पेशे से राजनीति में आए धनखड़ ने 1989 में जनता दल से लोकसभा चुनाव जीता था और वी.पी. सिंह सरकार में केंद्रीय मंत्री भी बने।
2019 में उन्हें पश्चिम बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया गया, जहां उनके और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच तीखे टकरावों ने राष्ट्रीय सुर्खियां बटोरीं। 2022 में एनडीए ने उन्हें उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाया और वह जीतकर राज्यसभा के सभापति बने।
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया
धनखड़ के इस्तीफे के बाद सोशल मीडिया पर #JagdeepDhankhar, #VicePresidentResigns और #PoliticalTremor जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। कुछ लोगों ने इसे “एक साहसिक कदम” बताया, जबकि कुछ ने “बीजेपी की आंतरिक राजनीति का नतीजा”।
ट्विटर पर एक यूजर ने लिखा, “धनखड़ ने खुद को सिर्फ एक औपचारिक चेहरा बनने नहीं दिया, इसलिए उन्हें जाना पड़ा।” वहीं, एक भाजपा समर्थक ने लिखा, “सरकार की बड़ी योजना का हिस्सा है ये इस्तीफा, इंतजार कीजिए – नया धमाका होगा।”
विपक्ष को मिला एक और मुद्दा
विपक्षी दल पहले ही पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को संसद में बोलने का मौका न देने के लिए घेर रहे थे। अब उपराष्ट्रपति का इस्तीफा उन्हें एक और मौका देगा कि वे सत्ता पक्ष की “अंदरूनी कलह” को उजागर करें।
राहुल गांधी ने भी एक पत्रकार सम्मेलन में कहा, “यह लोकतंत्र की कमजोरी है कि एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को बोलने का अवसर नहीं दिया गया।”
आगे क्या? संभावनाएं और समीकरण
धनखड़ के इस्तीफे के बाद अब भाजपा को नया उपराष्ट्रपति उम्मीदवार तलाशना होगा। यह तय है कि पार्टी किसी ऐसे व्यक्ति को लाएगी जो न सिर्फ अनुशासित हो बल्कि संसद की कार्यवाही को विपक्ष के शोर के बीच सुचारू रूप से चला सके।
इसके साथ ही भाजपा की निगाहें 2026 के राष्ट्रपति चुनाव पर भी होंगी। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि धनखड़ का अगला ठिकाना क्या होता है – क्या वे फिर से राष्ट्रपति भवन की ओर बढ़ेंगे?
निष्कर्ष: त्याग या रणनीति?
धनखड़ का इस्तीफा केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारत की राजनीति के भविष्य का संकेत हो सकता है। क्या यह एक व्यक्तिगत निर्णय था, या एक बड़ी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा? इस पर आने वाले दिनों में और खुलासे होंगे। लेकिन इतना तय है कि भारतीय राजनीति में अब एक नया अध्याय शुरू हो चुका है – जिसमें धनखड़ की भूमिका फिर से अहम हो सकती है।
