प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के मानसून सत्र से पहले कहा कि यह दशक शांति और प्रगति का प्रतीक बन चुका है, और नक्सल प्रभावित ‘रेड कॉरिडोर’ अब ‘ग्रीन ग्रोथ ज़ोन’ में तब्दील हो रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने संसद सत्र से पहले दिया विकास का ‘ग्रीन’ संदेश
संसद के मानसून सत्र की शुरुआत से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को बड़ा बयान देते हुए कहा कि देश के ‘रेड कॉरिडोर’ अब ‘ग्रीन ग्रोथ ज़ोन’ में बदल रहे हैं। उन्होंने यह बात संसद भवन परिसर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कही। यह बयान जहां नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता दर्शाता है, वहीं 2025 के सियासी परिदृश्य में यह एक रणनीतिक सियासी सिग्नल भी माना जा रहा है।
मोदी ने कहा:
“कभी जिन इलाकों को ‘रेड कॉरिडोर’ कहा जाता था, जहां सिर्फ बंदूकें बोलती थीं, आज वहाँ हरियाली है, उद्योग हैं, और विकास की नई धारा बह रही है। ये ‘ग्रीन ग्रोथ ज़ोन’ बन रहे हैं।”
रेड कॉरिडोर क्या है? और क्यों था डर का पर्याय?
भारत में रेड कॉरिडोर उन इलाकों को कहा जाता है जो नक्सलवाद से प्रभावित रहे हैं। इन क्षेत्रों में दशकों तक माओवादी हिंसा, पुलिस-नक्सली मुठभेड़, और विकास का घोर अभाव रहा है। झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार, ओडिशा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के कई जिले इसमें शामिल रहे।
2004 से 2010 के बीच ये इलाके आंतरिक सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती बन गए थे। लेकिन बीते कुछ वर्षों में मोदी सरकार द्वारा चलाई गई योजनाओं और सुरक्षा बलों की मुहिम ने इन क्षेत्रों की तस्वीर बदलनी शुरू कर दी है।
प्रधानमंत्री का दावा: अब ‘बंदूक’ नहीं, ‘बिजली’ पहुँच रही है इन इलाकों में
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सरकार की योजनाओं का असर अब ज़मीन पर दिखने लगा है:
- पहले जहां गोलियों की आवाज़ गूंजती थी, अब वहां बिजली के खंभे खड़े हो गए हैं।
- जहां सड़कें नहीं थीं, वहां अब हाईवे और एक्सप्रेसवे पहुँच रहे हैं।
- आदिवासी युवाओं को अब रोज़गार और शिक्षा के अवसर मिल रहे हैं।
- वनाधिकार कानून और जनजातीय योजनाएं तेज़ी से लागू की जा रही हैं।
‘लाल से हरा’ परिवर्तन की कहानी: आंकड़े क्या कहते हैं?
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार:
- 2010 में जहां 225 नक्सली हमले हुए थे, वहीं 2024 में यह संख्या घटकर 42 रह गई।
- 75% से अधिक नक्सल प्रभावित जिलों में अब मोबाइल टावर और इंटरनेट पहुँच चुका है।
- PMGSY (प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना) के तहत पिछले 5 वर्षों में 18,000 किलोमीटर सड़कें बनाई गईं।
- डिजिटल इंडिया, जन धन योजना और उज्ज्वला योजना जैसी योजनाओं ने पहली बार इन क्षेत्रों के लोगों को मुख्यधारा से जोड़ा है।
राजनीतिक संदेश: 2025 की तैयारी या सच्ची सफलता?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद के मानसून सत्र से पहले PM मोदी का यह बयान एक रणनीतिक क़दम है। यह उन राज्यों में 2025 के विधानसभा चुनावों और 2026 के आम चुनावों को ध्यान में रखते हुए आदिवासी वोट बैंक पर असर डालने वाला संकेत माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषक अनुराग मिश्र कहते हैं:
“प्रधानमंत्री का यह बयान केवल सुरक्षा स्थिति की सफलता नहीं, बल्कि विकास की राजनीति की दिशा तय करने वाला है। आने वाले चुनावों में इसका उपयोग ‘ट्रैक रिकॉर्ड’ के रूप में किया जा सकता है।”
Naxal Belt में बदली तस्वीर: ज़मीनी रिपोर्ट्स क्या कहती हैं?
दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़):
जहाँ कभी स्कूल जला दिए जाते थे, आज वहां इलेक्ट्रिक स्मार्ट क्लासरूम चल रहे हैं। स्थानीय निवासी गंगाराम कोर्राम कहते हैं:
“पहले हम बच्चे को स्कूल भेजने में डरते थे। अब वहीं बच्चा मोबाइल ऐप से पढ़ाई कर रहा है।”
लातेहार (झारखंड):
2015 में जो इलाका पुलिस चौकी भी नहीं बना सका था, वहां अब ई-गवर्नेंस सेंटर खुल चुका है।
गढ़चिरौली (महाराष्ट्र):
यहाँ अब बांस आधारित स्टार्टअप्स और लघु वन उत्पाद व्यवसाय से सैकड़ों आदिवासी महिलाएं आत्मनिर्भर बन चुकी हैं।
सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका: बंदूक भी चली, बहाली भी
केंद्र सरकार ने नक्सल विरोधी अभियान में:
- CRPF, ITBP, और स्थानीय पुलिस बलों को अत्याधुनिक हथियारों से लैस किया।
- स्थानीय युवाओं को SPO (Special Police Officers) के रूप में भर्ती किया गया।
- सेना की तर्ज पर ‘विकास मित्र’ योजना शुरू की गई, जिनका काम नक्सल इलाकों में विकास योजनाओं की निगरानी करना था।
गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने हाल में संसद में कहा:
“नक्सलवाद पर अब निर्णायक प्रहार हो चुका है। अब वह विचारधारा दम तोड़ रही है, जो बंदूक को बदलाव का जरिया मानती थी।”
विपक्ष का सवाल: क्या सब कुछ वाकई हरा ही है?
हालांकि प्रधानमंत्री के दावों पर विपक्ष ने सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा:
“आपने विकास का वादा किया था, लेकिन इन इलाकों में आज भी पीने का पानी, स्वास्थ्य सेवा और रोजगार की भारी कमी है। केवल आंकड़ों से बदलाव नहीं होता।”
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने ट्वीट किया:
“केंद्र सिर्फ सुरक्षा आंकड़ों की बात करता है, लेकिन ज़मीनी विकास राज्य सरकारों की बदौलत हो रहा है।”
आदिवासी समुदायों की प्रतिक्रिया: उम्मीद और हिचकिचाहट
कई आदिवासी संगठन इस बदलाव का स्वागत कर रहे हैं, लेकिन वे यह भी चाहते हैं कि:
- उनकी सांस्कृतिक पहचान का सम्मान हो
- जंगल, ज़मीन और जल पर उनके अधिकार सुनिश्चित रहें
- खनन और विस्थापन की प्रक्रिया में स्थानीय सहमति अनिवार्य हो
आदिवासी कार्यकर्ता बेला भाटिया का कहना है:
“बिजली और सड़क अच्छी बात है, लेकिन बिना सामाजिक न्याय के विकास अधूरा है। आदिवासी सिर्फ ‘लाभार्थी’ नहीं, ‘साझेदार’ भी बनने चाहिए।”
ग्रीन ग्रोथ ज़ोन: आगे की रणनीति क्या होगी?
सरकार अब इन क्षेत्रों को हरित उद्योगों और पर्यावरण अनुकूल विकास की ओर ले जाने की योजना बना रही है:
- बायोमास आधारित ऊर्जा संयंत्र
- वन उत्पादों की प्रोसेसिंग यूनिट
- वन पर्यटन (eco-tourism) को बढ़ावा
- ग्रामीण BPOs और डिजिटल लर्निंग हब
- नीति आयोग ने 2030 तक रेड कॉरिडोर को पूर्णतः इकोनॉमिक ग्रोथ बेल्ट में बदलने का रोडमैप तैयार किया है।
निष्कर्ष: क्या ‘रेड से ग्रीन’ की यह यात्रा स्थायी है?
प्रधानमंत्री मोदी का ‘रेड कॉरिडोर टू ग्रीन ग्रोथ’ विज़न निश्चित रूप से प्रेरक और सशक्त संदेश है। लेकिन यह यात्रा तभी स्थायी बन सकती है जब:
- जनसंवाद बढ़े,
- विकास राजनीतिक हथियार नहीं, सामाजिक अधिकार बने,
- और स्थानीय लोगों को भागीदार बनाया जाए, न कि सिर्फ दर्शक।