बैठक के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शुभकामनाएं प्रेषित कीं।

नई दिल्ली से बीजिंग तक फैली कूटनीति की बिसात, दोनों देशों के रिश्तों में आया नया मोड़
चीन की राजधानी बीजिंग में बुधवार को एक ऐतिहासिक कूटनीतिक क्षण देखने को मिला जब भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की। यह बैठक ऐसे समय पर हुई जब भारत-चीन के संबंध लद्दाख में सैन्य तनाव, व्यापारिक अविश्वास और वैश्विक मंचों पर टकराव जैसे मुद्दों से जूझ रहे हैं।
हालांकि यह एक शिष्टाचार मुलाकात बताई जा रही है, लेकिन जानकारों का मानना है कि इस मुलाकात ने दोनों देशों के रिश्तों की बर्फ को थोड़ा पिघलाने का काम किया है।
जयशंकर की बीजिंग यात्रा: मकसद सिर्फ मेलजोल या रणनीतिक वार्ता?
विदेश मंत्री जयशंकर इस समय चीन की राजधानी बीजिंग की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं। यह यात्रा ऐसे वक्त में हो रही है जब पूर्वी लद्दाख में भारत-चीन सीमा पर अभी भी तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है और कई संवेदनशील बिंदुओं पर दोनों सेनाएं अब भी आमने-सामने हैं।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस दौरे का प्राथमिक उद्देश्य ‘भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा, आपसी सहयोग की संभावनाओं की पहचान और क्षेत्रीय तथा वैश्विक मुद्दों पर विचार-विमर्श’ करना है।
शी जिनपिंग से मुलाकात: क्या हुआ बंद कमरे की बातचीत में?
मुलाकात बीजिंग के ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल में हुई और लगभग 50 मिनट चली। सूत्रों के अनुसार, जयशंकर ने शी जिनपिंग को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से शुभकामनाएं प्रेषित कीं और उन्हें भारत आने का निमंत्रण भी दिया।
बैठक में जिन अहम मुद्दों पर बातचीत हुई, उनमें शामिल हैं:
- LAC पर यथास्थिति की बहाली
- व्यापार असंतुलन को कम करना
- BRICS और SCO जैसे मंचों पर सहयोग
- चीन-पाकिस्तान गठजोड़ पर भारत की चिंता
- जयशंकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि
“सीमा पर शांति ही द्विपक्षीय रिश्तों की नींव है। जब तक सीमाएं तनावमुक्त नहीं होंगी, तब तक आपसी विश्वास बहाल नहीं हो सकता।”
शी जिनपिंग की प्रतिक्रिया: नरमी या राजनीतिक कूटनीति?
शी जिनपिंग ने भारत को “एक महत्वपूर्ण पड़ोसी और उभरती शक्ति” बताते हुए कहा कि
- “चीन भारत के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और दीर्घकालिक सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है।”
- हालाँकि उन्होंने LAC या भारत की सुरक्षा चिंताओं पर कोई सीधा जवाब नहीं दिया, लेकिन इतना ज़रूर कहा कि
- “टकराव की बजाय सहयोग ही दोनों देशों के हित में है।”
- विशेषज्ञों का मानना है कि शी का रवैया कूटनीतिक शालीनता का हिस्सा था, लेकिन इसके पीछे चीन की रणनीतिक चालें भी छुपी हो सकती हैं।
लद्दाख का मुद्दा: बातचीत में ‘छाया’ रहा लेकिन ‘उजागर’ नहीं हुआ
पूर्वी लद्दाख में गलवान घाटी की घटना के बाद भारत और चीन के रिश्ते लगभग ठहराव की स्थिति में पहुंच गए थे। बीते चार वर्षों में कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक वार्ताएं हुईं, लेकिन जमीनी हालात में खास बदलाव नहीं आया।
जयशंकर ने अपनी बातचीत में इस मुद्दे को दोहराते हुए कहा:
“भारत यथास्थिति की बहाली और सैनिकों की पूर्ण वापसी चाहता है। बिना सीमा समाधान के सामान्य रिश्तों की कल्पना नहीं की जा सकती।”
चीनी पक्ष ने जवाब में स्थिति को “स्थिर और नियंत्रण में” बताया लेकिन कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया।
व्यापारिक संबंध: आंकड़ों में दोस्ती, नीति में दूरी
भारत और चीन के बीच व्यापार वर्ष 2024 में लगभग 135 अरब डॉलर का हुआ, जिसमें भारत का व्यापार घाटा 100 अरब डॉलर से ज़्यादा रहा। यह आंकड़ा बताता है कि भारत, चीन से भारी मात्रा में सामान आयात करता है लेकिन निर्यात काफी कम है।
जयशंकर ने इस व्यापार असंतुलन का मुद्दा जोरदार ढंग से उठाया और भारतीय उत्पादों को चीनी बाजार में उचित पहुँच देने की मांग की।
विश्लेषकों का कहना है कि भारत ‘आत्मनिर्भर भारत’ नीति के तहत अब चीन पर निर्भरता कम करना चाहता है, वहीं चीन चाहता है कि भारत RCEP जैसे व्यापार समझौतों में शामिल हो।
चीन-पाकिस्तान संबंध: जयशंकर का सीधा संदेश
जयशंकर ने चीन के पाकिस्तान के साथ बढ़ते रक्षा और आर्थिक संबंधों, खासतौर पर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को लेकर भी चिंता जताई।
उन्होंने स्पष्ट किया कि
“CPEC का हिस्सा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है, जो भारत का अभिन्न अंग है। चीन को भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना चाहिए।”
इस पर शी जिनपिंग ने कोई प्रत्यक्ष टिप्पणी नहीं की लेकिन यह साफ है कि भारत अब साफ-साफ शब्दों में अपनी आपत्तियाँ दर्ज करवा रहा है।
वैश्विक मुद्दों पर सहयोग: जलवायु, आतंकवाद और बहुपक्षीय मंच
जयशंकर और शी के बीच बातचीत में वैश्विक मुद्दों पर भी चर्चा हुई, जिनमें जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, वैश्विक दक्षिण की भूमिका और UN सुधार शामिल रहे।
भारत ने चीन से अनुरोध किया कि वह पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ कठोर कदम उठाने के लिए कहे और FATF तथा संयुक्त राष्ट्र में भारत के रुख का समर्थन करे।
राजनीतिक विश्लेषण: क्या रिश्ते सामान्य हो पाएंगे?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जयशंकर और शी जिनपिंग की यह मुलाकात प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव तभी संभव है जब चीन सीमा विवाद पर लचीलापन दिखाए।
हर्ष वी. पंत, अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ, कहते हैं:
“शी जिनपिंग की स्वीकारोक्ति अच्छी है, लेकिन भारत को अब भरोसे की नहीं, ठोस कार्रवाई की ज़रूरत है।”
विपक्ष का सवाल: सरकार चीन पर सख्त क्यों नहीं?
इस बैठक को लेकर भारत के विपक्षी दलों ने भी टिप्पणी की है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मनीष तिवारी ने ट्वीट किया:
“क्या जयशंकर ने शी जिनपिंग के सामने गलवान में शहीद हुए जवानों का ज़िक्र किया? अगर नहीं, तो यह सिर्फ औपचारिक मुलाकात रही।”
वहीं आम आदमी पार्टी ने कहा कि मोदी सरकार को चीन से आर्थिक निर्भरता खत्म करनी चाहिए और TikTok जैसे चीनी ऐप्स पर फिर से प्रतिबंध लगाना चाहिए।
निष्कर्ष: आगे की राह कठिन लेकिन संभावनाओं से भरी
जयशंकर और शी जिनपिंग की मुलाकात ने भारत-चीन संबंधों में संदेश और संकेत दोनों दिए हैं। एक ओर शिष्टाचार और सहयोग की भाषा दिखी, दूसरी ओर सीमा, व्यापार और क्षेत्रीय राजनीति पर मौन और सतर्कता।
भारत को अब यह तय करना है कि वह चीन के साथ सामरिक प्रतिस्पर्धा को कैसे संतुलित रखे और कब तक रणनीतिक धैर्य दिखाए।
कूटनीति का यह अध्याय शुरू तो हो गया है, लेकिन इसका अंत बोलियों नहीं, बल्कि फैसलों और ज़मीन पर बदलाव से होगा।
