चीन भूस्खलन: एक स्थानीय निवासी ने सरकारी मीडिया को बताया कि पूरी रात बारिश होती रही। घटना स्थल का एक ड्रोन वीडियो सामने आया है जिसमें हरे-भरे पहाड़ी इलाके को चीरते हुए भूरे मलबे की एक विशाल पट्टी साफ़ नजर आ रही है।

“धरती कांपी, पहाड़ टूटा और पल भर में जिंदगियां दफन हो गईं।” दक्षिण-पश्चिमी चीन में रविवार की सुबह वह मंजर देखने को मिला जो किसी भूकंप या बम धमाके से कम नहीं था। सिचुआन प्रांत के पहाड़ी इलाके में भयंकर भूस्खलन के कारण 4 लोगों की मौत हो गई, जबकि 17 से अधिक लोग अब भी मलबे में फंसे हुए हैं।
क्या है घटना का पूरा मामला?
19 मई 2025 को सुबह तकरीबन 7:45 बजे, सिचुआन प्रांत के बायन काउंटी के एक छोटे से गांव में अचानक भूस्खलन हुआ। गांव के अधिकांश लोग उस समय सो रहे थे। प्रशासन के मुताबिक, मूसलाधार बारिश के कारण जमीन अस्थिर हो गई थी, और पूरा पहाड़ी क्षेत्र खिसक गया, जिससे लगभग 12 घर पूरी तरह मलबे में तब्दील हो गए।
चीख-पुकार और मलबे के नीचे दबे लोग
स्थानीय निवासी ली झोंग, जो हादसे के वक्त खेत की ओर जा रहे थे, ने कहा,
“मैंने एक अजीब सी गर्जना सुनी और जब मुड़कर देखा तो पूरा पहाड़ मानो हमारे गांव पर टूट पड़ा। लोग चिल्ला रहे थे, बच्चे रो रहे थे, और कुछ ही पलों में सब कुछ शांत हो गया।”
रेस्क्यू ऑपरेशन में झोंकी गई पूरी ताकत
चीनी प्रशासन ने फौरन आपातकालीन बचाव दल मौके पर भेजे। सेना, फायर ब्रिगेड, और मेडिकल टीमों के साथ मिलकर 300 से अधिक रेस्क्यू कर्मी मलबा हटाने में लगे हैं। मौके पर 8 जेसीबी मशीनें, 2 ड्रोन, और विशेष थर्मल स्कैनिंग उपकरण लगाए गए हैं, ताकि मलबे में फंसे लोगों की लोकेशन पता की जा सके।
अब तक क्या हुआ रेस्क्यू में?
4 शव बरामद किए जा चुके हैं।
6 लोगों को जीवित बाहर निकाला गया, जिनमें से दो की हालत गंभीर है।
17 लोग अब भी लापता हैं, जिनकी तलाश जारी है।
तेज बारिश बना रही है काम मुश्किल
रेस्क्यू ऑपरेशन में सबसे बड़ी बाधा लगातार हो रही बारिश है। भूस्खलन के कारण बनी कीचड़ और दलदल में मशीनें बार-बार फंस रही हैं। बचावकर्मी हाथों से खुदाई करने को मजबूर हैं। मौसम विभाग ने अगले 24 घंटे में और बारिश की चेतावनी दी है, जिससे स्थिति और बिगड़ सकती है।
प्रधानमंत्री ली कियांग का बयान
चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग ने घटना पर दुख व्यक्त करते हुए कहा:
“यह एक राष्ट्रीय त्रासदी है। केंद्र सरकार हर संभव सहायता दे रही है। जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उनके लिए मुआवजे और पुनर्वास की योजनाएं जल्द शुरू की जाएंगी।”
क्या पहले से था खतरे का संकेत?
सवाल उठ रहे हैं कि क्या स्थानीय प्रशासन को पहले से इस खतरे का अंदेशा था? गांव वालों का दावा है कि पिछले कुछ हफ्तों से पहाड़ से मलबा गिरने की घटनाएं हो रही थीं, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
स्थानीय NGO कार्यकर्ता लियू फंग ने कहा:
“सरकार को पहले ही पहाड़ की दरारों का सर्वे करना चाहिए था। इस क्षेत्र में पिछले तीन महीनों में औसत से दोगुनी बारिश हो चुकी है, लेकिन लापरवाही की वजह से आज ये दिन देखना पड़ा।”
जानिए सिचुआन क्यों है इतना संवेदनशील?
सिचुआन चीन का वह इलाका है जहां भूकंप और भूस्खलन की घटनाएं अक्सर होती हैं।
2008 में आए भूकंप में इसी इलाके में 70,000 से ज्यादा लोगों की जान गई थी।
यह इलाका तिब्बती पठार के किनारे स्थित है और बारिश के मौसम में खासा संवेदनशील हो जाता है।
ड्रोन से मलबे पर नजर
रेस्क्यू टीमों ने हाई-टेक ड्रोन का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। ड्रोन से इलाके की स्कैनिंग की जा रही है और ऐसे इलाकों को चिन्हित किया जा रहा है जहां मलबे के नीचे लोगों के होने की संभावना है। थर्मल इमेजिंग कैमरों से भी जीवित लोगों की तलाश की जा रही है।
स्थानीय लोग अब भी दहशत में
घटना के बाद पूरे गांव में मातम का माहौल है। सैकड़ों लोग अपने रिश्तेदारों की तलाश में घटनास्थल के पास जमा हैं। गांव के बाहर एक अस्थायी शिविर लगाया गया है, जहां खाने-पीने और प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था की गई है।
भारत की प्रतिक्रिया
भारत के विदेश मंत्रालय ने चीन की इस त्रासदी पर संवेदना व्यक्त की है। प्रवक्ता ने बयान जारी कर कहा:
“हम चीन के लोगों के साथ खड़े हैं और किसी भी प्रकार की मानवीय सहायता देने को तैयार हैं।”
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ ‘मलबे में उम्मीद’
एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है जिसमें रेस्क्यू टीम ने मलबे में दबी एक छोटी बच्ची को 14 घंटे बाद जिंदा बाहर निकाला। उस बच्ची ने कहा,
“मुझे मम्मी के पास जाना है।”
इस वीडियो ने दुनियाभर में लोगों की आंखें नम कर दीं।
निष्कर्ष: क्या यह चेतावनी है मानवता के लिए?
बार-बार हो रही ऐसी प्राकृतिक आपदाएं हमें यही बताती हैं कि जलवायु परिवर्तन अब कोई दूर की बात नहीं, बल्कि हमारे दरवाज़े पर दस्तक दे चुका है। अनियंत्रित शहरीकरण, पहाड़ों की खुदाई, और जल-जंगल के संतुलन से खिलवाड़ अब मानवता पर भारी पड़ रहा है।
सवाल यह है कि क्या हम जागेंगे या फिर हर बार मौतों की गिनती और मलबे के ढेर को ही खबर बनाते रहेंगे?
