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ऑपरेशन सिंदूर: भारत की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को लेकर 32 देशों की यात्रा पर रवाना होंगे सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल

अपने दौरे के दौरान, ये सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल 33 देशों में सांसदों, मंत्रियों, सरकारी अधिकारियों और थिंक टैंकों से मुलाकात करेंगे ताकि यह रेखांकित किया जा सके कि भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के जरिए सीमा पार आतंकवाद से निपटने के लिए एक नया मानक स्थापित किया है।

भारत सरकार ने आतंकवाद के खिलाफ अपनी सख्त ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को वैश्विक स्तर पर प्रसारित करने के लिए एक ऐतिहासिक और व्यापक कूटनीतिक मिशन की शुरुआत की है। इस मिशन के तहत, देश के प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों का एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल 32 देशों की यात्रा करेगा। इस दौरे का मुख्य उद्देश्य भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति और ऑपरेशन सिंदूर के तहत लिए गए निर्णायक कदमों की जानकारी साझा करना है।

क्या है ‘ऑपरेशन सिंदूर’?
‘ऑपरेशन सिंदूर’ भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर के पहलगाम क्षेत्र में आतंकवाद के खिलाफ चलाया गया एक सख्त सैन्य अभियान था, जिसमें कई आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया गया। यह ऑपरेशन उस वक्त और भी ज़रूरी हो गया जब पाकिस्तान प्रायोजित आतंकियों ने भारतीय सुरक्षा बलों और नागरिकों को निशाना बनाया। इसमें 26 लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी, जिनमें आम नागरिक, तीर्थयात्री और सुरक्षा कर्मी शामिल थे।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की रणनीति
विदेश मंत्रालय और संसदीय कार्य मंत्रालय के समन्वय से तैयार किए गए इस मिशन के तहत भारत अब आतंकवाद को वैश्विक सुरक्षा खतरे के रूप में चिन्हित कर, अन्य देशों को भी इसमें भागीदार बनाने की कोशिश कर रहा है। भारत यह स्पष्ट करना चाहता है कि आतंक को किसी देश विशेष की समस्या मानना अब एक भूल होगी – यह एक वैश्विक संकट है, जिसका समाधान मिलकर ही हो सकता है।

किन देशों में जाएगा प्रतिनिधिमंडल?
संसदीय कार्य मंत्रालय द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, यह प्रतिनिधिमंडल अमेरिका, फ्रांस, रूस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, यूके, जर्मनी, इज़रायल, सऊदी अरब, यूएई, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, अर्जेंटीना, कतर, मिस्र, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, कनाडा, नॉर्वे, स्वीडन, इटली, स्पेन, थाईलैंड, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, म्यांमार, केन्या, नाइजीरिया और मैक्सिको जैसे देशों का दौरा करेगा।

किसने किया नेतृत्व का ऐलान?
गृह मंत्री अमित शाह और विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने संयुक्त रूप से इस प्रतिनिधिमंडल की घोषणा की। उन्होंने कहा कि “यह कूटनीतिक प्रयास भारत की वैश्विक भूमिका को नई ऊँचाइयों तक ले जाएगा। हम न सिर्फ अपने देश की सुरक्षा नीति को मजबूती से पेश करेंगे, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी इसके समर्थन के लिए प्रेरित करेंगे।”

किन दलों को मिला प्रतिनिधित्व?
इस प्रतिनिधिमंडल में बीजेपी, कांग्रेस, एनसीपी, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, बीजेडी, डीएमके, एआईएडीएमके, शिवसेना (शिंदे और उद्धव गुट), वाईएसआर कांग्रेस, टीआरएस, आरजेडी, जेडीयू, बीएसपी, समाजवादी पार्टी, और वाम दलों से सांसदों को शामिल किया गया है।

आतंकवाद के वित्तीय स्रोतों पर भी होगी बात
सिर्फ आतंकियों पर गोलियां चलाना काफी नहीं होता – उन्हें मिलने वाले आर्थिक समर्थन पर भी प्रहार करना ज़रूरी है। इसी कड़ी में, भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह भी उठाया है कि पाकिस्तान को दी जा रही IMF और अन्य संस्थाओं की आर्थिक सहायता, कहीं न कहीं आतंकवाद को अप्रत्यक्ष समर्थन देती है। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह पहले ही इस मुद्दे को उठाकर IMF से अपील कर चुके हैं कि वह पाकिस्तान की गतिविधियों पर पुनः विचार करे।

डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी बढ़ेगी सक्रियता
भारत सरकार की ओर से बताया गया कि इस मिशन के तहत विदेशों में सिर्फ राजनयिक या राजनीतिक बैठकें ही नहीं होंगी, बल्कि स्थानीय मीडिया, विश्वविद्यालयों, थिंक टैंकों और डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स से भी संवाद किया जाएगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत की आवाज सिर्फ सरकारी गलियारों तक सीमित न रह जाए, बल्कि आम जनता तक पहुँचे।

विपक्ष का समर्थन और आलोचना
हालांकि ज्यादातर विपक्षी दलों ने इस पहल की सराहना की है, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने यह सवाल भी उठाया कि “क्या ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने भारत की रणनीति की जानकारी पहले से कैसे पा ली? क्या हमारी खुफिया जानकारी लीक हुई?” उन्होंने विदेश मंत्री से इस पर जवाब मांगा है।

दूसरी ओर, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस पहल को “सार्थक” बताया और कहा कि “जब देश की सुरक्षा का सवाल हो, तब राजनीति नहीं, एकजुटता ज़रूरी होती है।”

पाकिस्तान की प्रतिक्रिया
पाकिस्तान ने हमेशा की तरह इस कदम को “भारत की छवि चमकाने का प्रयास” कहा है। पाक विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इस मिशन को “प्रोपगेंडा अभियान” बताया है। हालांकि, भारत ने सख्त शब्दों में कहा है कि “यह कोई प्रचार नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा का साझा प्रयास है।”

क्या यह मिशन सफल होगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह भारत की सॉफ्ट पावर का एक महत्वपूर्ण प्रयोग है। इससे न केवल भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत होगी, बल्कि पाकिस्तान जैसे देशों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जवाब देना कठिन होगा। साथ ही, यह भारत की आतंरिक राजनीतिक एकता का भी प्रदर्शन है – जब तमाम दल देशहित में एक सुर में बोल रहे हैं।

निष्कर्ष
सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल का यह ऐतिहासिक कदम यह दर्शाता है कि भारत अब सिर्फ सीमा पर नहीं, बल्कि विश्व मंच पर भी आतंक के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ रहा है। ऑपरेशन सिंदूर और उसके बाद की कूटनीतिक पहलें इस बात की गवाही देती हैं कि नया भारत न तो झुकेगा, न चुप रहेगा – बल्कि हर हमले का जवाब देगा, हर मंच पर देगा, और दुनिया को भी इसका गवाह बनाएगा।

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Harshita Ahuja

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