18 मई को महमूदाबाद को हरियाणा पुलिस ने राष्ट्रीय एकता की रक्षा के लिए बनाए गए कानून भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के तहत संक्रमण रिमांड (ट्रांजिट रिमांड) के बिना कथित रूप से गिरफ्तार किया।

नई दिल्ली, 19 मई 2025: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अशोक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. प्रणव मेहता को बड़ी राहत देते हुए उन्हें ऑपरेशन सिंदूर पर कथित विवादित टिप्पणियों के मामले में अंतरिम जमानत दे दी। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का दुरुपयोग देश की सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने डॉ. मेहता को यह निर्देश भी दिया कि वे सोशल मीडिया या किसी भी सार्वजनिक मंच पर ऑपरेशन सिंदूर को लेकर कोई बयान न दें, जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती।
ऑपरेशन सिंदूर पर क्या बोले थे प्रोफेसर?
डॉ. प्रणव मेहता, जो कि राजनीतिक विज्ञान के वरिष्ठ प्रोफेसर हैं, ने ऑपरेशन सिंदूर पर केंद्र सरकार की रणनीति और कार्रवाई को लेकर X (पूर्व में ट्विटर) और इंस्टाग्राम पर कुछ टिप्पणियां की थीं, जिन्हें “राष्ट्रविरोधी” और “आतंकवाद के प्रति सहानुभूति” के रूप में देखा गया। उनके एक पोस्ट में यह कहा गया था कि, “अगर भारत खुद को लोकतांत्रिक कहता है, तो सैन्य अभियानों को लेकर सवाल पूछना नागरिकों का अधिकार है।”
यह पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और इसके बाद राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने इसे गंभीरता से लेते हुए गृह मंत्रालय को रिपोर्ट सौंपी। इसके आधार पर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने प्रोफेसर के खिलाफ UAPA और आईटी एक्ट की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: “अभिव्यक्ति के साथ ज़िम्मेदारी भी ज़रूरी”
मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान प्रोफेसर के वकील कपिल सिब्बल से कहा, “आपके मुवक्किल केवल अधिकारों की बात कर रहे हैं, लेकिन उनके संवैधानिक कर्तव्यों का क्या? जब राष्ट्र संकट की स्थिति में होता है, तो हर नागरिक की ज़िम्मेदारी बनती है कि वह एकजुटता दिखाए, न कि भ्रम फैलाए।”
कोर्ट ने कहा कि यह मामला सिर्फ व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है। अदालत ने सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलों को भी गंभीरता से लिया, जिन्होंने बताया कि प्रोफेसर की टिप्पणी का हवाला पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा चैनल्स ने भी दिया है।
अंतरिम जमानत की शर्तें
सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफेसर मेहता को 4 सप्ताह के लिए अंतरिम राहत दी है लेकिन कुछ कठोर शर्तों के साथ:
वे न तो किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऑपरेशन सिंदूर या इससे संबंधित मामलों पर कोई बयान देंगे और न ही किसी सार्वजनिक मंच से संबोधित करेंगे।
वे जांच एजेंसियों के साथ पूरा सहयोग करेंगे।
यदि वे इन शर्तों का उल्लंघन करते हैं, तो यह जमानत स्वतः निरस्त मानी जाएगी।
ऑपरेशन सिंदूर: एक संक्षिप्त पृष्ठभूमि
ऑपरेशन सिंदूर भारतीय सेना और वायुसेना का एक संयुक्त प्रतिउत्तर अभियान था, जिसे मई की शुरुआत में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद अंजाम दिया गया था। इस हमले में 26 सुरक्षाकर्मियों की जान गई थी। ऑपरेशन के दौरान पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में आतंकी ठिकानों को टारगेट किया गया।
इस ऑपरेशन को देशभर में व्यापक समर्थन मिला लेकिन कुछ बुद्धिजीवी वर्गों और विपक्षी नेताओं ने सरकार की रणनीति और पारदर्शिता पर सवाल उठाए।
सोशल मीडिया की भूमिका और निगरानी
इस मामले ने फिर से यह बहस छेड़ दी है कि सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आज़ादी की सीमा क्या होनी चाहिए। सरकार के सूत्रों के अनुसार, रक्षा मंत्रालय अब एक नीति दस्तावेज़ पर काम कर रहा है जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित संवेदनशील विषयों पर सार्वजनिक टिप्पणी की सीमाएं तय की जाएंगी।
गृह मंत्रालय ने भी सोशल मीडिया कंपनियों से कहा है कि वे ऐसे अकाउंट्स को चिह्नित करें जो “अत्यधिक संवेदनशील या भ्रामक जानकारी” फैलाने में लिप्त हैं, खासकर सैन्य अभियानों और सीमा पार आतंकवाद से जुड़े मामलों में।
अकादमिक जगत की प्रतिक्रिया
देशभर के शिक्षाविदों में इस मामले को लेकर दो तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक पक्ष का मानना है कि प्रोफेसर मेहता का बयान उनके अकादमिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत आता है, जबकि दूसरा पक्ष मानता है कि इस तरह की टिप्पणियां विद्यार्थियों और आम नागरिकों में भ्रम की स्थिति पैदा करती हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा पर विपरीत प्रभाव डाल सकती हैं।
विपक्ष का बयान
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि, “यह सरकार की आलोचना को दबाने की कोशिश है। लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है।” वहीं भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने जवाब दिया कि, “यह कोई साधारण टिप्पणी नहीं थी, बल्कि यह पाकिस्तान की भाषा बोलने जैसा है।”
निष्कर्ष
इस प्रकरण ने एक बार फिर यह दिखाया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश कि अधिकार के साथ कर्तव्य भी ज़रूरी हैं, लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी सोच को दर्शाता है।
अगली सुनवाई जून के दूसरे सप्ताह में होनी है, जिसमें अदालत यह तय करेगी कि प्रोफेसर मेहता की जमानत को स्थायी बनाया जाए या नहीं।
