सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 201 के अंतर्गत राष्ट्रपति की सहमति (असेंट) न्यायिक समीक्षा के अधीन है या नहीं, इस पर परस्पर विरोधाभासी निर्णय दिए हैं। ऐसे में राष्ट्रपति द्वारा उठाए गए प्रश्न संविधान में कार्यपालिका और न्यायपालिका की शक्तियों की सीमाओं को स्पष्ट करने का प्रयास हैं।

नई दिल्ली – देश की सबसे ऊँची संवैधानिक कुर्सी और सर्वोच्च न्यायपालिका के बीच एक ऐसा सवाल उभरा है, जिसने न केवल राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, बल्कि यह बहस छेड़ दी है कि लोकतंत्र में शक्तियों का असली संतुलन किसके हाथ में है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा विधेयकों को मंजूरी देने की समय-सीमा तय करने की मंशा पर सीधा सवाल उठाया है — “क्या राष्ट्रपति और राज्यपाल की संवैधानिक स्वायत्तता पर न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है?”
यह सवाल तब सामने आया जब सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केरल सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि राज्यपालों को बिलों को पास करने में अनावश्यक देरी नहीं करनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि विधेयकों पर समयबद्ध निर्णय लेना अनिवार्य होना चाहिए। इसी संदर्भ में राष्ट्रपति मुर्मू ने बेहद सतर्क लेकिन स्पष्ट भाषा में यह कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपाल एक “संवैधानिक विवेक” के तहत कार्य करते हैं, न कि न्यायिक समय-सारिणी के तहत।
राष्ट्रपति की टिप्पणी और उसका निहितार्थ
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का बयान सिर्फ एक संस्थागत प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक बड़े संवैधानिक प्रश्न को जन्म देता है — क्या न्यायपालिका, जो खुद संविधान की व्याख्या करती है, अन्य संवैधानिक संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र को सीमित कर सकती है?
राष्ट्रपति ने यह सवाल तब उठाया जब वे एक विधिक संगोष्ठी को संबोधित कर रही थीं। उन्होंने कहा:
“एक लोकतंत्र में, प्रत्येक संस्था की अपनी गरिमा और कार्य-सीमा होती है। राष्ट्रपति और राज्यपालों के निर्णय, खासकर विधेयकों पर अनुमोदन से जुड़े, संवैधानिक विवेक पर आधारित होते हैं। अगर उन पर समयसीमा थोपी जाती है, तो यह उनकी संवैधानिक स्वायत्तता को प्रभावित कर सकता है।”
सुप्रीम कोर्ट का रुख क्या है?
सुप्रीम कोर्ट का तर्क है कि राज्यपाल और राष्ट्रपति को किसी भी विधेयक पर “अनिश्चितकालीन मौन” नहीं रहना चाहिए। संविधान का अनुच्छेद 200 राज्यपाल को यह विकल्प देता है कि वह किसी राज्य विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ भेज सकता है, लेकिन इसमें यह स्पष्ट नहीं है कि कितने समय में फैसला लिया जाना चाहिए।
कोर्ट का यह कहना है कि विधायी प्रक्रिया को न्यायपूर्ण और प्रभावी बनाए रखने के लिए समयसीमा का निर्धारण जरूरी है, ताकि राज्य सरकारों के प्रस्तावों को अनिश्चितकालीन अधर में न लटकाया जा सके।
टकराव की पृष्ठभूमि: केरल बनाम राज्यपाल
इस पूरे विवाद की जड़ केरल सरकार और वहां के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के बीच जारी रस्साकशी में है। केरल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि राज्यपाल सरकार द्वारा पारित किए गए 8 बिलों को मंजूरी देने में महीनों लगा रहे हैं। कोर्ट ने इस याचिका पर सख्त टिप्पणी की और कहा कि “संविधान ने राज्यपाल को सोचने की शक्ति दी है, लेकिन यह सोच अनंतकाल तक नहीं चल सकती।”
इसी पृष्ठभूमि में राष्ट्रपति का बयान आया है, जिसने इस बहस को राष्ट्रीय स्तर पर ला खड़ा किया है।
क्या यह कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका है?
कई संवैधानिक विशेषज्ञ इस मुद्दे को “संविधान के तीन स्तंभों — विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका” के बीच की शक्तियों के विभाजन के नजरिए से देख रहे हैं।
प्रसिद्ध संवैधानिक जानकार प्रो. रजनीश अवस्थी कहते हैं:
“राष्ट्रपति ने जिस तरह से यह सवाल उठाया है, वह न्यायपालिका के अधिकारक्षेत्र की सीमाओं को रेखांकित करता है। सुप्रीम कोर्ट की मंशा विधायी प्रक्रिया को द्रुत और पारदर्शी बनाना है, लेकिन राष्ट्रपति या राज्यपाल पर समयसीमा थोपना संविधान में उल्लिखित ‘विवेकाधिकार’ का अतिक्रमण हो सकता है।”
विपक्ष ने क्या कहा?
इस पूरे घटनाक्रम पर विपक्ष भी कूद पड़ा है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने ट्वीट किया:
“यह दुखद है कि राष्ट्रपति को न्यायपालिका के खिलाफ बोलने की स्थिति में लाया गया है। क्या यह बयान स्वतःस्फूर्त है, या इसे राजनीतिक प्रभाव में दिया गया?”
वहीं, आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी न्यायोचित है और विधेयकों को जानबूझकर अटका कर लोकतंत्र का अपमान हो रहा है।
सत्तापक्ष का समर्थन
बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने राष्ट्रपति के बयान का समर्थन करते हुए कहा:
“राष्ट्रपति का विवेक सर्वोच्च है। न्यायपालिका को अपनी मर्यादा में रहकर काम करना चाहिए। संविधान में ‘Separation of Powers’ का स्पष्ट सिद्धांत है।”
क्या कहते हैं पूर्व राष्ट्रपति और राज्यपाल?
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की आत्मकथा में यह जिक्र है कि कई बार उन्होंने बिलों को लेकर विस्तृत अध्ययन किया और फैसले लेने में समय लिया। वह कहते हैं कि राष्ट्रपति कोई “रबर स्टांप” नहीं होता।
इसी तरह, पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का कहना है कि कई बार बिल संविधान के मूल ढांचे से टकराते हैं, और गहन समीक्षा जरूरी होती है।
आगे का रास्ता क्या है?
सवाल यह है कि अगर राष्ट्रपति और राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट समयसीमा थोपता है, तो क्या यह शक्ति-संतुलन का उल्लंघन नहीं होगा?
संविधान विशेषज्ञ सुब्रत मुखर्जी का कहना है:
“समाधान यह नहीं कि एक संस्था दूसरी पर हावी हो, बल्कि यह है कि सभी संवैधानिक संस्थाएं परस्पर सम्मान और समन्वय से कार्य करें। समयसीमा की बात हो सकती है, लेकिन उसे सहमति से तय किया जाना चाहिए, थोप कर नहीं।”
निष्कर्ष
राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के बीच यह नया टकराव संवैधानिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ हो सकता है। यह बहस हमें याद दिलाती है कि भारत का संविधान जितना विस्तृत है, उतना ही व्याख्यायोग्य भी है। हर संस्था की अपनी मर्यादा है, लेकिन जब सीमाएं धुंधली होने लगें, तो टकराव तय है।
अब देखना यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट अपने रुख पर कायम रहता है, या यह संवैधानिक विवाद संसद के हस्तक्षेप तक पहुंचेगा?
देश के लोकतंत्र की नींव मजबूत तभी होगी, जब उसके तीन स्तंभ – विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका – अपने-अपने दायरे में रहकर काम करें।
