वक्फ अधिनियम पर सुनवाई: वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को संसद ने 4 अप्रैल को पारित किया और अगले दिन, 5 अप्रैल को इसे राष्ट्रपति की मंजूरी प्राप्त हुई। इसके बाद केंद्र सरकार ने अधिनियम को लागू करने की अधिसूचना जारी की, जिसके तहत यह अधिनियम 8 अप्रैल से प्रभाव में आ गया।

विवादों में घिरे वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार को झटका देते हुए इस पर दाखिल याचिकाओं पर 7 दिन के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। वक्फ अधिनियम में हालिया संशोधन के खिलाफ कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थीं, जिनमें इसे असंवैधानिक करार देने की मांग की गई है।
अधिनियम को लेकर क्या है विवाद?
वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को 4 अप्रैल को संसद में पारित किया गया था और 5 अप्रैल को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद इसे 8 अप्रैल से प्रभावी कर दिया गया। इस अधिनियम में वक्फ संपत्तियों के अधिग्रहण, प्रबंधन और उपयोग को लेकर कई अहम बदलाव किए गए हैं, जिनमें कुछ प्रावधानों को लेकर मुस्लिम समुदाय और अन्य संगठनों में भारी आक्रोश देखने को मिला है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह अधिनियम नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है और इससे वक्फ संपत्तियों पर समुदाय के स्वामित्व को खतरा है। कई राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने इस कानून को ‘राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित’ बताया है।
याचिकाएं और याचिकाकर्ता
अब तक इस अधिनियम को चुनौती देने वाली कुल 11 याचिकाएं दाखिल की जा चुकी हैं। इनमें वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, धार्मिक संगठनों और प्रभावित पक्षों ने भाग लिया है। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क है कि संशोधित अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार से जवाब तलब करते हुए कहा:
“इस मामले में गंभीर संवैधानिक प्रश्न शामिल हैं और हमें इसे प्राथमिकता से देखना होगा। केंद्र सरकार 7 दिनों के भीतर अपना विस्तृत हलफनामा दाखिल करे।”
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि सरकार समय पर जवाब नहीं देती है, तो वह अंतरिम आदेश पारित करने पर विचार कर सकती है।
केंद्र का पक्ष
सरकारी वकील ने कोर्ट से समय की मांग करते हुए कहा कि अधिनियम को हाल ही में लागू किया गया है और इस पर विस्तृत उत्तर तैयार करने के लिए समय चाहिए। हालांकि कोर्ट ने 7 दिनों की समयसीमा तय करते हुए यह सुनिश्चित किया कि मामला लंबित न रहे।
राज्यों में विरोध की लहर
वक्फ अधिनियम के खिलाफ विरोध की सबसे तीव्र लहर पश्चिम बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में देखी जा रही है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो सीधे-सीधे केंद्र पर आरोप लगाया कि वह “धार्मिक ध्रुवीकरण” के मकसद से यह कानून लाई है।
ममता बनर्जी ने कहा – “बंगाल को बदनाम करने की एक साजिश चल रही है। वक्फ अधिनियम में संशोधन मुसलमानों की संपत्तियों पर कब्जा करने का रास्ता है।”
केरल, बिहार और तेलंगाना की सरकारों ने भी इस अधिनियम के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताई है।
क्या हैं प्रमुख संशोधन?
वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 में कुछ प्रमुख बदलाव निम्नलिखित हैं:
वक्फ बोर्ड की शक्तियों में कटौती: अब वक्फ बोर्डों की नियुक्ति और निर्णयों में केंद्र का हस्तक्षेप अधिक होगा।
संपत्ति अधिग्रहण प्रक्रिया सरल: राज्य सरकारें अब वक्फ संपत्तियों को ‘जनहित’ में अधिग्रहण कर सकती हैं।
ऑडिट और पारदर्शिता: हर वक्फ संपत्ति का सालाना ऑडिट अनिवार्य किया गया है।
संवैधानिक निगरानी: वक्फ बोर्डों को अब संसद की समिति के अधीन भी जवाबदेह बनाया गया है।
मुस्लिम संगठनों की आपत्ति
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीयत उलेमा-ए-हिंद, और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) सहित कई मुस्लिम संगठन इस अधिनियम का विरोध कर रहे हैं। इन संगठनों का कहना है कि इससे धार्मिक स्वतंत्रता और समुदाय की पहचान पर आघात पहुँचता है।
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा:
“यह अधिनियम सिर्फ संपत्तियों पर नियंत्रण पाने का प्रयास है। यह मुसलमानों के धार्मिक अधिकारों का दमन है।”
आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से यह स्पष्ट हो गया है कि वक्फ अधिनियम अब केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गया, बल्कि यह एक संवैधानिक बहस का केंद्र बन गया है। आने वाले हफ्तों में कोर्ट की सुनवाई और केंद्र के जवाब पर देश की निगाहें टिकी होंगी।
अगर कोर्ट ने याचिकाओं को गंभीरता से लिया, तो इस अधिनियम पर रोक लग सकती है या इसके कुछ प्रावधानों को निरस्त भी किया जा सकता है।
निष्कर्ष
वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 ने देशभर में बहस और विरोध का वातावरण तैयार कर दिया है। एक ओर सरकार इसे पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में उठाया गया कदम मानती है, वहीं दूसरी ओर कई समुदाय और संगठन इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला करार दे रहे हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस पर क्या निर्णय देता है और देश की लोकतांत्रिक व संवैधानिक व्यवस्था में इस फैसले का क्या असर पड़ता है।
