पहले 15 जनवरी को, राहुल गांधी ने भाजपा पर हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल सिर्फ भाजपा से ही नहीं, बल्कि भारतीय राज्य से भी लड़ रहे हैं।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी के लिए एक नई कानूनी मुसीबत खड़ी हो गई है। उत्तर प्रदेश के समभल जिले की अदालत ने उनके खिलाफ नोटिस जारी किया है, जो उन्होंने 15 जनवरी को दिए गए अपने बयान में ‘भारतीय राज्य के खिलाफ लड़ाई’ का जिक्र किया था। यह मामला अब कानूनी दायरे में आ गया है और राहुल गांधी को अदालत के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए कहा गया है।
राहुल गांधी के इस बयान ने देश की राजनीति में हलचल मचा दी थी, और इसके बाद भाजपा सहित कई राजनीतिक दलों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी थी। वहीं, समभल कोर्ट ने इस मामले में राहुल गांधी को नोटिस जारी कर दिया है, जिससे उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की संभावना बढ़ गई है।
15 जनवरी का बयान
राहुल गांधी ने 15 जनवरी को एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान भाजपा पर निशाना साधते हुए यह बयान दिया था कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल सिर्फ भाजपा से नहीं, बल्कि भारतीय राज्य से भी लड़ रहे हैं। राहुल गांधी के इस बयान में ‘भारतीय राज्य के खिलाफ लड़ाई’ शब्दों का इस्तेमाल किया गया था, जिसके बाद भाजपा और अन्य दलों ने इसे देश विरोधी बयान करार दिया और राहुल गांधी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की।
राहुल गांधी ने इस बयान में भारतीय राज्य की ताकत और भाजपा की राजनीति के खिलाफ विपक्ष की एकजुटता को व्यक्त किया था। उनका कहना था कि भाजपा सिर्फ एक पार्टी नहीं है, बल्कि यह भारतीय राज्य का प्रतिनिधित्व करती है और कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को केवल भाजपा से नहीं, बल्कि पूरे राज्य तंत्र से मुकाबला करना पड़ रहा है। उनका यह बयान इस तथ्य पर आधारित था कि भाजपा ने केंद्र में सत्ता में आने के बाद से राज्यों के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल किया था और विपक्षी नेताओं को निशाना बनाया था।
समभल कोर्ट का नोटिस
राहुल गांधी के बयान पर विवाद के बाद, समभल जिले की अदालत ने इस मामले में नोटिस जारी किया है। अदालत ने यह नोटिस भाजपा के एक कार्यकर्ता की शिकायत पर जारी किया, जिन्होंने राहुल गांधी के बयान को ‘राज्य विरोधी’ और ‘देशद्रोह’ के रूप में आरोपित किया। शिकायतकर्ता ने दावा किया कि राहुल गांधी का यह बयान भारतीय राज्य के खिलाफ नकारात्मक और भड़काऊ था और इससे देश की एकता और अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
अदालत ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए राहुल गांधी को नोटिस जारी कर उन्हें 30 मार्च तक अपनी उपस्थिति और जवाब देने का आदेश दिया है। यदि राहुल गांधी अदालत में अपनी स्थिति स्पष्ट करने में असफल रहते हैं, तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
भाजपा और विपक्ष की प्रतिक्रिया
राहुल गांधी के बयान के बाद भाजपा ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी। भाजपा नेताओं ने इस बयान को देशद्रोही और असंविधानिक करार दिया था। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा था, “राहुल गांधी का बयान यह सिद्ध करता है कि वे और कांग्रेस पार्टी भारतीय राज्य की संस्थाओं का अपमान कर रही हैं। यह बयान भारतीय संविधान के खिलाफ है और इसे किसी भी सूरत में सहन नहीं किया जा सकता।”
इसके जवाब में कांग्रेस ने भी अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा था कि राहुल गांधी का बयान केवल भाजपा की राजनीतिक गतिविधियों पर आधारित था और इसका उद्देश्य भारतीय राज्य की संस्थाओं का अपमान नहीं था। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा था, “राहुल गांधी का बयान केवल भाजपा की तानाशाही और दमनकारी नीतियों के खिलाफ था। यह बयान किसी भी तरह से भारतीय राज्य या उसकी संस्थाओं के खिलाफ नहीं था।”
कानूनी विशेषज्ञों की राय
इस मामले पर कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि समभल कोर्ट का यह कदम राजनीतिक रूप से प्रेरित हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि राहुल गांधी का बयान किसी प्रकार से कानून के दायरे में ‘देशद्रोह’ या ‘राज्य विरोधी’ नहीं माना जा सकता है, जब तक कि उसमें किसी प्रकार का हिंसा या आतंकवादी गतिविधियों का समर्थन न किया गया हो।
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और कानूनी विशेषज्ञ, डॉ. अजय कुमार ने कहा, “राहुल गांधी का बयान निश्चित रूप से विवादित था, लेकिन यह बयान किसी तरह से देशद्रोह के दायरे में नहीं आता। भारतीय संविधान के तहत, किसी भी व्यक्ति को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है, और यह मामला राजनीति से प्रेरित हो सकता है।”
विपक्षी दलों का समर्थन
कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ समभल कोर्ट द्वारा जारी किए गए नोटिस पर विपक्षी दलों ने भी प्रतिक्रिया दी है। कई विपक्षी नेताओं ने इसे भारतीय लोकतंत्र की आवाज को दबाने की कोशिश करार दिया है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी राहुल गांधी के समर्थन में बयान दिए हैं।
ममता बनर्जी ने कहा, “यह स्पष्ट है कि भाजपा अपने राजनीतिक विरोधियों को डराने-धमकाने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल कर रही है। राहुल गांधी को उनकी राय रखने का पूरा अधिकार है, और इस प्रकार की कार्रवाई को हम लोकतंत्र के खिलाफ मानते हैं।” वहीं, अरविंद केजरीवाल ने भी इसे “भ्रष्टाचार और तानाशाही” के खिलाफ आवाज उठाने वाले नेता को निशाना बनाने की एक साजिश बताया।
भाजपा के दावे और कांग्रेस का पलटवार
भा.ज.पा. और कांग्रेस के बीच यह विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। भाजपा जहां राहुल गांधी के बयान को ‘देशद्रोह’ के रूप में देख रही है, वहीं कांग्रेस इसे भारतीय लोकतंत्र में एक स्वस्थ आलोचना के रूप में प्रस्तुत कर रही है। कांग्रेस का कहना है कि राहुल गांधी का बयान केवल भाजपा सरकार की नीतियों और उनके द्वारा की जा रही गलतियों पर था, और इसमें किसी भी तरह का देशद्रोह या भारतीय राज्य के खिलाफ कुछ भी नहीं था।
कांग्रेस पार्टी के नेता ने यह भी कहा कि यह मामला भाजपा के अंदरूनी खौफ और राहुल गांधी की बढ़ती लोकप्रियता को दबाने का एक प्रयास है। उनका कहना है कि भाजपा का यह कदम केवल राहुल गांधी को चुप कराने के लिए है, ताकि वे भविष्य में भाजपा की नीतियों के खिलाफ न बोलें।
आगामी दौर में क्या होगा?
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि समभल कोर्ट राहुल गांधी के मामले में क्या निर्णय लेती है। 30 मार्च तक राहुल गांधी को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का समय दिया गया है, और यह संभावना जताई जा रही है कि राहुल गांधी इस मुद्दे पर अदालत में अपनी सफाई देंगे।
इस मामले में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियां कानूनी और राजनीतिक मोर्चे पर एक-दूसरे से भिड़ सकती हैं। राहुल गांधी को एक्जीक्यूटिव आदेश या अन्य कानूनी तरीकों से राहत मिल सकती है, लेकिन भाजपा और अन्य विपक्षी दल इस पूरे मामले को राजनीतिक दृष्टिकोण से देख रहे हैं।
निष्कर्ष
राहुल गांधी के ‘भारतीय राज्य के खिलाफ लड़ाई’ बयान पर समभल कोर्ट द्वारा जारी किए गए नोटिस ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। इस मामले में अदालत का निर्णय भारतीय राजनीति में एक नया मोड़ ला सकता है। जहां भाजपा राहुल गांधी के बयान को देशद्रोह मान रही है, वहीं कांग्रेस इसे भाजपा के खिलाफ लोकतांत्रिक विरोध की अभिव्यक्ति मानती है। अब यह देखना बाकी है कि इस मामले में कोर्ट क्या निर्णय लेती है, और यह भारतीय राजनीति को किस दिशा में लेकर जाता है।