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26/11 मुंबई आतंकी हमले के आरोपी और लश्कर-ए-तैयबा के उपप्रमुख अब्दुल रहमान मक्की का लाहौर में दिल का दौरा पड़ने से निधन

मक्की, जो जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद के साले हैं, को 2020 में आतंकवाद वित्तपोषण के आरोप में एक आतंकवाद निरोधक अदालत द्वारा छह महीने की सजा सुनाई गई थी। आतंकवाद वित्तपोषण के मामले में सजा मिलने के बाद मक्की, जो JuD के उप प्रमुख थे, ने अपनी गतिविधियों को कम कर लिया था और वह लंबे समय से सार्वजनिक रूप से कम दिखाई दे रहे थे।

लाहौर, 27 दिसंबर 2024: लश्कर-ए-तैयबा के उप प्रमुख और 26/11 मुंबई आतंकवादी हमले के प्रमुख साजिशकर्ता, अब्दुल रहमान मक्की, कल दिल का दौरा पड़ने से लाहौर में निधन हो गए। मक्की, जो जमात-उद-दावा के कुख्यात प्रमुख हाफिज सईद के साले थे, लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख नेताओं में से एक थे और भारत में कई आतंकवादी हमलों की साजिश में सक्रिय रूप से शामिल थे। उनका निधन उस समय हुआ है जब उनके खिलाफ आतंकवाद वित्तपोषण और अन्य अवैध गतिविधियों के कारण पहले ही पाकिस्तान की एक आतंकवाद निरोधक अदालत से सजा सुनाई जा चुकी थी।

अब्दुल रहमान मक्की का उत्थान
अब्दुल रहमान मक्की लश्कर-ए-तैयबा में अपने रणनीतिक और वैचारिक भूमिका के कारण महत्वपूर्ण बने। इनमें से एक महत्वपूर्ण भूमिका 2008 के मुंबई हमले की थी, जिसमें 166 लोगों की जान गई और कई अन्य घायल हो गए थे। ये हमले लश्कर-ए-तैयबा द्वारा योजना और संचालन किए गए थे, और मक्की इस साजिश में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे, जहां उन्होंने आतंकवादी समूह के लिए भर्ती और योजना बनाने में योगदान दिया था। हमले के दौरान 10 आतंकवादी समुद्र के रास्ते भारत में आए और ताज महल पैलेस होटल, ओबेरॉय ट्राइडेंट होटल और नारिमन हाउस जैसे स्थानों पर गोलीबारी की।

हमलों के बाद, मक्की भारतीय सुरक्षा एजेंसियों द्वारा सबसे वांछित आतंकवादियों में से एक बन गए। हालांकि, गिरफ्तारी के कई प्रयासों के बावजूद, वह वर्षों तक पाकिस्तानी सरजमीं से भारतीय अधिकारियों से बचते रहे और विभिन्न आतंकवादी संगठनों के साथ अपने संपर्कों के जरिए आतंकवाद को बढ़ावा देते रहे। लश्कर-ए-तैयबा में उनके वरिष्ठ नेता के रूप में पद उनकी प्रभावशाली स्थिति को और मजबूत करता था, और वह हाफिज सईद के करीबी सहयोगी माने जाते थे।

आतंकवाद वित्तपोषण में सजा
2020 में, अब्दुल रहमान मक्की को पाकिस्तान की एक आतंकवाद निरोधक अदालत द्वारा आतंकवाद वित्तपोषण के आरोप में छह महीने की सजा सुनाई गई थी। अदालत ने यह पाया कि मक्की लश्कर-ए-तैयबा की गतिविधियों के लिए धन जुटाने में सक्रिय रूप से शामिल थे और समूह के लिए युवा आतंकवादियों की भर्ती में मदद कर रहे थे। इस सजा को पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद पर काबू पाने की दिशा में एक छोटा कदम माना गया, लेकिन कई आलोचकों ने इसे प्रतीकात्मक कदम बताया और कहा कि यह उच्च-profile आतंकवादियों, जैसे कि हाफिज सईद, के खिलाफ ठोस कार्रवाई की कमी का इशारा करता है।

सजा के बाद मक्की ने खुद को ज्यादा समय तक मीडिया से दूर रखा और अधिकतर लाहौर में अपने घर में बंद रहे। हालांकि उन्होंने सार्वजनिक जीवन से दूरी बना ली थी, लेकिन फिर भी लश्कर-ए-तैयबा के अंदर उनका प्रभाव बना रहा।

लश्कर-ए-तैयबा में मक्की की भूमिका
मक्की लश्कर-ए-तैयबा के उप प्रमुख के रूप में समूह के सैन्य अभियानों और वैचारिक अभियानों में एक प्रमुख व्यक्ति थे। उन्हें विशेष रूप से पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा के लिए आतंकवादियों की भर्ती करने के लिए जाना जाता था और कहा जाता है कि उन्होंने कई युवाओं को भारत और अन्य स्थानों पर जिहादी गतिविधियों में शामिल होने के लिए उकसाया। मक्की भारत में आतंकवादी हमलों की योजना और संचालन में सक्रिय रूप से शामिल थे। वह आतंकवादी हमलों के लिए जरूरी लॉजिस्टिक सहायता प्रदान करते थे और क्षेत्र में अन्य आतंकवादी समूहों के साथ अपने संपर्कों को मजबूत करते थे।

मक्की की भूमिका केवल ऑपरेशनल योजना तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और भारत के खिलाफ जिहाद को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके प्रभाव से लश्कर-ए-तैयबा के अंदर एक मजबूत जिहादी मानसिकता का निर्माण हुआ, और वह एक आध्यात्मिक नेता के रूप में भी माने जाते थे।

मक्की के निधन का प्रभाव
मक्की का लाहौर में दिल का दौरा पड़ने से अचानक निधन एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है, खासकर क्योंकि वह वैश्विक आतंकवादी नेटवर्क में एक महत्वपूर्ण शख्सियत थे। हालांकि यह कहना मुश्किल है कि मक्की के निधन से लश्कर-ए-तैयबा पर क्या प्रभाव पड़ेगा, विशेषज्ञों का मानना है कि इसके बाद समूह के नेतृत्व में फेरबदल हो सकता है। उनका निधन उस समय हुआ है जब लश्कर-ए-तैयबा और पाकिस्तान में सक्रिय अन्य आतंकवादी समूह अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दबाव का सामना कर रहे हैं, जो इन समूहों के संचालन को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं।

पाकिस्तानी सरकार उनकी मौत पर सतर्क प्रतिक्रिया दे सकती है, क्योंकि लश्कर-ए-तैयबा का आतंकवाद में दशक भर का इतिहास है, विशेष रूप से भारत के खिलाफ। अंतरराष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान पर लगातार आरोप लगा रहा है कि वह आतंकवादियों को शरण देता है, जिसमें मक्की और उनके सहयोगी भी शामिल हैं, और उनके खिलाफ ठोस कार्रवाई करने में नाकाम रहा है। हालांकि, मक्की की मौत के बावजूद, लश्कर-ए-तैयबा की व्यापक गतिविधियों पर कोई बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है, क्योंकि समूह का उद्देश्य और कट्टरपंथी विचारधारा अभी भी कायम है।

हिंसा और आतंकवाद की विरासत
अब्दुल रहमान मक्की एक हिंसा और कट्टरपंथ की विरासत छोड़कर गए हैं, जिन्होंने भारतीय इतिहास के सबसे घातक आतंकवादी हमलों में से एक की साजिश रची थी। 26/11 के हमले आज भी भारत में वैश्विक आतंकवाद नेटवर्क्स के सक्रिय होने की याद दिलाते हैं। हालांकि उनका निधन लश्कर-ए-तैयबा के एक प्रमुख ऑपरेटर के लिए एक युग का अंत हो सकता है, लेकिन समूह की हिंसा और आतंक की निरंतर योजना और कार्यकलाप क्षेत्रीय और वैश्विक शांति के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं।

मक्की जैसे आतंकवादियों की विरासत भविष्य में भी खतरे के रूप में बनी रहेगी, और भारत और उसकी सुरक्षा एजेंसियां सतर्क रहेंगी। उनका निधन मुंबई हमले से प्रभावित लोगों के लिए एक प्रकार का समापन हो सकता है, लेकिन आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई अभी भी खत्म नहीं हुई है।

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Harshita Ahuja

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