देश में जब से राष्ट्रपति चुनाव चर्चा में है, तब से बिहार में सियासी गर्माहट देखने को मिल रही है। पहले नीतीश कुमार को लेकर सुर्खियां बनी। बाद में उन्होंने इसे अफवाह बता दिया। ऐसा लगा कि प्रेसिडेंट इलेक्शन का बिहार कनेक्शन खत्म हो चुका है। मगर विपक्ष ने इस हवा को बरकार रखा और मूलत: बिहार के यशवंत सिन्हा को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। अब नीतीश के फैसले पर सबकी निगाहें टिक गई है।

विपक्षी दल 16वें राष्ट्रपति चुनाव को कड़ी टक्कर देने पर विचार कर रहे हैं। यशवंत सिन्हा को अपना उम्मीदवार बनाकर विपक्ष अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जनता दल को अपने पक्ष में लाने की उम्मीद कर रहा है, ताकि लड़ाई को थोड़ा और तेज किया जा सके. पिछले कई हफ्तों से, जद और भाजपा एक-दूसरे के गले मिले हैं, और घर्षण का नवीनतम बिंदु सरकार की नई सैन्य भर्ती योजना अग्निपथ है।
राष्ट्रपति चुनाव में नीतीश कुमार का दिलचस्प इतिहास रहा है। 2012 में, जब वह एनडीए गठबंधन का हिस्सा थे, तब उन्होंने यूपीए उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी के पक्ष में मतदान किया था। और 2017 में, जब वह राजद के साथ महागठबंधन में थे, उन्होंने एनडीए के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को वोट दिया। श्री कोविंद के चुने जाने के कुछ ही हफ्तों बाद, श्री कुमार महागठबंधन से बाहर हो गए थे और एनडीए में लौट आए थे। इस प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए, विपक्षी दल उम्मीद कर रहे हैं कि श्री कुमार, भाजपा को एक संदेश भेजने के लिए, जिनके साथ बिहार 2020 के विधानसभा परिणामों के बाद से उनके असहज संबंध रहे हैं, उनके साथ मतदान कर सकते हैं। जद (यू) के नेता पार्टी की वोटिंग वरीयता के बारे में चुप्पी साधे हुए हैं। जदयू के पास 22,769 वोट हैं जो विपक्ष की संख्या को 4.5 लाख के पार पहुंचा देंगे।
इस चुनाव में केवल संसद सदस्य और राज्य विधानसभा के सदस्य ही मतदान कर सकते हैं। प्रत्येक सांसद के लिए एक वोट का मूल्य 700 है और प्रत्येक विधायक के लिए, मूल्य उस जनसंख्या की ताकत के अनुसार भिन्न होता है जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं।
राष्ट्रपति चुनाव में इस बार भी चौंकाएंगे नीतीश?
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने फैसलों से चौंकाते हैं। हालांकि ऐसी बात नहीं है कि वो अचानक से फैसले लेते हैं। जब लोगों के सामने आता है तो लगता है कि तुरंत में लिया गया डिसीजन है। मगर ऐसा कुछ होता नहीं है। नीतीश कुमार किसी भी निर्णय को अमल में लाने से पहले बहुत दूर की सोच चुके होते हैं। नफा और नुकसान का आकलन कर चुके होते हैं। जबकि भारतीय जनता पार्टी ने एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर द्रौपदी मुर्मू के नाम पर मुहर लगाई। द्रौपदी मुर्मू पहली आदिवासी महिला हैं तो राष्ट्रपति की रेस में शामिल होंगी। वहीं, विपक्ष के 19 पार्टियों के संयुक्त उम्मीदवार यशवंत सिन्हा होंगे। यशवंत सिन्हा आईएएस अधिकारी रह चुके हैं। कर्पूरी ठाकुर के साथ भी काम कर चुके हैं। जिन्हें नीतीश कुमार अपना आदर्श मानते हैं। खास बात ये कि यशवंत बाबू मूलत: बिहार के नालंदा जिले के अस्थावां के रहनेवाले हैं। मतलब नीतीश कुमार के गृह जिले का कनेक्शन है। पढ़ाई-लिखाई पटना विश्वविद्यालय के पटना कॉलेज से पूरी की है। नीतीश कुमार भी पटना यूनिवर्सिटी के छात्र रह चुके हैं। मतलब पूरा का पूरा कनेक्शन मैच कर रहा है।
नीतीश गठबंधन को प्रमुखता देंगे या उम्मीदवार को?
राष्ट्रपति चुनाव में नीतीश कुमार लिक से हटकर वोटिंग के लिए जाने जाते हैं। इसकी बानगी पिछले दो राष्ट्रपति चुनाव में देखी गई है। इस बार तो नीतीश कुमार के लिए पूरा मौका भी है। यशवंत बाबू में बिहार और नालंदा दोनों समाया हुआ है। जब प्रणब मुखर्जी और रामनाथ कोविंद को नीतीश व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर गठबंधन के खिलाफ वोट दे सकते हैं तो यशवंत सिन्हा के लिए दरवाजे तो खुल ही सकते हैं। पिछले दो बार के राष्ट्रपति चुनाव के विस्तार में जाएं तो साल 2012 के राष्ट्रपति चुनाव में प्रणब मुखर्जी यूपीए के प्रत्याशी थे। तब एनडीए में जेडीयू का पार्टनरशिप था। मगर राष्ट्रपति चुनाव में यूपीए प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी का साथ जेडीयू ने दिया था। उसी तरह, साल 2017 के राष्ट्रपति चुनाव में भी नीतीश कुमार ने गठबंधन से ज्यादा प्रत्याशी को अहमियत दी। उन्होंने एनडीए के प्रत्याशी रामनाथ कोविंद का साथ दिया। जबकि नीतीश कुमार की पार्टी महागठबंन (यूपीए) के हिस्से में थी। तब नीतीश कुमार ने कहा था कि बिहार के राज्यपाल को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया गया था, इसलिए उन्होंने एनडीए का साथ दिया।
लिटमस टेस्ट में कैसे पास होंगे नीतीश कुमार?
2022 में विपक्ष ने बिहार के यशवंत सिन्हा को राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित कर दिया है। वो भी पूरे दमखम के साथ। चुनाव में हार-जीत अलग बात है मगर नीतीश कुमार के लिए लिटमस टेस्ट से कम नहीं है। हालांकि जेडीयू की ओर से अब तक पत्ता नहीं खोला गया है। मगर नीतीश कुमार के लिए बिहार और नालंदा फैक्टर तो आ ही गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति चुनाव में नीतीश कुमार अपने फैसले से सहयोगियों को चौंकाते रहे हैं। 2012 में एनडीए हो या फिर 2017 में यूपीए। नीतीश कुमार ने लीक से हटकर मतदान किया। अगर नीतीश कुमार पहले की तरह कोई फैसला लेते हैं तो मुकाबला कांटे का हो जाएगा। पूरा दारोमदार नीतीश कुमार पर है कि वो बिहार-नालंदा-यशवंत सिन्हा को चुनते हैं या फिर गठबंधन को।