दुनिया को दो सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्तियों अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से शह मात का खेल चल रहा है। चीन को बढ़ते दबदबे पर लगाम लगाने के लिए अमेरिका अब एशिया में एक नया इकनॉमिक फोरम बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

मंगलवार को जापान में क्वाड शिखर सम्मेलन नेताओं को उनकी साझा पहल की प्रगति की समीक्षा करने और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में विकास और पारस्परिक हित के वैश्विक मुद्दों के बारे में विचारों का आदान-प्रदान करने का अवसर प्रदान करेगा, पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने प्रस्थान से पहले एक बयान में कहा। टोक्यो। मोदी की सबसे महत्वपूर्ण सगाई सोमवार को राष्ट्रपति जो बिडेन की महत्वाकांक्षी इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क पहल के शुभारंभ में उनकी भागीदारी होगी, जो इंडो-पैसिफिक अर्थव्यवस्थाओं और सुरक्षित और लचीला आपूर्ति श्रृंखलाओं के एकीकरण की मांग करती है।
IPEF जो बाइडन के दिमाग की उपज है और अभी इस बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है। भारत इसमें शामिल होगा या नहीं, अभी यह साफ नहीं है। इस इनिशिएटिव के जरिए अमेरिका क्लीन एनर्जी, डिकार्बनाइजेशन, इन्फ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन में सुधार जैसे साझा हित के मुद्दों पर एशिया के देशों के साथ पार्टनरशिप करेगा। कोरोना काल में चीन से सप्लाई बाधित हुई है और यही वजह है कि पूरी दुनिया इसके लिए एक ठोस विकल्प तैयार करना चाहती है। भारत कई बार कह चुका है कि दुनिया को एक विश्वसनीय सप्लाई चेन की जरूरत है। विदेश सचिव विनय क्वात्रा ने कहा कि भारत के लिए इलाके में इकनॉमिक कोऑपरेशन अहम है और प्रधानमंत्री का फोकस इसी बात पर रहेगा। उन्होंने कहा कि भारत IPEF पर अमेरिका के साथ चर्चा कर रहा है। यह इस बात का संकेत है कि भारत देर सबेर इससे जुड़ सकता है।
बाइडन के दिमाग की उपज
बाइडन ने सबसे पहले अक्टूबर 2021 में ईस्ट एशिया समिट में IPEF की बात कही थी। तब उन्होंने कहा था कि अमेरिका इंडो-पैसिफिक इकनॉमिक फ्रेमवर्क के विकास की संभावनवाओं का पता लगाएगा। यूएस कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस के इनसाइट पेपर के मुताबिक IPEF कोई परंपरागत ट्रेड एग्रीमेंट नहीं है। इसमें कई अलग-अलब मॉड्यूल होंगे जिनमें फेयर एंड रेजिलिएंट ट्रेड, सप्लाई चेन रेजिलियंस, इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड डिकार्बनाइजेशन और टैक्स एंड एंटीकरप्शन शामिल है। इसमें शामिल होने वाले देशों को एक मॉड्यूल के सभी कंपोनेंट्स में शामिल होना होगा लेकिन उन्हें सभी मॉड्यूल में शामिल होने की जरूरत नहीं है।
फेयर एंड रेजिलिएंट ट्रेड की अगुवाई यूएस ट्रेड रिप्रजेंटेटिव करेंगे और इसमें डिजिटल, लेबर और एनवायरमेंट से जुड़े मुद्दे होंगे। इनमें से कुछ बाध्यकारी होंगे। IPEF में टैरिफ बैरियर कम करने जैसे मुद्दे नहीं होंगे। यह एक तरह का एडमिनिस्ट्रेटिव अरेंजमेंट होगा जिसके लिए संसद की मंजूरी जरूरी नहीं होगी। ट्रेड एग्रीमेंट्स के लिए कांग्रेस की मंजूरी जरूरी है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप (TPP) से किनारा कर लिया था। माना जा रहा है कि पूर्वी एशिया में फिर से अपनी विश्वसनीयता हासिल करने के लिए बाइडन ने यह पैंतरा चला है।
चीन का दबदबा
चीन टीपीपी का प्रभावशाली सदस्य है और कंप्रहेंसिव एंड प्रोग्रेसिव एग्रीमेंट ऑन ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप में भी मेंबर बनना चाहता है। चीन 14 सदस्यों वाले रीजनल कंप्रहेंसिव इकनॉमिक पार्टनरशिप (RCEP) का भी हिस्सा है। अमेरिका इसका मेंबर नहीं है जबकि भारत ने इससे बाहर निकल चुका है। बाइडन प्रशासन IPEF को पूर्वी और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के साथ जुड़ने का एक नया जरिया मान रहा है। हाल में अमेरिका के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर जेक सुलीवन ने इसे 21वीं सदी की आर्थिक व्यवस्था बताया था।
लेकिन IPEF को लेकर इंडो-पैसिफिक रीजन के कई देश ज्यादा उत्साहित नहीं होंगे। इसकी वजह यह है कि इसके ट्रेड रूल्स बाध्यकारी हैं लेकिन मार्केट एक्सेस की कोई गारंटी नहीं है। जापान ने इस पहल का स्वागत किया है जबकि थाइलैंड ने भी बातचीत में शामिल होने की बात कही है। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड भी इसमें शामिल हो सकते हैं। दक्षिण कोरिया, फिलीपींस और सिंगापुर ने भी इसमें दिलचस्पी दिखाई है।
भारत की पोजीशन
माना जा रहा है कि बाइडन भारत को भी इसमें शामिल होने का न्योता दे सकते हैं। क्वाड समिट के दौरान उनकी अलग से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मीटिंग होगी। क्वाड में अमेरिका के साथ-साथ भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान शामिल हैं। लेकिन भारत ने IPEF के मुद्दे पर अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता से गुरुवार को जब IPEF में भारत के शामिल होने की संभावना के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, यह अमेरिका की पहल है। हमें इसकी डिटेल मिल चुकी है और हम इसे देख रहे हैं। जानकारों का कहना है कि अमेरिका के हाई स्टैंडर्ड से भारत सहज महसूस नहीं करेगा और जोखिम से बचना चाहेगा। अगर बाइडन प्रशासन की तरफ से भारत को इसमें शामिल होने का ऑफर आता है तो संभव है कि भारत इस पर विचार करने में लंबा समय ले सकता है। इसकी वजह यह है कि IPEF में कई ऐसे प्रस्ताव है जो भारत के हितों के अनुरूप नहीं हैं। उदाहरण के लिए IPEF में डिजिटल गवर्नेंस की बात है लेकिन इसके फॉर्म्युलेशन में ऐसे मुद्दे हैं जो बात की तय स्थिति से मेल नहीं खाते हैं।