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रामलीला ने ददुआ गिरोह से ली टक्कर!!

उत्तर प्रदेश में जिस ददुआ के इशारे पर सियासत की बिसात तय होती थी उस ददुआ को अगर खौफ था तो वो थी एक मामूली महिला से, जिसने अत्याचारों से आजिज आकर बन्दूक थाम ली थी. वह महिला डाकू ददुआ के पूरे गिरोह को अकेले अपने दम पर खदेड़ने का काम करती थी.वह चाहती हैं उसके गांव में भी बिजली पहुंचे और बहादुरी के बदले उसके गांव को मूलभूत सुविधाएं दी जाएं.

यूपी में जिस ददुआ के इशारे पर सियासत की बिसात तय होती थी उस ददुआ को अगर खौफ था तो वो थी एक मामूली महिला से, जिसने अत्याचारों से आजिज आकर बन्दूक थाम ली थी. वह महिला डाकू ददुआ के पूरे गिरोह को अकेले अपने दम पर खदेड़ने का काम करती थी. बीहड़ क्षेत्र का वह नाम जिसकी एक हुंकार पर कभी पुलिस तक थर्रा जाती थी, ऐसे दस्यु ददुआ का जंगल में रहकर एक महिला ने सामना किया था. बाद में उसको पाठा की शेरनी कहलाने का गौरव मिला और सरकार ने महिला स्वशक्ति सम्मान देकर सम्मानित किया. लेकिन आज यह दलित महिला उपेक्षित और बदहाल है.

मानिकपुर क्षेत्र के चुरेहकेशरुआ गांव के मजरे हरिजनपुर में आज भी यह दलित महिला रामलली भूले बिसरे दिनों की याद ताज़ा करके किसी तरह जीवन-यापन कर रही हैं. तत्कालीन राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री द्वारा उसे दिया गया स्वशक्ति महिला सम्मान का पदक घर में किसी बेकार वस्तु की तरह कभी इधर तो कभी उधर पड़ा नजर आता है. उसकी चार बेटियॉं और एक बेटा है. तीन बेटियों की शादी हो चुकी है और एक बेटी-बेटा पढ़ रहे हैं. वैसे तो रामलली का मकान कच्चा है, लेकिन घर के अंदर उसने दो कमरे पक्के भी बनवा लिए हैं.

ददुआ के गैंग से ली टक्कर

रामलली वह महिला है जिसकी वीरता से प्रभावित होकर तत्कालीन जिलाधिकारी जगन्नाथ सिंह ने उसे व उसके पति को शस्त्र लाइसेंस बतौर ईनाम दिये थे. रामलली बताती हैं कि ददुआ गिरोह से छूटकर एक अपहृत बालक उसके घर में आ गया था. उसने बालक के भय और करुणा को देखकर तय किया कि चाहे जो कुछ हो जाये वह बालक को बचाकर रहेगी. बाद में गिरोह ने संदेशा भेजा के बालक लौटा दो लेकिन उसने नहीं लौटाया तभी से ददुआ गिरोह उसका दुश्मन हो गया. गैंग से दुश्मनी की जानकारी रामलली ने जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक को दी तो उसे कुछ पुलिस गार्ड दे दिये गये.

एक दिन अचानक गैंग ने उसके घर को घेर लिया. उस समय पुलिस गार्ड घर के अंदर ही थे. जैसे ही बदमाशों ने बाहर से ललकारा और घर को फूंक देने की बात की तो पुलिस वालों के हाथ पैर फूल गए. सब रामलली व उसके परिवार को भूलकर अपनी जान बचाने में लग गए. उसी समय उस पुलिस जीप में वायरलेस बोलने लगा जिससे गार्ड रामलली के घर पर पहुंचे थे. ददुआ गिरोह पुलिस वायरलेस की आवाज सुनकर भाग खड़ा हुआ.

इसी दौरान एक गड्ढे में दो-तीन बदमाश गिर गए और हड़बड़ाहट में उनके असलहे और अन्य समान छूट गए. रामलली ने डकैतों के असलहे सामान समेट कर घर में रख लिये और बाद में उन्हें जिलाधिकारी जगन्नाथ सिंह को लाकर सौंप दिया. रामलली को इसी वीरता पर उसे राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री ने महिला वीरता पुरस्कार देकर सम्मानित किया था. साथ ही जिलाधिकारी जगन्नाथ सिंह ने उसे व उसके पति को शस्त्र लाइसेंस बतौर ईनाम दिया था जो आज भी उसके पास है. उसी उपहार में मिले असलहों के दम पर रामलली ने कई बार डकैत ददुआ गैंग से आमना सामना किया और आखिर में गैंग परास्त होकर पाठा की शेरनी रामलली को देखकर किनारा करने लगा.

गांव में अभी तक नहीं पहुंची बिजली

रामलली को आज खुद के लिये उतना दुःख नहीं है, लेकिन वह चाहती हैं उसके गांव में भी बिजली पहुंचे और बहादुरी के बदले उसके गांव को मूलभूत सुविधाएं दी जाएं. रामलली को उम्मीद थी कि जब मायावती सत्ता में आएंगी तो उसके दिन तो बहुरेगें ही गांव की भी तस्वीर बदल जाएगी. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. इस बीच सपा सरकार आई और भाजपा की सरकार भी आई लेकिन हालत जस के तस रहे.

यहां तक कि बसपा सरकार के पूर्व ग्राम्य विकास मंत्री दद्दू प्रसाद जिस विधानसभा से चुनाव जीतकर सदन पहुंचे थे रामलली उसी विधानसभा क्षेत्र मानिकपुर की निवासी हैं. रामलली व उसके पति रामसुमेर को किसी से शिकायत नहीं है, लेकिन इस बात की पीड़ा ज़रुर है कि सरकार दलितों की आई और गई लेकिन वह उपेक्षित और बदहाल रहे.

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Pooja Pandey

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