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चाहे मास हो या क्लास, साउथ की फिल्में हिंदी भाषियों को पसंद क्यों आ रही हैं

आज बॉलीवुड के हर बड़े प्रोड्यूसर और एक्टर को सफलता का सबसे आसान रास्ता रिमेक लग रहा है. ओरिजिनल स्क्रिप्ट और कहांनियों का अकाल पड़ गया लगता है. या कोई रिस्क नहीं लेना चाहता है. साउथ की फिल्मों का रिमेक बनाने के लिए बॉलीवुड एक्टर्स में होड़ लगी हुई है.

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सुदूर पूर्वी यूपी, बिहार-झारखंड से लेकर बंगाल उड़ीसा तक में कोई सैलून की दूकान, छोटे-मोटे भोजनालय और किराने की दुकान हो या संयुक्त परिवार वाला कोई घर आप को टीवी पर साउथ की हिट और फ्लॉप फिल्में स्क्रीन पर गरदा उड़ाती मिल जाएंगी. साउथ की फुल स्पीड में चलती कहांनियां, हिंसा, कॉमेडी और इमोशन से भरी फिल्मों को लोग एकटक देखते मिल जाएंगे. उत्तर भारत में टीवी चैनलों और यूट्यूब पर मुफ्त में मिल रहीं फिल्मों का ऐसा चस्का लगा है कि अब उन्हें साउथ की फिल्में थियेटर में भी भा रही हैं.

अब उत्तर भारत का दर्शक मोटी रकम खर्च करके भी दक्षिण की डब मूवी को हिंदी के बड़ी फिल्मों पर भी तरजीह देने लगा है. दक्षिण की फिल्मों की लोकप्रियता की गवाही दे रहा है तेलुगु सुपर स्टार अल्लू अर्जुन की पुष्पाराज की हिंदी बेल्ट में जबरदस्त सफलता. ऐसी बातें सुनने में आईं हैं कि उत्तर भारत में कई मल्टीप्लेक्सों में बॉलीवुड की बड़े बजट की मूवी 83 को उतारकर फिर से पुष्पाराज को लगा दिया गया. सवाल ये है कि साउथ की फिल्मों में ऐसा क्या है कि वो हिंदी भाषियों को इतनी पसंद आ रही हैं. जबकि साउथ की भाषा, संस्कृति, पहनावा आदि उत्तर से काफी कुछ अलग है.

सबसे बड़ी बात ये है कि हिंदी भाषी लोगों को साउथ सिनेमा की मास एंटरटेनिंग मूवी ही नहीं पसंद आ रही है, बल्कि क्लासी फिल्में भी उत्तर भारतीय लोग चाव से देख रहे हैं. हाल ही में आई जय भीम इतनी चर्चित हुई कि उत्तर भारत का उच्च तबका ओटीटी पर देख ही नहीं रहा है बल्कि सोशल मीडिया पर खूब तारीफ भी कर रहा है. इसी तरह कुछ दिनों पहले रिलीज हुई मलयालम फिल्म फ़ाज़िल फहाद की मलिक शायद ही कोई ऐसा हो जो अपने आपको इंटेलेक्चुअल समझता हो और इस मूवी को न देखा हो.

मुफ्त की सस्ती फिल्मों ने हिंदी भाषी इलाके में पैठ बनाई

सैटेलाइट टीवी चैनलों ने अपने यहां फिल्मों की संख्या बढ़ाने के लिए साउथ की डब फिल्मों को शामिल किया. जिन्हें प्रसारित करने का राइट उन्हें मामूली रकम मे हासिल होता गया. इसी तरह यू-ट्यूब पर साउथ की हिंदी में डब फिल्में लगातार मुफ्त में उपलब्ध थीं. भरपूर एक्शन, रोमांस और फैमिली ड्रामा के चलते ये फिल्में लोगों को अच्छी लगने लगीं. धीरे-धीरे साउथ की फिल्मों का लोगों का चस्का लग गया. अमिताभ बच्चन की सूर्यवंशम तो साउथ के प्रोडक्शन हाउस की फिल्म थी, जब रिलीज हुई थी तो थियेटर में दर्शकों को वो पसंद नहीं आई. फिल्म बुरी तरह फ्लॉप हुई थी. पर वही सूर्यवंशम 20 साल बाद सैटेलाइट टीवी के इतिहास में सर्वाधिक व्यू देने वाली फिल्म बन गई. कारण कि सीधी-साधी परिवार की कहानी, बाप-बेटे में अलगाव फिर प्यार, अमीर-गरीब, अनपढ़-पढ़ी लिखी लड़की से प्यार आदि चीजें ऐसी थीं जो बॉलीवुड सिनेमा में खत्म हो रही थीं. दर्शकों ने सूर्यवंशम को रिकॉर्डतोड़ देखा. हिंदी की हिट फिल्मों सिंबा, बाजीराव सिंघम, कबीर सिंह आदि फिल्मों के असली वर्जन को जब उन्होंने साउथ की डब हिंदी फिल्मों के रूप में देख देखकर साउथ की फिल्मों के लोग मुरीद होते गए.

बॉलीवुड की फिल्मों के विषय बंट गए हैं

हिंदी फिल्मों के मुकाबले साउथ की फिल्मों का सब्जेक्ट उत्तर भारत के लोगों को पसंद आ रहा है. साउथ की फिल्में अभी भी एक्शन, इमोशन और मेलोड्रामा पर आधारित हैं. हीरो की कहानी गांव से शुरू होती है फिर हैदराबाद या चेन्नई पहुंचती है. थोड़े समय के लिए यूरोप- यूएस या साउथ एशिया के किसी देश में चली जाती हैं. मतलब साफ है कि गांव भी चाहिए और शहर भी. आधुनिकता के साथ-साथ परंपरा भी चाहिए. इसके ठीक उलट मुंबइया फिल्में आधुनिक हो गईं और देश की आत्मा गांव उनमें खत्म हो चुका है. जबकि उत्तर भारत का भी हर दर्शक कहीं ना कहीं गांव से आज भी जुड़ा हुआ है. 90 पर्सेंट लोगों का जड़ तो गांव से ही जुड़ा हुआ है. कहीं न कहीं से ये भाषाई सामाजिक लेवल का भी मामला बनता है.

उत्तर भारत में यूपी और बिहार को ही ले लीजिए, यहां पर भोजपुरी फिल्मों का अलग क्लास है. भोजपुरी अभी भी यहां दोयम दर्जे की भाषा है. अभी हाल ही में एक स्कूल की पिक्स वायरल हुई थी, जिसमें लिखा था कि भोजपुरी बोलने वालों का स्कूल में प्रवेश वर्जित है. गोरखपुर और बनारस में आज भी कोई परिवार भोजपुरी फिल्में नहीं देखने जाता है. मल्टीप्लेक्स में भोजपुरी फिल्में लगती भी नहीं है. इसलिए भोजपुरी फिल्मों की पटकथा भी अलग रहती है. ऐसा तेलुगु या तमिल में नहीं है. यहां की फिल्मों में भाषाई अलगाव नहीं है. सबके लिए एक सिनेमा बन रहा है. जो दक्षिण में ही नहीं उत्तर में भी पसंद किया जा रहा है. मुंबइया सिनेमा में मल्टिप्लेक्स सिनेमा का कंटेंट बिल्कुल बदल चुका है.

तकनीक और स्क्रिप्ट के लेवल पर साउथ पहले भी रहा है मजबूत

जिनको अस्सी के दशक का बॉलीवुड याद होगा उन्हे पता होगा कि किस तरह साउथ के प्रोडक्शन हाउस मुंबइया प्रोडक्शन हाउस पर भारी पड़ रहे थे. अमिताभ बच्चन, जितेंद्र और मिथुन चक्रवर्ती जैसे तत्कालीन बड़े स्टार साउथ के बड़े प्रोड्यूसर्स के साथ काम कर रहे थे. टी रामाराव, डी रामानायडु, एस स्वामीनाथन जैसे लोगों की फिल्मों को ये स्टार्स पहले साइन करते थे. जितेंद्र उस समय साउथ फिल्में करके टॉप स्टार बन गए थे. तोहफा, मवाली, जस्टिस चौधरी, आशा, अर्पण जैसी साउथ की फिल्मों के बल पर वो अगले सुपर स्टार के दावेदार हो गए. 1983-1984 में एक समय ऐसा आ गया था कि साउथ की तीन फिल्में इंकलाब (अमिताभ बच्चन), आज का एमएलए (राजेश खन्ना) और यह देश (जितेंद्र) के बीच ऐसी होड़ मची कि कौन पहले रिलीज होती है.

साउथ की ये तीनों फिल्में पूरी करने के लिए बॉलीवुड के तीनों सुपर स्टार मुंबइया बड़ी फिल्मों को छोड़कर इन फिल्मों की दिन रात शूटिंग कर रहे थे. हालांकि तीनों फिल्में फ्लॉप रहीं पर साउथ के डायरेक्टरों का वर्चस्व बना रहा. इसका कारण यही था कि मुंबइया फिल्में लॉस्ट एंड फाउंड के पुरानी स्क्रिप्ट से बाहर नहीं निकल रही थी और साउथ की फिल्मों में नए-नए प्रयोग हो रहे थे. उनकी फिल्में समय से शुरू होतीं और समय से पहले बनकर तैयार हो जाती थीं. जबकि मुंबइया फिल्में बेहद लापरवाह ढंग से आगे बढतीं और कंप्लीट होने में इन्हें 2 से 3 साल लग जाते थे. साउथ के सिनेमा ने 2 महीने में फिल्म पूरी करने का कॉन्सेप्ट मुंबई फिल्म उद्योग को दिया. साउथ की फिल्मों के मजबूत स्क्रिप्ट को इसी से समझ सकते हैं कि बॉलीवुड का हर बड़ा एक्टर साउथ की रिमेक बनाने को हर समय तैयार रहता है. पिछले साल की सबसे बड़ी ब्लॉक बस्टर मूवी कबीर सिंह साउथ अर्जुन रेड्डी का रिमेक ही थी. हिंदी में करीब एक दर्जन साउथ की मूवी के रिमेक पर बड़े सितारे काम कर रहे हैं.

खानत्रयी का खत्म होना और नए सुपर स्टार का जन्म न होना

बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक कोई भी फिल्म इंडस्ट्री हो हर काल और समय में स्टारडम का बोलबाला रहा है. फिल्म इंडस्ट्री के सुपर स्टार को दर्शकों के बीच गॉड का रुतबा मिलता है. प्रशंसक इनके नाम से टिकट खरीदते हैं और अपने हीरो की फिल्मों के लिए माहौल बनाते हैं. हिंदी फिल्म इंड़स्ट्री ऐसे दौर से गुजर रही है जब इसका कोई अपना सुपर स्टार अब नहीं है. शाहरुख और सलमान और आमिर खान की एक और फ्लॉप फिल्म इंडस्ट्री से इनका रुतबा खत्म कर देगी. एक समय होता था कि इन स्टारों की बकवास फिल्में भी टिकट खिड़की पर भीड़ खींचती थीं. पर अब दबंग खान की फिल्में भी बॉक्स पर पानी नहीं मांग रही हैं. तीनों खान के बाद कई कलाकार हैं जो अच्छी फिल्मों को हिट करा सकते हैं. पर औसत दर्जे की फिल्में हिट कराने की कूवत रखने वाले कलाकार का मुंबइया फिल्म इंडस्ट्री कई साल से इंतजार कर रही है. इसके ठीक उलट साउथ की फिल्म इंडस्ट्री में स्टार पावर सर चढ़कर बोल रहा है. हर कलाकार की अपनी जबरदस्त फैन फॉलोइंग है. हिंदी बेल्ट में भी लोग प्रभाष, अल्लू अर्जुन, जूनियर एनटीआर, विजय देवरकोंडा को पहचानने लगे हैं.

बॉलीवुड का बेस मार्केट मुंबई का होना

हिंदी भाषी फिल्मों की बेस मार्केट मुंबई है. आंकडे़ बताते हैं कि करीब 22 फीसदी कमाई का हिस्सा केवल मुंबई से आता है. इसी कारण हिंदी भाषी फिल्मों की कहांनियां और स्क्रिप्ट ऐसी होती हैं जो मुंबई में रहने वालों को पसंद आएं. हिंदी बेल्ट से सिंगल स्क्रीन थियेटरों की संख्या कम होती जा रही हैं और जो हैं भी वहां भोजपुरी या रिजनल फिल्में चलती हैं. इस कारण मल्टीप्लेक्स के दर्शकों के मूड को ध्यान में रखा जा रहा है. हालांकि यहीं मुंबइया फिल्मों के प्रोड्यूसर कन्फ्यूज हो जा रहे हैं और आत्माविहीन फिल्में बन रहे हैं.

रिमेक और रिमिक्स खत्म कर रहा बॉलीवुड

आज बॉलीवुड के हर बड़े प्रोड्यूसर और एक्टर को सफलता का सबसे आसान रास्ता रिमेक लग रहा है. ओरिजिनल स्क्रिप्ट और कहांनियों का अकाल पड़ गया लगता है. या कोई रिस्क नहीं लेना चाहता है. साउथ की फिल्मों का रिमेक बनाने के लिए बॉलीवुड एक्टर्स में होड़ लगी हुई है. स्क्रिप्ट से बुरा हाल है म्यूजिक का. कभी हिंदी फिल्मों की पहचान होता था उसका संगीत. मधुर गाने कई साल तक लोगों की जुबान पर होते थे. अब तो कई सालों में कोई एक गाने ऐसे आते हैं जो जुबान पर चढ़ रहे हैं. अच्छे गीतों से सजी फिल्में कमजोर होते हुए भी हिट हो जाती थीं. अभी कुछ साल पहले आई आशिकी 2 कम पॉपुलर सितारों और कमजोर स्क्रिप्ट के बावजूद अगर सुपर हिट रही तो इसका कारण उसके कर्णप्रिय गाने रहे. शादियों के माहौल में बॉलीवुड संगीत और डांस लोगों के सिर चढ़कर बोलता था. रिमिक्स के चलते और पुराने गानों के नए वर्जन के चलते पंजाबी, हरियाणवी और भोजपुरी गाने लोगों को लट्टू बना रहे है. डांस क्लासेस से हिंदी फिल्मी गानों की सूची की जगह पंजाबी पॉप ने ले ली है.

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Pooja Pandey

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