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क्यों राहुल गांधी के विदेशी दौरों पर बेवजह विवाद शुरू हो जाता है?

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बताया था कि 2015 से 2019 के बीच राहुल गांधी कुल 247 बार विदेशी दौरे पर गये थे जो औसतन हर महीने में पांच बार निकलता है. यह आंकड़ा नरेन्द्र मोदी के 2014 में प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद से अभी तक के कुल 113 विदेशी दौरों से बस दोगुना से थोड़ा ही ज्यादा है.

मृत्यु के सौ साल बाद अकबर इलाहाबादी का नाम इनदिनों फिर से चर्चा में है. बताया गया कि उनका नाम बदल कर अकबर प्रयागराजी कर दिया गया है, फिर उत्तर प्रदेश सरकार का स्पष्टीकरण आया कि सरकारी वेबसाइट हैक करके यह शरारत की गयी थी. अकबर इलाहाबादी का एक मशहूर शेर है- ‘हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता.’

इलाहाबाद शहर सिर्फ अकबर इलाहाबादी के लिए ही नहीं जाना जाता. इलाहाबाद (प्रयागराज) से और भी जानी-मानी हस्तियों का ताल्लुक रहा है, खास कर कांग्रेस पार्टी के विख्यात नेहरू-गांधी परिवार का. इंदिरा गांधी, उनके पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू और दादा मोतीलाल नेहरू सभी इलाहाबाद में ही जन्मे और पले थे. पर अकबर इलाहाबादी को कहां इल्म रहा होगा कि उनका शेर एक दिन नेहरू-गांधी परिवार की पांचवी पीढ़ी के नेता राहुल गांधी के दिल की बात कहने लगेगी.

राहुल गांधी के इटली जाने में बुराई क्या है

राहुल गांधी भारत के एकलौते नेता नहीं हैं जो अक्सर विदेशी दौरे पर जाते रहते हैं. पिछले रविवार को वह नया साल मानाने अपने ननिहाल इटली क्या चले गए कि देश में आफत मच गयी है. दूसरे अगर विदेशी दौरे पर जायें तो चर्चा तक नहीं होती, पर राहुल गांधी अगर कुछ दिनों के लिए अपनी बूढ़ी नानी, जिनकी उम्र 95 वर्ष के आसपास होगी. से मिलने क्या चले गए कि वह बदनाम हो गए. उनकी नानी पाओलो मायनों को दिल्ली की हवा रास नहीं आती. वह अपनी बेटी सोनिया और उनके बच्चों से मिलने अगर नहीं आ सकतीं. तो इसमें बुराई क्या है, अगर राहुल गांधी अपनी नानी और दो मौसी नाडिया और औनुस्का से मिलने और उनके साथ नया साल मानाने इटली चले गए?

यह कोई पहली बार तो नहीं है की राहुल गांधी नया साल मानाने इटली चले गये हों. पिछले साल भी गये थे और तब भी इसी तरह से सवाल उठाया गया था. पिछले वर्ष राहुल गांधी पर आरोप लगा कि किसान आंदोलन के बीच में ही वे नया साल मानाने इटली चले गए. ऐसा भी नहीं था कि अगर वह पिछले वर्ष इटली नहीं गये होते तो सभी आंदोलनकारी किसान कांग्रेस पार्टी को ही वोट देते. वैसे भी परिवार और परिवार के प्रति कर्तव्य वोट की राजनीति और चुनावी जीत-हार से ऊपर होता है. अब राहुल गांधी की इसमें क्या गलती है कि पिछले साल दिसम्बर के महीने में किसान आंदोलन चल रहा था और इस बार पांच राज्यों में चुनाव की तैयारी चल रही है. 3 जनवरी को उनका पंजाब के मोंगा में रैली होना था, जिसे उनके वापस आने तक स्थगित कर दिया गया है. ऐसा तो हो नहीं सकता कि अगर राहुल गांधी इटली नहीं जाते तो कांग्रेस पार्टी पंजाब में चुनाव जीत ही जाती. खामखां राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी के विरोधी उनके विदेशी दौरों पर बवाल शुरू कर देते हैं.

क्या राहुल गांधी सीरियस नेता नहीं हैं?

सोचिए कि कांग्रेस के प्रमुख प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला पर क्या गुजरती होगी जब उनसे राहुल गांधी के विदेशी दौरों के बारे में सवाल पूछा जाता है. क्या राहुल गांधी सुरजेवाला को बता कर जाते होंगे कि वह कहां और कितने दिनों के लिए जा रहे हैं. बेचारे सुरजेवाला इससे ज्यादा कहें भी तो क्या कि उनके “आदरणीय और प्रिय नेता” निजी दौरे पर विदेश गये हैं और जल्द ही वापस आ जाएंगे. सुरजेवाला ने तब भी तो यही कहा था जब वह 2019 के चुनाव में मिली करारी हार को भुलाने बिना किसी को बताये लगभग दो महीनों में लिए अज्ञातवास पर विदेश चले गए थे. बाद में पता चला कि वह थाईलैंड और पूर्वी एशिया के कुछ अन्य देशों में भ्रमण कर रहे थे.

यह जानकारी सरकारी सूत्रों से ही मिली थी. राहुल गांधी या कोई भी भारतीय नागरिक जब कहीं जाता है और अपने भारतीय पासपोर्ट का प्रयोग करता है तो उसकी जानकारी सरकारी कंप्यूटर में आ जाती है. जब राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी ने देश में कंप्यूटरीकरण को बढ़ावा दिया था तो उन्हें कहां पता रहा होगा कि कंप्यूटर में उनके बेटे कि सभी जानकारी कैद हो जायेगी, देश में एक दिन बीजेपी की सरकार होगी और बीजेपी उस डाटा से यह सबित करने की कोशिश करेगी कि राहुल गांधी सीरियस नेता नहीं हैं?

पीएम मोदी से ज्यादा विदेशी दौरों पर राहुल रहते हैं

उन्ही सरकारी कंप्यूटर से मिली एक जनकारी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देश से साझा की था कि 2015 से 2019 के बीच राहुल गांधी कुल 247 बार विदेशी दौरे पर गये थे जो औसतन हर महीने में पांच बार निकलता है. यह आंकड़ा नरेन्द्र मोदी के 2014 में प्रधानमंत्री पद सम्भानले के बाद से अभी तक के कुल 113 विदेशी दौरों से बस दुगुना से थोड़ा ही तो ज्यादा है. अगर मोदी राहुल गांधी की तरह आर्थिक रूप से संपन्न परिवार से नहीं आते और राहुल गांधी की तरह उनके रिश्तेदार विदेशों में नहीं रहते हैं तो इसमें राहुल गांधी का कसूर ही क्या है?

बस कसूर एक ही है. राहुल गांधी ने संसद में प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी दौरों पर कटाक्ष करते हुए एक बार मोदी को एनआरआई पीएम कह दिया था, और तब से बीजेपी उनके विदेशी दौरों का पूरा डाटा रखने लगी है. संभव है कि बीजेपी को लगने लगा है कि अगर राहुल गांधी चुनावी प्रचार से ज्यादा दिन दूर रहे तो इससे कांग्रेस पार्टी का कम और बीजेपी को ज्यादा नुकसान हो सकता है. यह भी कोई बात हुई कि बीजेपी को जिताने का मानो राहुल गांधी ने ठेका ले रखा हो? किसी को यह नही भूलना चाहिए कि राहुल गांधी कांग्रेस के बड़े नेता होने के अलावा एक स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक भी हैं. जहां जाएं, जब जी चाहे, जितने दिनों के लिए जाएं, इससे अगर किसी और को तकलीफ होती है तो होती रहे.

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Pooja Pandey

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